'कुड़ियों रोया ना करो': पंजाब यूनिवर्सिटी की एक झलक से जन्मा सतिंदर सरताज का यादगार गीत
सारांश
मुख्य बातें
सूफी गायक सतिंदर सरताज का संगीत महज़ धुनों का संग्रह नहीं है — यह जीवन के उन पलों की दास्तान है जो अनजाने में किसी के दिल पर दस्तक दे जाते हैं। उनके चर्चित गीत 'कुड़ियों रोया ना करो' की कहानी भी ऐसी ही एक सच्ची घटना से जुड़ी है, जो पंजाब यूनिवर्सिटी के कैंपस में घटी थी। सरताज ने स्वयं एक कार्यक्रम में बताया था कि यूनिवर्सिटी के एक आयोजन में एक लड़की को रोते देखकर वह भाव उनके मन में इस कदर बस गया कि उन्होंने उसे गीत के रूप में शब्द दे दिए।
बजरावर से पंजाब यूनिवर्सिटी तक का सफर
सतिंदर सरताज का असली नाम सतिंदर पाल सिंह है। उनका जन्म पंजाब के होशियारपुर जिले के बजरावर गाँव में हुआ। बचपन में गाँव में आने वाले लोक कलाकारों की बाँसुरी और सारंगी की तानें उन्हें खींचती थीं। बाल सभाओं में गाने से शुरू हुई यह यात्रा धीरे-धीरे उनके जीवन का केंद्र बन गई।
औपचारिक शिक्षा में उन्होंने म्यूजिक में ऑनर्स किया और जालंधर से शास्त्रीय संगीत में पाँच वर्षीय डिप्लोमा पूरा किया। इसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी में म्यूजिक में मास्टर्स और एमफिल किया। आगे चलकर उन्होंने सूफी गायन में पीएचडी की उपाधि हासिल की और सूफी काव्य की गहराई को समझने के लिए फारसी भाषा का भी अध्ययन किया। इसी विश्वविद्यालय के म्यूजिक विभाग में उन्होंने करीब छह साल तक अध्यापन भी किया।
एक रोती लड़की और एक गीत का जन्म
पंजाब यूनिवर्सिटी के दिनों में ही उनकी रचनाशीलता और पैनी हुई। एक यूनिवर्सिटी आयोजन के दौरान उन्होंने एक लड़की को रोते हुए देखा। वह दृश्य उनके ज़ेहन में गहरे उतर गया और उन्होंने उस भावनात्मक पल को 'कुड़ियों रोया ना करो' गीत के रूप में शब्दों में ढाल दिया। यह गीत बाद में उनके एक एल्बम का हिस्सा बना और श्रोताओं ने इसे भरपूर सराहा।
कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया था और इसी दौरान 'सरताज' को अपना तखल्लुस — यानी शायराना नाम — बनाया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बन गया। उनके संगीत में सूफी चिंतन, पंजाबी लोक रंग और काव्य का त्रिवेणी संगम साफ़ झलकता है।
अंतरराष्ट्रीय पहचान और बड़े मुकाम
शुरुआती दौर में छोटे मंचों से सफर शुरू करने वाले सरताज का बड़ा मोड़ 2008 के आसपास आया, जब कनाडा के टोरंटो में एक आयोजन के प्रबंधकों ने इंटरनेट पर उनका गाना सुनकर उन्हें प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय कॉन्सर्ट का सिलसिला बढ़ता चला गया।
2010 में रिलीज़ हुए सूफी गीत 'साईं' ने उन्हें घर-घर की पहचान दिलाई। 2014 में उन्होंने लंदन के प्रतिष्ठित रॉयल अल्बर्ट हॉल में प्रस्तुति दी — जो उनके करियर की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में शुमार है।
पुरस्कार और अभिनय की दुनिया
सरताज को उनके संगीत के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। 2011 में ब्रिट एशिया टीवी म्यूजिक अवॉर्ड्स में बेस्ट इंटरनेशनल एक्ट का पुरस्कार मिला। 2017 में बेस्ट सॉन्गराइटर और 2018 में 'उड़ारियां' के लिए म्यूजिक वीडियो ऑफ द ईयर का सम्मान प्राप्त हुआ।
संगीत के बाद उन्होंने अभिनय में भी कदम रखा। 2017 की फिल्म 'द ब्लैक प्रिंस' में उन्होंने महाराजा दलीप सिंह की भूमिका निभाई। इसके बाद 'इक्को मिक्के', 'काली जोट्टा', 'शायर' जैसी पंजाबी फिल्मों में भी उनकी उपस्थिति रही। सतिंदर सरताज की यह यात्रा बताती है कि असली कलाकार वह होता है जो रोज़मर्रा के पलों में भी कविता खोज लेता है।