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श्वेता त्रिपाठी की फिल्म 'मुझे जान ना कहो मेरी जान' बर्लिन से TIFF 2026 तक, प्रोड्यूसर बनने का बदला नज़रिया

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श्वेता त्रिपाठी की फिल्म 'मुझे जान ना कहो मेरी जान' बर्लिन से TIFF 2026 तक, प्रोड्यूसर बनने का बदला नज़रिया

सारांश

श्वेता त्रिपाठी ने निर्माता के रूप में अपनी पहली फीचर फिल्म को बर्लिन से टोरंटो (TIFF 2026) तक पहुँचाकर साबित किया कि स्वतंत्र भारतीय सिनेमा की वैश्विक भूख बढ़ रही है। संजय नाग की इस क्वीर लव स्टोरी के ज़रिए उनका नज़रिया अभिनय से आगे बढ़ा है।

मुख्य बातें

श्वेता त्रिपाठी की बतौर निर्माता पहली फीचर फिल्म 'मुझे जान ना कहो मेरी जान' बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से TIFF 2026 तक पहुँची।
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक संजय नाग की यह क्वीर लव स्टोरी तिलोत्तमा शोम और श्वेता त्रिपाठी अभिनीत है।
श्वेता ने 2010 में थिएटर प्रोडक्शन कंपनी 'ऑलमाइटी' की स्थापना की थी, जिसकी पहली प्रस्तुति ओलिवियर अवॉर्ड विजेता नाटककार माइक बार्टलेट का नाटक 'कॉक' था।
निर्माता की भूमिका ने श्वेता को फिल्म निर्माण के बाद उसकी वितरण-यात्रा और दर्शकों तक पहुँचने की प्रक्रिया को नए नज़रिये से समझने का अवसर दिया।
दोनों प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय फेस्टिवल — बर्लिनाले और TIFF — वैश्विक स्वतंत्र सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित मंचों में गिने जाते हैं।

अभिनेत्री श्वेता त्रिपाठी बतौर निर्माता अपनी पहली फीचर फिल्म 'मुझे जान ना कहो मेरी जान' को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ले जाने में कामयाब रही हैं। इस साल की शुरुआत में बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से अपना सफर शुरू करने वाली यह फिल्म अब टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (TIFF) 2026 तक पहुँच गई है। श्वेता ने कहा है कि निर्माता की भूमिका में कदम रखने के बाद कहानी कहने को लेकर उनका पूरा दृष्टिकोण बदल गया है।

बर्लिन से TIFF तक का सफर

श्वेता त्रिपाठी ने कहा, 'आप जिस फिल्म पर भरोसा करते हैं, उसे किसी इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म तक ले जाना अपने आप में खास होता है — खासकर तब, जब बतौर प्रोड्यूसर यह आपकी पहली फीचर फिल्म हो। बर्लिन से टोरंटो तक का सफर मेरे लिए बेहद खास रहा है, क्योंकि इस दौरान मुझे इस फिल्म को एक अलग तरीके से पेश करने का मौका मिला।'

यह उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि दोनों ही महोत्सव — बर्लिनाले और TIFF — वैश्विक स्तर पर स्वतंत्र और कला फिल्मों के लिए सबसे प्रतिष्ठित मंचों में गिने जाते हैं। किसी भारतीय पहली बार निर्माता के लिए इन दोनों जगहों पर अपनी फिल्म पहुँचाना बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

निर्माता की भूमिका ने बदला कहानी देखने का नज़रिया

श्वेता ने बताया कि एक अभिनेत्री और एक निर्माता के नज़रिये में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। उन्होंने कहा, 'एक एक्टर के तौर पर आप किसी किरदार और कहानी को पर्दे पर जीवंत करने में पूरी तरह जुटे रहते हैं। प्रोड्यूसर के तौर पर आपको यह भी देखना होता है कि फिल्म बनने के बाद उसका सफर कैसा होगा, कौन लोग इससे जुड़ सकते हैं और आप फिल्म को उसके दर्शकों तक पहुँचाने के लिए किस तरह मौके बना सकते हैं।'

उन्होंने आगे कहा, 'जब आप फिल्म को बनाने की प्रक्रिया से आगे बढ़कर देखते हैं, तो मन में यह सवाल आने लगते हैं — फिल्म किन लोगों तक पहुँचेगी, इसके ज़रिए किस तरह की बातचीत शुरू हो सकती है और आगे इसके लिए क्या-क्या संभावनाएँ हैं। यह मेरे लिए सीखने का शानदार अनुभव रहा है।'

