एआई बूम ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को दो हिस्सों में बांटा: IMF की अक्टूबर 2026 रिपोर्ट में चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने 13 अक्टूबर 2026 को जारी अपनी अक्टूबर 2026 वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (WEO) रिपोर्ट में कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में तेज़ी से बढ़ते निवेश और मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्पष्ट रूप से दो खेमों में विभाजित कर दिया है। चिप निर्माण और एआई आपूर्ति शृंखला से जुड़े देश तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं, जबकि ऊर्जा आयात पर निर्भर और तकनीकी मूल्य शृंखला से बाहर रहने वाली अर्थव्यवस्थाएं दबाव में आ गई हैं।
विभाजित वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरूप
IMF की रिपोर्ट के अनुसार, भू-राजनीतिक घटनाक्रम और तकनीकी बदलावों के संयुक्त प्रभाव ने एक 'विभाजित वैश्विक अर्थव्यवस्था' की स्थिति पैदा कर दी है। जिन देशों को बेहतर व्यापारिक शर्तें, तकनीक-आधारित निर्यात और विदेशी निवेश का लाभ मिल रहा है, उन्हें एक सुरक्षात्मक कवच प्राप्त है। इसके विपरीत, अन्य देशों को ऊँचे आयात बिल और कमज़ोर आंतरिक माँग का सामना करना पड़ रहा है।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि उन्नत सेमीकंडक्टर के वैश्विक व्यापार का लगभग 62 प्रतिशत हिस्सा केवल ताइवान और दक्षिण कोरिया से आता है, जो इस तकनीकी एकाग्रता की गंभीरता को दर्शाता है।
सबसे बड़े लाभार्थी: ताइवान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया
ताइवान इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर उभरा है। IMF ने 2026 में उसकी आर्थिक वृद्धि दर 10.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो 2025 में 8.8 प्रतिशत थी। हालाँकि 2027 में यह दर 4.3 प्रतिशत तक धीमी पड़ने की संभावना व्यक्त की गई है।
दक्षिण कोरिया की वृद्धि दर भी 2025 के 1.1 प्रतिशत से बढ़कर 2026 में 3.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। रिपोर्ट में कहा गया कि सेमीकंडक्टर की वैश्विक माँग में तेज़ी ने मध्य पूर्व युद्ध के नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर दिया है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में वियतनाम के लिए 8.4 प्रतिशत और मलेशिया के लिए 5.2 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। IMF के अनुसार, इस क्षेत्र की कई अर्थव्यवस्थाएं डेटा सेंटर गतिविधियों और वैश्विक तकनीकी चक्र से तेज़ी से लाभान्वित हो रही हैं।
माँग का केंद्रीकरण: अमेरिका और चीन का दबदबा
माँग के मोर्चे पर चीन और अमेरिका एआई से जुड़े कंप्यूटिंग हार्डवेयर के कुल शुद्ध आयात का 75 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हैं। इसके साथ ही, 2024 के बाद स्थापित नए डेटा सेंटर में उनकी संयुक्त हिस्सेदारी 57 प्रतिशत रही है।
यह ऐसे समय में आया है जब एआई से जुड़ा हार्डवेयर व्यापार विश्व जीडीपी के अनुपात में तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन IMF ने स्पष्ट किया कि इसका लाभ सभी देशों को समान रूप से नहीं मिलेगा।
भारत को अपवाद क्यों माना गया
रिपोर्ट में भारत को एक उल्लेखनीय अपवाद बताया गया है। IMF के अनुसार, भारत की वृद्धि चिप निर्यात पर नहीं, बल्कि मज़बूत घरेलू माँग और सेवा क्षेत्र की स्थिरता पर आधारित है। यही कारण है कि ऊर्जा आयातक उभरती अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में आने के बावजूद भारत को मध्यम अवधि के नकारात्मक संशोधनों से अलग रखा गया है।
गौरतलब है कि यह भारत के उस विकास मॉडल की पुष्टि है जो हार्डवेयर विनिर्माण के बजाय सेवा-आधारित आईटी निर्यात और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर टिका है — हालाँकि आलोचकों का मानना है कि दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा के लिए भारत को अपनी सेमीकंडक्टर क्षमता भी विकसित करनी होगी।
जोखिम और चेतावनियाँ
IMF ने कम आय वाले और आर्थिक रूप से संवेदनशील देशों के बारे में गंभीर चेतावनी दी है। ऐसे देशों को ऊँची आयात लागत, मुद्रा पर दबाव, वास्तविक आय में कमी और सीमित वित्तीय संसाधनों जैसी बहुस्तरीय चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे देशों के बीच और देशों के भीतर आय असमानता बढ़ने का खतरा है।
रिपोर्ट में यह भी सतर्क किया गया है कि यदि एआई से जुड़ी लाभप्रदता और उत्पादकता को लेकर उम्मीदें अत्यधिक आशावादी साबित होती हैं, तो एआई अवसंरचना में निवेश की गति अचानक धीमी पड़ सकती है। IMF के अनुसार, एआई कंपनियों की अधिक हिस्सेदारी वाले शेयर बाज़ारों में पुनर्मूल्यांकन का जोखिम भी बना हुआ है — अमेरिका और दक्षिण कोरिया के तकनीकी शेयरों में हाल की अस्थिरता इसी जोखिम की ओर संकेत करती है।
आगे की राह यह तय करेगी कि कौन से देश एआई को अपनाने की क्षमता विकसित कर पाते हैं और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम कर अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करने में सक्षम होते हैं।