20वीं सदी के महान गायक: जब पंडित जसराज के सामने भावुक हो गए बड़े गुलाम अली खां
सारांश
Key Takeaways
- बड़े गुलाम अली खां का जन्म 2 अप्रैल 1902 को हुआ था।
- उन्होंने ठुमरी में पंजाबी अंदाज को मिलाया।
- खयाल की नई शैली विकसित की।
- पद्म भूषण से सम्मानित हुए।
- उनका निधन 25 अप्रैल 1968 को हुआ।
नई दिल्ली, 1 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कुछ ऐसे नाम हैं, जिनकी चमक समय के साथ और भी बढ़ती जाती है। 20वीं सदी के शास्त्रीय संगीत क्षेत्र के महान उस्ताद बड़े गुलाम अली खां भी एक ऐसा ही नाम हैं, जिन्हें ‘तानसेन’ के नाम से भी जाना जाता है। उनकी गायकी, ठुमरी की अनोखी शैली और स्वरों की मधुरता आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित है। 2 अप्रैल को खां साहब की जयंती है।
बड़े गुलाम अली खां पटियाला घराने के एक अद्भुत गायक थे। उन्होंने खयाल और ठुमरी को नई ऊंचाई प्रदान की। उनकी आवाज इतनी सुरीली और लचीली थी कि उन्होंने फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में तानसेन की आवाज दी थी। उनके गाए गीत जैसे ‘शुभ दिन आयो’ और ‘प्रेम जोगन बनके’ आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हैं।
उनका जन्म 2 अप्रैल 1902 को पाकिस्तान के लाहौर के पास के गांव केसुर में हुआ था। संगीत का यह वरदान उन्हें विरासत में मिला था। उनके पिता अली बख्श खां एक प्रसिद्ध सारंगी वादक थे और उनके चाचा काले खां भी एक गायक थे। उन्होंने अपने बचपन से ही कड़ी मेहनत की और रोजाना 20 घंटे तक रियाज करते थे। 1947 के बंटवारे के बाद वे भारत चले आए और 1957 में भारतीय नागरिकता प्राप्त की।
एक इंटरव्यू में पंडित जसराज ने एक भावुक घटना का उल्लेख किया था। यह घटना 1960 की है। जसराज मुंबई आए थे और डॉक्टर मुकुंदलाल के साथ बड़े गुलाम अली खां से मिलने गए। उस समय खां साहब बीमार थे। जसराज और उनके साथी उनके पैर दबा रहे थे। अचानक खां साहब भावुक हो गए और बोले, “मेरा शागिर्द बन जा।” जसराज ने विनम्रता से उत्तर दिया, “चाचा जान, मैं आपसे गाना नहीं सीख सकता।” खां साहब ने आश्चर्य से पूछा, “क्यों?” जसराज ने कहा, “मुझे अपने पिताजी की विरासत को आगे बढ़ाना है।” यह सुनते ही बड़े गुलाम अली खां की आंखों में आंसू आ गए और वे फफक-फफककर रो पड़े। उन्होंने कहा, अल्लाह तेरी हर मुराद पूरी करे।
जसराज ने बताया कि इतने बड़े उस्ताद का शिष्य बनने का प्रस्ताव रखना और फिर भावुक होकर रोना उनकी संवेदनशीलता और संगीत के प्रति गहरी निष्ठा को दर्शाता है। उस समय जसराज अपने बड़े भाई पंडित मणिराम के शिष्य थे और मेवाती घराने की परंपरा को निभा रहे थे।
बड़े गुलाम अली खां ने ठुमरी में पंजाबी अंदाज को मिलाकर खयाल की नई शैली विकसित की। उनकी गायकी साधारण लेकिन अत्यंत प्रभावशाली थी। उन्होंने सारंगी भी बजाई और फिल्मों में गाने से शुरुआत में मना कर दिया था, लेकिन बाद में ‘मुगल-ए-आजम’ में अपनी आवाज दी।
साल 1962 में खां साहब को संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 1962 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
उनका विवाह 1932 में अली जीवाई से हुआ था। उनके बेटे मुनव्वर अली खां भी शास्त्रीय गायक थे और पिता के साथ कई कार्यक्रमों में भाग लेते थे। उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का निधन 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद में हुआ था।