टाइफाइड का पाचन स्वास्थ्य से संबंध: आयुर्वेदिक उपायों से जानें लक्षणों को कम करने के तरीके
सारांश
Key Takeaways
- टाइफाइड का संबंध कमजोर पाचन शक्ति से है।
- गिलोय का रस इम्यूनिटी बढ़ाता है।
- तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा लाभकारी है।
- मुलेठी का सेवन खांसी और फेफड़ों को सुरक्षित रखता है।
- सुदर्शन चूर्ण बुखार को कम करने में मदद करता है।
नई दिल्ली, 12 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत में गर्मी और बरसात के मौसम के दौरान टाइफाइड या मियादी बुखार के मामलों में अचानक वृद्धि होती है, और इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।
टाइफाइड साधारण बुखार से भिन्न है और यही वजह है कि यह शरीर को अंदर से कमजोर कर देता है, जिससे कमजोरी कई दिनों तक बनी रहती है। यह एक संक्रामक बीमारी है जो शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करती है।
आयुर्वेद में देखा गया है कि टाइफाइड का संबंध मंद और कमजोर पाचन शक्ति से है। जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यधिक कम हो जाती है, तब कीटाणु आसानी से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। आधुनिक विज्ञान इसे साल्मोनेला टाइफी नामक बैक्टीरिया के कारण मानता है। यह बैक्टीरिया गंदे पानी और भोजन में मिलकर आंतों, रक्त, और लिवर पर तेजी से हमला करता है।
आयुर्वेद में टाइफाइड का मुकाबला करने के लिए कई उपाय सुझाए गए हैं, जिससे शरीर को बैक्टीरिया के संक्रमण से बचाया जा सकता है। पहला उपाय है गिलोय का रस, जो इम्यूनिटी बूस्टर की तरह कार्य करता है और तेज बुखार को कम करने में सहायक होता है। चिकित्सक की सलाह के साथ गिलोय का रस लेने से शरीर पर कई सकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।
तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा भी टाइफाइड में रोगों से लड़ने में मदद करता है। इसके लिए रोजाना तुलसी के पत्ते और चुटकी भर काली मिर्च तथा सोंठ का मिश्रण लाभकारी होता है। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। टाइफाइड में मुलेठी का सेवन खांसी और फेफड़ों को सुरक्षित रखने में सहायक होता है। मुलेठी का पानी या चबाने से खांसी में राहत मिलती है और गले की जलन से भी छुटकारा मिलता है।
टाइफाइड में फेफड़े कमजोर हो जाते हैं और सांस लेने में कठिनाई होती है। इस स्थिति में रोजाना मुलेठी का सेवन फायदेमंद रहेगा। इसके साथ ही सुदर्शन चूर्ण और लौंग के पानी का सेवन भी बुखार को कम करने में सहायता करता है।