क्या हरड़ को अमृत कहा जाना सही है? आयुर्वेद से जानें इसके अद्भुत लाभ
सारांश
Key Takeaways
- हरड़
- यह पाचन संबंधी समस्याओं में मदद करती है।
- हरड़ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है।
- अत्यधिक सेवन से साइड इफेक्ट हो सकते हैं।
- गर्भवती महिलाओं को चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।
नई दिल्ली, 21 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। आयुर्वेद में हरड़ (हरितकी) को 'अमृत' के समान माना गया है। इसका कारण है कि हरड़ न केवल एक विशेष बीमारी का उपचार करती है, बल्कि यह संपूर्ण शरीर को भीतर से संतुलित और मजबूत बनाती है। चरक संहिता में इसे त्रिदोष नाशक बताया गया है, जिसका अर्थ है कि यह वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को संतुलित रखने में सहायक है।
हरड़ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह शरीर की आवश्यकताओं के अनुसार काम करती है। यदि किसी को कब्ज है, तो यह आंतों की सफाई करती है, और यदि दस्त की समस्या है, तो आंतों को मजबूत बनाती है। इसी कारण इसे एक एडाप्टोजेनिक हर्ब कहा जाता है।
हरड़ शरीर का 'स्मार्ट मैकेनिक' है जो जहां गड़बड़ी होती है, वहीं सुधार शुरू कर देती है। पेट से जुड़ी अधिकांश समस्याओं जैसे गैस, अपच, एसिडिटी और भारीपन में हरड़ बेहद प्रभावी मानी जाती है।
आयुर्वेद के अनुसार, बीमारी की जड़ शरीर में जमा आम होती है, यानी अधपचा और विषैला पदार्थ। हरड़ इस आम को बाहर निकालने का कार्य करती है। जब शरीर साफ होता है, तो इसका प्रभाव त्वचा, बाल और आंखों पर भी साफ दिखाई देता है। चेहरे की रंगत में सुधार, मुंह के छालों का ठीक होना और बालों का झड़ना कम होना ये सब हरड़ के नियमित और सही उपयोग से संभव है। यही कारण है कि आयुर्वेद में इसे रसायन की श्रेणी में रखा गया है, जो शरीर को अंदर से नया बनाती है।
हरड़ को अमृत कहे जाने का एक बड़ा कारण इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना भी है। बदलते मौसम में बार-बार सर्दी-जुकाम होना, गले में कफ जमना या जल्दी थक जाना, इन सब में हरड़ शरीर की रक्षा ढाल की तरह काम करती है। यह लिवर को भी मजबूत करती है, जिससे खून साफ रहता है और ऊर्जा बनी रहती है।
हालांकि हरड़ जितनी लाभकारी है, उतनी ही सावधानी भी आवश्यक है। अत्यधिक मात्रा में लेने से दस्त या कमजोरी हो सकती है। गर्भवती महिलाओं और अत्यधिक कमजोर व्यक्तियों को इसका सेवन बिना वैद्य की सलाह के नहीं करना चाहिए।