5 अक्टूबर 2026
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बांग्लादेश तानाशाही हटाने में माहिर, लोकतंत्र मजबूत करने में पिछड़ा: 'द डेली स्टार' संपादक

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बांग्लादेश तानाशाही हटाने में माहिर, लोकतंत्र मजबूत करने में पिछड़ा: 'द डेली स्टार' संपादक

सारांश

बांग्लादेश तानाशाहियाँ गिराता रहा, लेकिन लोकतंत्र बचा नहीं पाया — यही कड़वा सच 'द डेली स्टार' के संपादक महफूज अनाम ने ढाका सम्मेलन में कहा। संस्थाओं का अत्यधिक राजनीतिकरण, पेशेवर दलबंदी और बार-बार टूटती एकता — यह बांग्लादेश की लोकतांत्रिक विफलता की असली कहानी है।

मुख्य बातें

महफूज अनाम , संपादक-प्रकाशक 'द डेली स्टार' , ने 5 अक्टूबर 2026 को ढाका में 'बे ऑफ बंगाल कन्वर्सेशन' सम्मेलन में बोलते हुए बांग्लादेश की लोकतांत्रिक विफलता को स्वीकार किया।
अनाम के अनुसार, तानाशाही के खिलाफ एकजुट होने वाले समूह सत्ता परिवर्तन के बाद आपस में दुश्मन बन जाते हैं।
1991 में सैन्य शासक हुसैन मुहम्मद इरशाद के पतन के बाद लोकतांत्रिक पुनर्जन्म की उम्मीद जगी थी, लेकिन वह व्यवस्था टिक नहीं पाई।
संस्थाओं — पुलिस, खुफिया एजेंसियों, एंटी-करप्शन कमीशन — का अत्यधिक राजनीतिकरण लोकतांत्रिक विफलता का प्रमुख कारण बताया गया।
राजनीतिक दलबंदी डॉक्टरों, पत्रकारों समेत लगभग हर पेशे में फैल चुकी है, जिससे संस्थाओं की विश्वसनीयता कमज़ोर हुई है।

बांग्लादेश के प्रमुख अखबार 'द डेली स्टार' के संपादक और प्रकाशक महफूज अनाम ने कहा है कि बांग्लादेश तानाशाही सरकारों को उखाड़ फेंकने में तो सिद्धहस्त है, लेकिन एक टिकाऊ लोकतंत्र की नींव रखने में वह बार-बार विफल रहा है। ढाका स्थित 'सेंटर फॉर गवर्नेंस स्टडीज' द्वारा 5 अक्टूबर 2026 को आयोजित 'बे ऑफ बंगाल कन्वर्सेशन' सम्मेलन में उन्होंने यह बेबाक टिप्पणी की। अनाम की यह स्वीकारोक्ति उस देश के राजनीतिक संकट की गहरी पड़ताल है, जिसका जन्म ही पाकिस्तान की क्रूर सैन्य तानाशाही के विरुद्ध ऐतिहासिक विद्रोह से हुआ था।

तानाशाही के खात्मे में एकता, लोकतंत्र में बिखराव

अनाम ने सम्मेलन में कहा, 'हम तानाशाही को खत्म करने में तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन दुखद सच्चाई यह है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं बनाने में हम बेहद कमज़ोर साबित हुए हैं।' उन्होंने स्पष्ट किया कि जब भी किसी तानाशाही को चुनौती दी जाती है, पूरा देश एकजुट हो जाता है — लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद वही एकता विखंडित हो जाती है।

उन्होंने कहा, 'जो समूह तानाशाही को खत्म करने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते हैं, वे ही बाद में एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन जाते हैं। हमें वाकई नहीं पता कि लोगों की ऊर्जा, उनके नए विचारों और हिम्मत को एकसाथ कैसे बनाए रखा जाए और उस संसाधन को राष्ट्र की ताकत में कैसे तब्दील किया जाए।'

