25 हजार रुपये प्रति गाना: बड़े गुलाम अली खां ने मुगल-ए-आजम के लिए रखी थी चौंकाने वाली शर्त
सारांश
Key Takeaways
- उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की पुण्यतिथि 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद में हुई थी।
- उन्होंने मुगल-ए-आजम के लिए 25,000 रुपये प्रति गाना की शर्त रखी, जो उस दौर में अभूतपूर्व थी।
- उसी समय लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसे गायक मात्र 500 रुपये प्रति गाना लेते थे।
- उन्होंने फिल्म में तानसेन के किरदार के लिए 'प्रेम जोगन बन के' और 'शुभ दिन आयो' गाए।
- वे पटियाला घराने के महान प्रतिनिधि थे और 1962 में पद्म भूषण से सम्मानित हुए।
- प्रसिद्ध गजल गायक गुलाम अली उनके शिष्य थे और उनकी विरासत आज भी जीवित है।
नई दिल्ली: भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश में ध्रुवतारे की तरह चमकने वाले उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की पुण्यतिथि 25 अप्रैल को पूरे देश में संगीत प्रेमी श्रद्धापूर्वक याद करते हैं। पटियाला घराने के इस महान प्रतिनिधि का निधन 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद के बशीर बाग पैलेस में हुआ था। उनकी आवाज में जो जादू था, वह आज भी 'याद पिया की आए', 'आए ना बलम' और 'नैना मोरे तारास गाये' जैसे गीतों में जीवित है।
संगीत की विरासत में जन्मे उस्ताद
बड़े गुलाम अली खां का जन्म 2 अप्रैल 1902 को वर्तमान पाकिस्तान के कसूर, पंजाब में एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। उनके पिता अली बख्श खां और चाचा काले खां दोनों ही अपने समय के प्रसिद्ध संगीतकार थे। घर में ही संगीत की शिक्षा मिलने के कारण उनकी नींव बचपन से ही अत्यंत सुदृढ़ बनी।
उनके संगीत जीवन की शुरुआत एक सारंगी वादक के रूप में हुई। बाद में उन्होंने पिता अली बख्श खां, चाचा काले खां और बाबा शिंदे खां से गायन के गहरे गुर सीखे। अली बख्श खां महाराजा कश्मीर के दरबारी गायक थे और उनका घराना पहले 'कश्मीरी घराना' कहलाता था। जब यह परिवार पटियाला में बस गया, तब से यह 'पटियाला घराना' के नाम से विख्यात हुआ।
लाहौर से कोलकाता तक: एक आवाज का सफर
सन् 1919 के लाहौर संगीत सम्मेलन में बड़े गुलाम अली खां ने पहली बार सार्वजनिक मंच पर अपनी कला प्रस्तुत की। इसके बाद कोलकाता और इलाहाबाद के संगीत सम्मेलनों ने उन्हें देशव्यापी पहचान दिलाई। उन्होंने अपना जीवन लाहौर, मुंबई, कोलकाता और हैदराबाद में बिताया।
उनकी गायकी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे ठुमरी को बिल्कुल नए अंदाज में प्रस्तुत करते थे — जिसमें लोक संगीत की मिठास और शास्त्रीयता का अद्भुत संगम होता था। अपने खयाल गायन में वे ध्रुपद, ग्वालियर घराने और जयपुर घराने की शैलियों का बेजोड़ समन्वय करते थे। प्रसिद्ध गजल गायक गुलाम अली उन्हीं के शिष्य थे।
मुगल-ए-आजम और 25,000 रुपये की ऐतिहासिक शर्त
बड़े गुलाम अली खां फिल्मों में गाने के सख्त विरोधी थे। जब फिल्म निर्देशक के. आसिफ ने उनसे मुगल-ए-आजम (1960) के लिए गाने का अनुरोध किया, तो उन्होंने इनकार करने की नीयत से 25,000 रुपये प्रति गाना की मांग रखी। यह उस दौर में एक अकल्पनीय रकम थी, जब लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसे दिग्गज गायक मात्र 500 रुपये के आसपास पारिश्रमिक लेते थे।
लेकिन के. आसिफ ने बिना एक पल की देरी किए यह शर्त स्वीकार कर ली। इस तरह उस्ताद को फिल्म के लिए गाना पड़ा। उन्होंने फिल्म में तानसेन के किरदार के लिए 'प्रेम जोगन बन के' और 'शुभ दिन आयो' गीत गाए, जो आज भी भारतीय सिनेमा की अनमोल धरोहर माने जाते हैं।
यह घटना भारतीय संगीत इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने यह साबित किया कि शास्त्रीय संगीत की साधना का मूल्य फिल्मी दुनिया के किसी भी पारिश्रमिक मानक से कहीं ऊपर था। के. आसिफ की जिद और बड़े गुलाम अली खां की शर्त — दोनों ने मिलकर भारतीय सिनेमा को एक ऐसा संगीत दिया जो दशकों बाद भी अमर है।
गांधीजी को मंत्रमुग्ध करने वाला कंठ
एक बार महात्मा गांधी ने बड़े गुलाम अली खां के मुख से 'राधेश्याम बोल' भजन सुना और वे गहराई से प्रभावित हुए। यह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि उनकी आवाज में धर्म और सांस्कृतिक सीमाओं से परे एक आत्मीय शक्ति थी।
1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद वे कुछ समय के लिए पाकिस्तान गए, लेकिन शीघ्र ही भारत लौट आए और यहीं को अपनी कर्मभूमि बनाया। असाधारण संगीत सेवा के लिए उन्हें 1962 में पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अपने पुत्र मुनव्वर अली खान के साथ वे अंतिम समय तक सार्वजनिक प्रदर्शन करते रहे।
उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की विरासत आज भी पटियाला घराने के शिष्यों और संगीत विद्यालयों के माध्यम से जीवित है। उनकी गायकी का अध्ययन आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत के पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से शामिल है — यही उनकी सबसे बड़ी और स्थायी विजय है।