षट्कर्म योगासन: शारीरिक और मानसिक शुद्धि का एक अद्वितीय उपाय
सारांश
Key Takeaways
- षट्कर्म योगासन शारीरिक और मानसिक शुद्धि का उपाय है।
- यह हठयोग की छह प्रमुख क्रियाओं का समूह है।
- नियमित अभ्यास से आंतरिक सफाई होती है।
- इसके द्वारा मन की शांति प्राप्त होती है।
- इनका अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में करना चाहिए।
नई दिल्ली, 13 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से शरीर, मन और आत्मा की सम्पूर्ण शुद्धि को अत्यधिक महत्व दिया जाता रहा है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, योग की एक प्राचीन विधा 'षट्कर्म योगासन' आज कई लोगों के स्वास्थ्य का आधार बन चुकी है।
इसका नियमित अभ्यास न केवल शरीर को शुद्ध करता है, बल्कि मन को भी शांति प्रदान करता है। यह योगाभ्यास हठयोग के छह शुद्धता क्रियाओं का समूह है, जिसका वर्णन प्राचीन योग ग्रंथों में मिलता है। हठयोग की इन छह शुद्धिकरण क्रियाओं का नियमित रूप से अभ्यास करने से न केवल शरीर की आंतरिक सफाई होती है, बल्कि मन भी स्पष्ट और शांत रहता है, और आत्मा की ऊर्जा में वृद्धि होती है।
षट्कर्म योग की छह मुख्य शुद्धि क्रियाओं का उल्लेख हठयोग प्रदीपिका, घेरंड संहिता एवं अन्य प्राचीन ग्रंथों में किया गया है। इनका प्रमुख उद्देश्य शरीर के विभिन्न अंगों से विषाक्त पदार्थों, बलगम और अपशिष्ट को बाहर निकालना है। ये क्रियाएं हैं: नेति, धौति, बस्ति, नौलि, त्राटक और कपालभाति।
हठयोग प्रदीपिका (स्वामी स्वात्माराम द्वारा लिखित) के अनुसार, षट्कर्म शरीर और मन को शुद्ध करने की प्रमुख तकनीकें हैं, जो कफ, पित्त और वात दोषों को संतुलित करती हैं। इन अभ्यासों का मूल उद्देश्य शरीर को आसन और प्राणायाम के लिए तैयार करना है, खासकर उन व्यक्तियों के लिए जो कफ या मेद (मोटापे) से ग्रस्त हैं।
इनका नियमित अभ्यास न केवल शरीर को फिट रखता है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी प्रगति करता है। यह शरीर की आंतरिक सफाई का सबसे प्रभावी तरीका है। इसके साथ ही, यह विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने और मन को शांति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
हठयोग प्रदीपिका के अनुसार, यदि किसी के शरीर में कफ या मेद की अधिकता नहीं है, तो उन्हें इन क्रियाओं का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं है। इन क्रियाओं का अभ्यास किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए।