मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का महत्व क्या है? आयुर्वेद में छिपा है इसका राज
सारांश
Key Takeaways
- मकर संक्रांति का पर्व एक खगोलीय घटना है।
- तिल और गुड़ का सेवन स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है।
- उत्तरायण के दौरान ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ती है।
- आयुर्वेद में तिल और गुड़ का महत्व है।
- वात दोष को संतुलित करने के लिए तिल का सेवन करें।
नई दिल्ली, 14 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 14 जनवरी को देश के विभिन्न हिस्सों में मकर संक्रांति का त्योहार पारंपरिक विधियों से मनाया जा रहा है।
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का सेवन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। यह केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि एक खगोलीय घटना है, जिसका असर पूरे ब्रह्मांड पर होता है। सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिससे दिन की लंबाई बढ़ती है।
जब सूर्य उत्तरायण होता है, तब शरीर को ऊर्जा की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, जो तिल और गुड़ के मिश्रण से प्राप्त होती है। इस समय सर्दी अपने चरम पर होती है, और मौसम साफ होते हुए भी ठंड का अनुभव तेज होता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय शरीर में वात का स्तर बढ़ता है, जिससे मांसपेशियों और हड्डियों से संबंधित समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसलिए, मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का सेवन करना पुरानी परंपरा है।
भारत के कुछ क्षेत्रों में बाजरे की खिचड़ी और उड़द दाल के साथ मौसमी सब्जियों के साथ खिचड़ी बनाने की परंपरा भी है। इन सभी व्यंजनों की तासीर गर्म होती है।
मकर संक्रांति के दौरान वात दोष की वृद्धि से जोड़ों और मांसपेशियों में जकड़न और ऐंठन होने लगती है, पाचन क्रिया धीमी हो जाती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है। आयुर्वेद में इन सभी समस्याओं से बचने के लिए तिल और गुड़ का सेवन किया जाता है।
तिल और गुड़ का सेवन शरीर में गर्मी और ऊर्जा लाता है, सर्दियों में होने वाले रूखेपन से बचाता है और वात को संतुलित करता है। गुड़ में आयरन की भरपूर मात्रा होती है, जो सर्दियों में शरीर में रक्त की कमी नहीं होने देता और ऊर्जा प्रदान करता है। आयुर्वेद में मकर संक्रांति पर तिल का सेवन करने से लेकर इसका तेल लगाने की सलाह दी जाती है। खासकर, बच्चों और बुजुर्गों को तिल के तेल से सर्दियों में जोड़ों की मालिश करनी चाहिए। यह सर्दी से सुरक्षा प्रदान करता है और गहराई से पोषण देकर मांसपेशियों को मजबूती देता है।