ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: भारत की समुद्री और आर्थिक शक्ति को मिलेगी नई दिशा, ₹200-220 मिलियन डॉलर की बचत का लक्ष्य
अर्थशास्त्री हैन्स कॉफमैन की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के माध्यम से भारत अपनी भौगोलिक स्थिति के लाभ को आर्थिक मजबूती, रणनीतिक गहराई और समुद्री प्रभाव में बदल सकता है। यह रिपोर्ट 'इंडिया नैरेटिव' में प्रकाशित हुई है और इसमें इस महत्वाकांक्षी परियोजना के आर्थिक, रणनीतिक तथा पर्यावरणीय पहलुओं का गहन विश्लेषण किया गया है। वैश्विक वित्तीय नीति में विशेषज्ञता रखने वाले कॉफमैन का मानना है कि यदि किसी भौगोलिक क्षेत्र का उपयोग न किया जाए, तो वह रणनीतिक रूप से खो जाता है।
परियोजना का उद्देश्य और रणनीतिक महत्व
सरकार के अनुसार, इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य ग्रेट निकोबार को एक रणनीतिक समुद्री और आर्थिक हब में परिवर्तित करना है। यह द्वीप वैश्विक पूर्व-पश्चिम शिपिंग रूट के निकट स्थित है, जिससे विदेशी ट्रांसशिपमेंट पोर्ट्स पर भारत की निर्भरता कम होगी — जो देश की रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह परियोजना चीन को सैन्य रूप से 'घेरने' के लिए नहीं है, बल्कि भारत को उस समुद्री मार्ग के निकट निगरानी, लॉजिस्टिक मजबूती और रणनीतिक स्थिति प्रदान करती है, जिस पर चीन की अर्थव्यवस्था काफी हद तक निर्भर है।
भारत की विदेशी पोर्ट्स पर निर्भरता: एक बड़ी कमज़ोरी
रिपोर्ट के अनुसार, भारत हिंद महासागर के किनारे स्थित होने और लंबी समुद्री तटरेखा के बावजूद वर्षों से अपने माल की ढुलाई के लिए सिंगापुर, कोलंबो और पोर्ट क्लांग जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहा है। हर वर्ष लगभग 30 लाख कंटेनर (टीईयू) भारतीय माल विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से भेजा जाता है, जिनमें से 85 प्रतिशत से अधिक केवल तीन बंदरगाह संभालते हैं। इस कारण भारत को प्रतिवर्ष लगभग 200-220 मिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। रिपोर्ट में कहा गया है,