सुप्रीम कोर्ट की AIIMS और केंद्र को अवमानना चेतावनी, 15 वर्षीय नाबालिग के गर्भपात आदेश की अनदेखी पर

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सुप्रीम कोर्ट की AIIMS और केंद्र को अवमानना चेतावनी, 15 वर्षीय नाबालिग के गर्भपात आदेश की अनदेखी पर

सारांश

सुप्रीम कोर्ट का 24 अप्रैल का आदेश था — 15 वर्षीय नाबालिग की 28 सप्ताह की गर्भावस्था खत्म करो। एम्स ने पुनर्विचार याचिका दायर की, जो खारिज हुई। अब अवमानना की तलवार लटक रही है। यह मामला सिर्फ एक नाबालिग का नहीं, बल्कि MTP कानून की सीमाओं और संस्थागत जवाबदेही का आईना है।

Key Takeaways

सुप्रीम कोर्ट ने 30 अप्रैल 2026 को एम्स, नई दिल्ली और केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने 4 मई 2026 तक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का आदेश दिया। 24 अप्रैल 2026 के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली हाई कोर्ट के इनकार को पलटते हुए 28 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी थी। नाबालिग लड़की ने गर्भावस्था का पता चलने के बाद कथित तौर पर दो बार आत्महत्या का प्रयास किया था। एम्स की पुनर्विचार और क्यूरेटिव याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट ने सख्त शब्दों में खारिज कर दीं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने केंद्र से MTP कानून में संशोधन कर बलात्कार जनित गर्भावस्था पर समय-सीमा हटाने का आग्रह किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने 30 अप्रैल 2026 को एम्स, नई दिल्ली और केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव को अवमानना कार्यवाही की कड़ी चेतावनी दी, क्योंकि 15 वर्षीय नाबालिग की 28 सप्ताह की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने के 24 अप्रैल 2026 के आदेश का अनुपालन अब तक नहीं किया गया। नाबालिग की माँ द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने 4 मई तक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होने का निर्देश दिया।

मुख्य घटनाक्रम

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने नाबालिग की माँ की अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के निदेशक को 4 मई 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का आदेश दिया। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

Point of View

बल्कि भारत की सर्वोच्च संस्थाओं के बीच टकराव का दर्पण है — जहाँ एम्स जैसा प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने की स्थिति में पहुँच गया। यह सवाल उठता है कि क्या चिकित्सा संस्थाएँ नैतिक आपत्ति की आड़ में न्यायिक निर्देशों को दरकिनार कर सकती हैं। मुख्य न्यायाधीश की MTP कानून संशोधन की अपील दशकों पुरानी माँग को फिर से सामने लाती है, लेकिन संसद की चुप्पी बताती है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति अभी भी अधूरी है। जब तक कानून और संस्थागत जवाबदेही में तालमेल नहीं बैठता, ऐसे मामले अदालतों में आते रहेंगे और पीड़ित न्याय की प्रतीक्षा में।
NationPress
30/04/2026

Frequently Asked Questions

सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय नाबालिग के गर्भपात मामले में क्या आदेश दिया था?
सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट के इनकार को पलटते हुए 15 वर्षीय नाबालिग की 28 सप्ताह की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी। अदालत ने कहा कि नाबालिग की प्रजनन स्वायत्तता को 'सबसे ज्यादा महत्व' मिलना चाहिए और अनचाही गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है।
एम्स ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन क्यों नहीं किया?
एम्स ने सुप्रीम कोर्ट के 24 अप्रैल 2026 के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसे अदालत ने सख्त शब्दों में खारिज कर दिया। इसके बाद एम्स की क्यूरेटिव याचिका भी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने अस्वीकार कर दी। अदालत ने इसे असाधारण और आपत्तिजनक बताया।
अवमानना कार्यवाही में आगे क्या होगा?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव और एम्स निदेशक को 4 मई 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का निर्देश दिया है। यदि तब तक आदेश का पालन नहीं हुआ, तो अदालत अवमानना के आरोप तय करेगी — हालाँकि आरोप तय करने से पहले संबंधित पक्षों को सुना जाएगा।
MTP कानून में संशोधन की माँग क्यों उठ रही है?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने केंद्र से आग्रह किया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी कानून में संशोधन कर बलात्कार या यौन उत्पीड़न जनित गर्भावस्था के मामलों में समय-सीमा की बाधा हटाई जाए। अदालत ने कहा कि कानून को 'लचीला और बदलते समय के साथ तालमेल बिठाने वाला' होना चाहिए।
इस मामले में नाबालिग की स्थिति क्या थी?
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, 15 वर्षीय नाबालिग लड़की ने गर्भावस्था का पता चलने के बाद कथित तौर पर दो बार आत्महत्या का प्रयास किया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके 'गरिमा के साथ जीने के अधिकार पर सीधा हमला' होगा और इससे गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात पहुँचेगा।
Nation Press