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आपके भोजन का सही संतुलन: आयुर्वेद से समझें स्वाद का महत्व

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आपके भोजन का सही संतुलन: आयुर्वेद से समझें स्वाद का महत्व

सारांश

आयुर्वेद के अनुसार, सही और संतुलित भोजन न केवल स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, बल्कि यह कई बीमारियों से भी बचाता है। जानें कैसे विभिन्न स्वादों का संतुलन आपके जीवन को बेहतर बना सकता है।

मुख्य बातें

संतुलित भोजन बीमारी से बचाता है।
आहार में सभी छह स्वादों का होना चाहिए।
अत्यधिक सेवन से स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।
पेट को तीन हिस्सों में बांटना चाहिए।
आयुर्वेद भोजन के संतुलन पर जोर देता है।

नई दिल्ली, 5 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। आयुर्वेद के अनुसार, भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि यह शरीर को पोषण देने, ऊर्जा प्रदान करने और शरीर के संतुलन को बनाए रखने का एक उपाय भी है। इसलिए इसे महाभैषज्य (सर्वोत्तम औषधि) के रूप में देखा जाता है। यदि हमारा आहार सही और संतुलित है, तो हम कई बीमारियों से अपने-आप को सुरक्षित रख सकते हैं।

इसलिए यह समझना आवश्यक है कि हम क्या खा रहे हैं, कितनी मात्रा में खा रहे हैं और किस तरह से खा रहे हैं।

आयुर्वेद में बताया गया है कि हमारे दैनिक भोजन में छह प्रकार के स्वादमधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला)—का उचित संतुलन आवश्यक है। इसे षड्रस कहा जाता है। जब हम इन सभी स्वादों को संतुलित मात्रा में लेते हैं, तो शरीर के तीनों दोष—वात, पित्त और कफ—संतुलित रहते हैं।

उदाहरण के लिए, मीठा स्वाद शक्ति और ऊतकों को पोषण प्रदान करता है। खट्टा स्वाद भूख बढ़ाता है और पाचन में सुधार करता है। नमकीन स्वाद भोजन को स्वादिष्ट बनाता है और शरीर में तरलता बनाए रखता है। इसी प्रकार, तीखा स्वाद पाचन को तेज करता है और शरीर में जमा कफ को कम करता है। कड़वा स्वाद शरीर को साफ करने में मदद करता है और खून को शुद्ध करता है, जबकि कसैला स्वाद ठंडक प्रदान करता है और त्वचा से जुड़ी समस्याओं में फायदेमंद माना जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार, किसी भी स्वाद का अत्यधिक सेवन हानिकारक हो सकता है। जैसे, यदि हम अधिक मीठा खाते हैं, तो हमें मोटापा, सुस्ती और मधुमेह जैसी समस्याएं हो सकती हैं। अधिक नमक के सेवन से बालों का जल्दी सफेद होना और शरीर में सूजन आ सकती है। इसी तरह, अत्यधिक तीखा या मसालेदार भोजन पित्त को बढ़ा सकता है और पेट की समस्याएं उत्पन्न कर सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम हर स्वाद को संतुलित मात्रा में लें।

आयुर्वेद भोजन की मात्रा पर भी ध्यान देता है। कहा जाता है कि पेट को तीन हिस्सों में बांटना चाहिए। दो हिस्से ठोस भोजन के लिए, एक हिस्सा तरल के लिए और एक हिस्सा खाली छोड़ना चाहिए ताकि भोजन आसानी से पच सके। यदि हम जरूरत से ज्यादा खाते हैं, तो पाचन तंत्र पर दबाव पड़ता है और गैस, एसिडिटी और अपच जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी सशक्त बनाता है। हमें विशेषज्ञों की सलाह को ध्यान में रखते हुए अपने आहार को संतुलित करना चाहिए।
RashtraPress
24 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आयुर्वेद के अनुसार भोजन में किन स्वादों का होना जरूरी है?
आयुर्वेद में भोजन में मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय स्वाद का होना जरूरी है।
क्या अत्यधिक मीठा खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है?
हाँ, अत्यधिक मीठा खाने से मोटापा, सुस्ती और मधुमेह जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
आहार में संतुलन बनाए रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
हमें भोजन में विभिन्न स्वादों को संतुलित मात्रा में लेना चाहिए और उचित मात्रा में खाना चाहिए।
आयुर्वेद में भोजन की मात्रा को कैसे नियंत्रित करना चाहिए?
पेट को तीन भागों में बांटकर दो हिस्से ठोस भोजन के लिए, एक हिस्सा तरल के लिए और एक हिस्सा खाली छोड़ना चाहिए।
क्या आयुर्वेद में भोजन केवल पेट भरने के लिए है?
नहीं, आयुर्वेद में भोजन को शरीर को पोषण और ऊर्जा देने का माध्यम माना गया है।
राष्ट्र प्रेस
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