क्या 30 पार करने के बाद भूलने की आदत बढ़ रही है? इन आदतों से दिमाग रहेगा तेज
सारांश
Key Takeaways
- नींद को प्राथमिकता दें।
- सही आहार का सेवन करें।
- नियमित व्यायाम करें।
- दिमाग को नई चुनौतियाँ दें।
- तनाव को समझें और प्रबंधित करें।
नई दिल्ली, 12 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। वर्तमान की तेज़ रफ्तार जिंदगी में जब लोग 30 वर्ष की उम्र पार करते हैं, तो अक्सर थकावट, भूलने की समस्या, चिड़चिड़ापन और ध्यान की कमी को सामान्य मानने लगते हैं। काम का दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, मोबाइल स्क्रीन और अनियमित दिनचर्या धीरे-धीरे दिमाग पर नकारात्मक प्रभाव डालने लगती हैं। आयुर्वेद इसे प्रज्ञापराध के रूप में वर्णित करता है, जिसका अर्थ है कि जब इंसान अपनी बुद्धि, शरीर और मन की आवश्यकताओं को नजरअंदाज कर देता है।
वहीं, विज्ञान के अनुसार, 30 की उम्र के बाद दिमाग की कोशिकाओं पर तनाव, नींद की कमी और गलत जीवनशैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है। आयुर्वेद और विज्ञान दोनों इस बात पर सहमत हैं कि दिमाग वही बनता है, जैसा हम उसे रोज़ देते हैं।
सबसे पहले बात करें नींद की। आयुर्वेद में नींद को भूतधात्री कहा गया है। विज्ञान भी मानता है कि गहरी नींद के दौरान दिमाग अपने अंदर जमा टॉक्सिन्स को साफ करता है। 30 की उम्र के बाद अगर नींद पूरी नहीं होती, तो दिमाग की याददाश्त कमजोर होने लगती है और भावनाएं जल्दी बेकाबू हो जाती हैं। रोज़ एक ही समय पर सोना और जागना दिमाग को सुरक्षा का एहसास देता है। इससे हार्मोन बैलेंस में रहते हैं और दिमाग शांत रहता है। यह आदत धीरे-धीरे फोकस, सीखने की क्षमता और मूड को बेहतर बनाती है।
शरीर और मन का आपस में गहरा संबंध है। चलने-फिरने से दिमाग में खून का बहाव बढ़ता है, जिससे नई नर्व सेल्स मजबूत होती हैं। 30 के बाद भारी व्यायाम जरूरी नहीं है, बल्कि रोज़ टहलना, योग या हल्की स्ट्रेचिंग दिमाग को युवा बनाए रखने में सहायक होती है। इससे तनाव कम होता है और दिमाग को संकेत मिलता है कि शरीर सुरक्षित है।
आयुर्वेद में कहा गया है कि जैसा अन्न, वैसा मन। अत्यधिक मीठा, तला-भुना और पैकेट वाला खाना दिमाग में सूजन को बढ़ाता है। विज्ञान इसे ब्रेन इंफ्लेमेशन कहता है, जिससे ध्यान और याददाश्त पर असर पड़ता है। 30 के बाद दिमाग को प्रोटीन, अच्छे फैट्स, साबुत अनाज और ताज़ी सब्जियों की आवश्यकता होती है। घी, मेवे और पर्याप्त पानी दिमाग को चिकनाई और ताकत प्रदान करते हैं। सही आहार दिमाग को स्थिर, तेज़ और संतुलित बनाता है।
दिमाग को रोज़ नई चुनौती देना भी आवश्यक है। आयुर्वेद में इसे मेधा वृद्धि कहा गया है, यानी बुद्धि को बढ़ाना। विज्ञान के अनुसार, जब दिमाग कुछ नया सीखता है, तो इसकी नसों के बीच नए रास्ते बनते हैं। 30 के बाद यदि दिमाग को केवल मोबाइल स्क्रीन मिलती है, तो वह सुस्त हो जाता है। पढ़ाई, लेखन, नई भाषा या कोई नया कौशल सीखना दिमाग को सक्रिय रखता है। इससे सोचने की क्षमता बनी रहती है और उम्र के साथ आने वाली भूलने की समस्या कम होती है।
आयुर्वेद में तनाव को वात दोष का असंतुलन माना गया है। विज्ञान भी मानता है कि लगातार तनाव का प्रभाव दिमाग को हमेशा खतरे की स्थिति में रखता है। इससे नींद और याददाश्त बिगड़ती है। रोज़ गहरी सांस लेना, प्रकृति में समय बिताना और अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय समझना दिमाग को आराम देता है। तनाव को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे धीरे-धीरे पचाना ही दिमाग की सही सेहत है।