भारतीय सिनेमा की प्रिय अदाकारा 'शम्मी आंटी': नरगिस रबादी का नाम कैसे पड़ा, जानें 'मदर इंडिया' की कहानी
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई, 5 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे सितारे हैं, जिन्होंने लीड रोल में ज्यादा समय नहीं बिताया, लेकिन उनके सहायक किरदारों ने फिल्मों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से एक अदाकारा हैं, जिन्हें 'शम्मी आंटी' के नाम से जाना जाता है।
शम्मी आंटी, जिनका असली नाम नरगिस रबादी है, की पुण्यतिथि 6 मार्च को है। उन्होंने पांच दशकों तक अपने अनूठे अंदाज में हंसी, अपनापन और मासूमियत को बड़े पर्दे पर प्रस्तुत किया। उनकी अदाकारी ने उन्हें दर्शकों के बीच खास स्थान दिलाया। लेकिन यह नाम 'शम्मी' कैसे पड़ा, यह एक दिलचस्प कहानी है जिसमें 'मदर इंडिया', यानी नरगिस दत्त की भूमिका अहम है।
नरगिस रबादी का जन्म 24 अप्रैल 1929 को बॉम्बे (अब मुंबई) में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता धार्मिक कार्यों में सक्रिय थे, लेकिन जब वह तीन साल की थीं, उनके पिता का निधन हो गया। उनकी मां ने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए पारसी धार्मिक सभाओं में भोजन बनाना शुरू किया। नरगिस की बड़ी बहन मणि रबादी एक प्रसिद्ध फैशन डिजाइनर थीं।
माध्यमिक शिक्षा के बाद नरगिस ने एक कंपनी में सचिव के रूप में कार्य किया। 1949 में, 18 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'उस्ताद पेड्रो' साइन की। अभिनेता-निर्माता शेख मुख्तार को दूसरी मुख्य अभिनेत्री की तलाश थी, और उन्होंने नरगिस की प्रतिभा को पहचाना। लेकिन नाम बदलने की आवश्यकता थी क्योंकि उस समय नरगिस दत्त पहले से ही मशहूर थीं। इस कारण नरगिस रबादी ने अपना नाम 'शम्मी' रख लिया। इस प्रकार, 'मदर इंडिया' की वजह से उन्हें यह नाम मिला, जो बाद में सिनेमा की पहचान बन गया।
नरगिस रबादी को 'उस्ताद पेड्रो' के बाद 'मल्हार' में मुख्य भूमिका मिली, जो अपने गानों के कारण बहुत सफल रही। उन्होंने दिलीप कुमार, नरगिस दत्त और कई अन्य नामी हस्तियों के साथ दोस्ती की। नरगिस दत्त उनकी सबसे करीबी दोस्त बनीं। 30 साल की उम्र में नरगिस ने फिल्म निर्माता सुल्तान अहमद से विवाह किया, लेकिन सात साल बाद उनका तलाक हो गया। उनके कोई संतान नहीं थी।
शम्मी ने 50 के दशक में लीड रोल में शुरुआत की और फिर सपोर्टिंग रोल में भी चमकीं। 'दिल अपना और प्रीत पराई', 'हाफ टिकट', 'द ट्रेन', 'कुदरत', 'हम साथ-साथ हैं' जैसी फिल्मों में उनके अनोखे किरदार दर्शकों को याद रहते हैं। 90 और 2000 के दशक में, उन्होंने 'कुली नंबर 1', 'हम', 'मर्दों वाली बात', 'गुरुदेव', 'गोपी किशन' जैसी फिल्मों में दादी के रोल में भी प्रशंसा प्राप्त की। उन्होंने 200 से अधिक फिल्मों में काम किया।
फिल्मों के साथ-साथ, वह टीवी पर भी उतनी ही लोकप्रिय रहीं। 'देख भाई देख', 'जबान संभाल के', 'श्रीमान श्रीमती', 'कभी ये कभी वो', 'फिल्मी चक्कर' जैसे शोज़ में उनकी कॉमेडी की सराहना हुई। साल 2013 में, 'शिरीन फरहाद की तो निकल पड़ी' में वह बोमन ईरानी के साथ नजर आईं।
6 मार्च 2018 को, 88 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा।