उत्पल दत्त: थिएटर के लिए पैसे जुटाने की कोशिश में सिनेमा में करियर
सारांश
Key Takeaways
- उत्पल दत्त को उनके हास्य और गंभीरता के लिए जाना जाता था।
- उन्होंने थिएटर के लिए पैसे जुटाने के उद्देश्य से फिल्में कीं।
- उनके अभिनय ने दर्शकों को हमेशा मंत्रमुग्ध किया।
- उत्पल दत्त ने बांग्ला और हिंदी सिनेमा दोनों में काम किया।
- उन्हें जादूगर कहा जाता था।
मुंबई, 28 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। उत्पल दत्त को उनकी विशाल आंखें, घनी मूंछें और गहरी आवाज के लिए जाना जाता था, जो उन्हें स्क्रीन पर एक खलनायक के रूप में प्रस्तुत करती थीं। लेकिन जब वह डायलॉग बोलते थे, तो दर्शकों की हंसी अपनेआप फूट पड़ती थी। उत्पल दत्त ऐसे कुछ कलाकारों में से थे जो अभिनय की गंभीरता में हास्य का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत करते थे। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान और उनके प्रसिद्ध 'अच्छा...' जैसे शब्द किरदार को जीवंत बना देते थे।
इस महान कलाकार की जयंती 29 मार्च को मनाई जाती है। इन्हें अभिनय का जादूगर कहा जाना बिल्कुल उचित है। हिंदी और बांग्ला सिनेमा के दिग्गज अभिनेता उत्पल दत्त मुख्य रूप से रंगमंच के प्रति अपने प्रेम के लिए जाने जाते थे। उन्होंने कहा था कि वह थिएटर करने के लिए फिल्में करते हैं ताकि खर्च निकाल सकें।
उत्पल दत्त ऐसे अभिनेता थे जिनके लगभग सभी किरदार यादगार बन गए। वह अभिनय को अपनी जीवनशैली बना चुके थे। चाहे हिंदी हो या बांग्ला सिनेमा, वह हर भूमिका में सहजता से समा जाते थे। जब उन्होंने हिंदी फिल्मों में कदम रखा, तब उनकी उम्र नायक के रोल के लिए उपयुक्त नहीं थी, इसलिए उन्होंने चरित्र भूमिकाएं निभाई। यह भूमिकाएं निभाना सबसे बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि सामान्य दर्शक पिता, ससुर, मकान मालिक या दफ्तर के बॉस जैसे किरदारों को और उन्हें निभाने वाले कलाकार को आसानी से याद नहीं रख पाते, लेकिन उत्पल दत्त अपने अभिनय की वजह से हमेशा याद रहते थे। उनकी तीखी आंखें, भौंहों का उतार-चढ़ाव, होंठों की थर्राहट और चेहरे के हाव-भाव दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते थे।
उत्पल दत्त 40 के दशक में नाटक निर्देशक जेफ्री कैंडल के रंगमंच समूह से जुड़े और उन्होंने शेक्सपियर के अंग्रेजी नाटकों में अभिनय किया। 1949 में, उन्होंने अपना नाट्य समूह बनाया और फिर इप्टा से जुड़े। उन दिनों वह बंगाल में नुक्कड़ नाटकों में सक्रिय थे। बाद में उन्होंने अंगार, कल्लोल, दिन बदलेर पाला, तीवेर तलवार, बैरिकेड और दुस्वप्नेर नगरी जैसे कालजयी नाटकों में अभिनय किया।
उनका फिल्मी सफर 1950 में बांग्ला फिल्म 'माइकल मधुसूदन दत्त' से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन भी किया। यह फिल्म 19वीं सदी के प्रसिद्ध कवि और नाटककार माइकल मधुसूदन दत्त की जिंदगी पर आधारित थी। इसके बाद उन्होंने 19 साल तक बांग्ला फिल्मों में सक्रियता दिखाई। उनकी कुछ यादगार बांग्ला फिल्में हैं- पालक, भालू बासा दत्ता, हीरक राजा आदेशे, अमानुष, जन अरण्य और वैशाखी मेघ।
हिंदी सिनेमा में उनका प्रवेश मृणाल सेन की फिल्म 'भुवन शोम' (1969) से हुआ। इस फिल्म में उन्होंने रेलवे के सख्त अफसर भुवन शोम का किरदार निभाया। शिकार के लिए सौराष्ट्र आने पर एक ग्रामीण युवती गौरी से उनकी मुलाकात होती है और उनकी जिंदगी बदल जाती है। यह फिल्म समानांतर सिनेमा की शुरुआत मानी जाती है और सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार जीती।
उत्पल दत्त की हिंदी फिल्मों में 'शौकीन' (बासु चटर्जी निर्देशित) भी खास रही। इसमें वह तीन बुजुर्गों में से एक थे जो जीवन में रोमांस की तलाश कर रहे थे। अन्य दो थे दादा मुनी और अशोक कुमार। फिल्म में रति अग्निहोत्री और मिथुन चक्रवर्ती भी थे। वह कमर्शियल फिल्मों के साथ-साथ सार्थक सिनेमा भी करते रहे। सत्यजीत रे की 'आगंतुक' और गौतम घोष की 'पद्मा नदीर माझी' में उन्होंने यादगार भूमिका निभाई। 'पद्मा नदीर माझी' उनकी अंतिम दौर की फिल्म मानी जाती है। अमिताभ बच्चन की शुरुआती फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' में भी वे थे। अन्य फिल्मों में 'गुड्डी' और 'अमानुष' शामिल हैं।
उत्पल दत्त को शुरू में हिंदी उच्चारण में दिक्कत थी, क्योंकि वे बांग्ला पृष्ठभूमि से थे लेकिन वह अपने काम के प्रति इतने समर्पित थे कि उन्होंने किताबें पढ़कर और लोगों से बात करके अपने बांग्ला उच्चारण दोष को पूरी तरह सुधार लिया। वे शिष्ट हास्य पर विश्वास करते थे। शरीर को तोड़-मरोड़कर या अतिरेक रचकर हंसी पैदा करना उन्हें पसंद नहीं था। वे सामान्य व्यक्ति की जिंदगी में आने वाली परिस्थितियों से हास्य रचते थे।
उत्पल दत्त 19 अगस्त 1993 को इस दुनिया से गए।