फिल्म के बारे में

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्ममेकर संजय नाग के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक क्वीर लव स्टोरी है, जिसमें तिलोत्तमा शोम और श्वेता त्रिपाठी मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म में प्यार और इंसानी रिश्तों को ईमानदारी और बारीकी से दर्शाने की कोशिश की गई है। गौरतलब है कि स्वतंत्र सिनेमा के क्षेत्र में क्वीर कथाओं को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर तेज़ी से पहचान मिल रही है।

थिएटर से शुरू हुई प्रोड्यूसर की राह

बतौर निर्माता श्वेता का सफर वर्ष 2010 में शुरू हुआ, जब उन्होंने अपनी थिएटर प्रोडक्शन कंपनी 'ऑलमाइटी' की स्थापना की। इसकी पहली प्रस्तुतियों में ओलिवियर अवॉर्ड विजेता ब्रिटिश नाटककार माइक बार्टलेट का क्वीर ड्रामा 'कॉक' शामिल था। यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय स्वतंत्र फिल्म निर्माता वैश्विक बाज़ार में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय मंचों का महत्त्व

श्वेता ने ज़ोर देते हुए कहा कि 'इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और मार्केट ऐसे लोगों को एक साथ लाते हैं, जो इन संभावनाओं को हकीकत में बदलने में मदद कर सकते हैं। अपनी पहली प्रोडक्शन को इन प्लेटफॉर्म पर पेश कर पाना मेरे लिए एक अहम कदम रहा है।' आगे वह देखने के लिए उत्साहित हैं कि इस वैश्विक यात्रा का फिल्म के भविष्य के लिए क्या मतलब निकलता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि कहानियों की मालिक भी बन रही हैं। यह ऐसे समय में और महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब मुख्यधारा बॉलीवुड में क्वीर कथाओं को अभी भी हाशिये पर रखा जाता है। बर्लिनाले और TIFF जैसे मंचों तक पहुँचना व्यावसायिक सफलता से परे, एक वैकल्पिक वितरण पारिस्थितिकी बनाने की कोशिश है। असली सवाल यह है कि क्या यह फिल्म भारत में भी अपने दर्शकों तक उतनी ही सहजता से पहुँच पाएगी, जितनी आसानी से यह वैश्विक मंचों तक पहुँची है।
RashtraPress
23 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'मुझे जान ना कहो मेरी जान' फिल्म किस बारे में है?
यह राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक संजय नाग द्वारा निर्देशित एक क्वीर लव स्टोरी है, जिसमें तिलोत्तमा शोम और श्वेता त्रिपाठी मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म में प्यार और इंसानी रिश्तों को ईमानदारी और बारीकी के साथ दर्शाया गया है।
श्वेता त्रिपाठी ने प्रोड्यूसर के रूप में अपनी यात्रा कब शुरू की?
श्वेता ने बतौर निर्माता वर्ष 2010 में थिएटर प्रोडक्शन कंपनी 'ऑलमाइटी' की स्थापना के साथ अपना सफर शुरू किया था। 'मुझे जान ना कहो मेरी जान' उनकी बतौर निर्माता पहली फीचर फिल्म है।
यह फिल्म किन-किन अंतर्राष्ट्रीय फेस्टिवलों में प्रदर्शित हुई है?
फिल्म ने इस साल की शुरुआत में बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से अपना अंतर्राष्ट्रीय सफर शुरू किया और अब टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (TIFF) 2026 तक पहुँच गई है। दोनों ही महोत्सव वैश्विक स्वतंत्र सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित मंचों में शुमार हैं।
प्रोड्यूसर बनने के बाद श्वेता त्रिपाठी का नज़रिया कैसे बदला?
श्वेता के अनुसार, एक अभिनेत्री के रूप में ध्यान सिर्फ किरदार को जीवंत करने पर होता है, जबकि निर्माता के रूप में यह सोचना ज़रूरी हो जाता है कि फिल्म किन लोगों तक पहुँचेगी और इसके ज़रिए किस तरह की बातचीत शुरू हो सकती है। उन्होंने इसे सीखने का शानदार अनुभव बताया।
फिल्म की 'ऑलमाइटी' प्रोडक्शन कंपनी की पहली प्रस्तुति क्या थी?
'ऑलमाइटी' की पहली प्रस्तुतियों में ओलिवियर अवॉर्ड विजेता ब्रिटिश नाटककार माइक बार्टलेट का क्वीर ड्रामा 'कॉक' शामिल था। यह थिएटर से शुरू हुई उस यात्रा का हिस्सा था जो आज फीचर फिल्म निर्माण तक पहुँची है।
राष्ट्र प्रेस
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