सौरभ राज जैन: अभिनय में आवाज की मॉड्यूलेशन पर मेरा ध्यान नहीं होता
सारांश
Key Takeaways
- अभिनय में भावनाओं का महत्व
- कैमरे के सामने स्वाभाविकता
- अवाज की मॉड्यूलेशन का स्वाभाविक होना
- रेडियो में काम करने का अनुभव
- किरदार की स्थिति को समझना
मुंबई, ६ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। ओटीटी प्लेटफॉर्म के उभरते युग में कलाकारों के काम करने के तरीके में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। पहले जहां टीवी और फिल्मों में अभिनय के लिए विभिन्न प्रकार की तैयारी की जाती थी, वहीं अब वेब सीरीज और डिजिटल सामग्री में कलाकारों से अधिक भावनात्मक अभिनय की अपेक्षा की जाती है। इसी संदर्भ में, टीवी और ओटीटी के प्रसिद्ध अभिनेता सौरभ राज जैन ने राष्ट्र प्रेस को दिए एक इंटरव्यू में अपने अभिनय के दृष्टिकोण पर रोचक बातें साझा की हैं।
सौरभ राज जैन ने कहा, "जब मैं कैमरे के सामने अभिनय करता हूं, तो मैं अपनी आवाज की मॉड्यूलेशन पर ज्यादा ध्यान नहीं देता। मेरा मानना है कि अगर कलाकार उस क्षण और भावना में पूरी तरह डूब जाए, तो आवाज का उतार-चढ़ाव अपने आप सही तरीके से प्रकट हो जाता है।"
उन्होंने आगे कहा, "अभिनय की मुख्य ताकत भावनाएं होती हैं। जब मैं किसी पात्र का अभिनय करता हूं, तो पहले उस पात्र की स्थिति और भावनाओं को समझने की कोशिश करता हूं। यदि किसी दृश्य में गुस्सा, दुःख, खुशी या किसी अन्य भावना की आवश्यकता होती है, तो मैं उसी भावना में खुद को समाहित कर लेता हूं। ऐसे में आवाज को अलग से बदलने की आवश्यकता कम पड़ती है, क्योंकि भावनाएं ही आवाज के स्वर को निर्धारित करती हैं।"
सौरभ ने यह भी बताया कि उन्होंने रेडियो में भी काम किया है। इस पर उन्होंने कहा, "रेडियो में कलाकार को केवल आवाज के माध्यम से ही कहानी और भावनाओं को दर्शकों तक पहुँचाना होता है। यही कारण है कि मैं आवाज को अत्यधिक प्रभावशाली मानता हूं। जब मैं टीवी या वेब सीरीज के लिए अभिनय करता हूं, तो मैं केवल आवाज पर निर्भर नहीं रहता। कैमरे के सामने चेहरे के भाव, आंखों की भाषा और शरीर की प्रतिक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।"
अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा, "यदि किसी दृश्य में आवाज के उतार-चढ़ाव की आवश्यकता होती है, तो मैं उसे खुद संभाल लेता हूं। इसके लिए मुझे पहले से यह सोचने की आवश्यकता नहीं होती कि किस शब्द पर आवाज ऊंची करनी है या किस लाइन को धीमा रखना है। यदि कलाकार उस क्षण में पूरी तरह उपस्थित है और दृश्य की भावना को सही ढंग से महसूस कर रहा है, तो आवाज की मॉड्यूलेशन स्वाभाविक रूप से सामने आ जाती है। यही असली अभिनय है, जिसमें कलाकार अपनी भावनाओं को बिना किसी बनावट के दर्शकों तक पहुँचाता है।"