1991 के बाद की उम्मीदें और निराशा

अनाम ने बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास का स्मरण करते हुए कहा कि सैन्य शासक हुसैन मुहम्मद इरशाद के पतन और 1991 में लोकतंत्र की वापसी ने एक नई उम्मीद जगाई थी। लेकिन वह उम्मीद भी समय के साथ धूमिल पड़ गई।

उन्होंने कहा, 'इरशाद की सत्ता का अंत आखिरी था और 1991 में हम लोकतंत्र की ओर लौटे। हमें सच में उम्मीद थी कि बांग्लादेश में लोकतंत्र का पुनर्जन्म होगा।' इसके बाद कार्यवाहक सरकारों की देखरेख में कई विश्वसनीय चुनाव हुए, लेकिन वे व्यवस्थाएं टिकाऊ नहीं रहीं। उन्होंने कहा, 'निष्पक्ष चुनावों को संस्थागत रूप देने के बजाय, हम झगड़ों, आपसी प्रतिद्वंद्विता और फिर बर्बादी की ओर बढ़ते गए।'

संस्थाओं का अत्यधिक राजनीतिकरण: मुख्य कारण

अनाम ने लोकतांत्रिक विफलता की जड़ स्पष्ट करते हुए कहा कि बांग्लादेश ने 'हर उस संस्था का जरूरत से ज्यादा राजनीतिकरण कर दिया, जिसकी कल्पना की जा सकती है।' उनके अनुसार, इस अत्यधिक राजनीतिकरण ने देश की लगभग सभी संस्थाओं की कार्यक्षमता को खोखला कर दिया है।

उन्होंने कहा कि यह राजनीतिक विभाजन बांग्लादेश के लगभग हर पेशे में घुस गया है — चाहे वे डॉक्टर हों जिनसे हर मरीज की सेवा की अपेक्षा होती है, या पत्रकार हों जिनकी विश्वसनीयता निष्पक्षता पर टिकी है। अनाम ने सवाल उठाया, 'ऐसे पेशे में जहाँ विश्वसनीयता ही आपकी जान है, आप खुलेआम किसी राजनीतिक दल का पक्ष लेकर भी यह कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि आपकी साख बनी रहेगी?'

पुलिस, खुफिया एजेंसियाँ और संवैधानिक संस्थाएं: राजनीति का हथियार

अनाम के अनुसार, पुलिस का उपयोग हमेशा किसी न किसी दल की ताकत बढ़ाने वाले हथियार के रूप में होता रहा है। उन्होंने कहा कि खुफिया एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है और एंटी-करप्शन कमीशन जैसी संवैधानिक संस्थाएं, जिन्हें स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए, वे भी राजनीतिक रंग में रंग चुकी हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश एक बार फिर राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और संस्थागत सुधार की माँग तेज हो रही है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है कि किसी वरिष्ठ बांग्लादेशी मीडिया शख्सियत ने इतने खुलेपन से देश की लोकतांत्रिक कमज़ोरियों को स्वीकार किया हो — लेकिन इस बार यह एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर, एक संरचित नीतिगत संवाद के दौरान कही गई बात है, जो इसे अधिक महत्वपूर्ण बनाती है।

आगे क्या होगा

'बे ऑफ बंगाल कन्वर्सेशन' जैसे मंचों पर इस तरह की खुली स्वीकारोक्ति बांग्लादेश में नागरिक समाज और नीति-निर्माताओं के बीच एक व्यापक बहस की शुरुआत का संकेत देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक संस्थाओं का दलगत राजनीतिकरण नहीं रुकेगा, बांग्लादेश में स्थायी लोकतंत्र की उम्मीद महज एक आकांक्षा बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि बांग्लादेश के सबसे प्रभावशाली मीडिया संस्थान के शीर्ष पुरुष की आवाज़ है — और यह दक्षिण एशिया के उन तमाम देशों पर भी लागू होती है जो तानाशाही के बाद लोकतांत्रिक समेकन में संघर्ष करते रहे हैं। संस्थाओं के राजनीतिकरण का यह चक्र — जहाँ हर सत्ता बदलाव के बाद पुलिस, न्यायपालिका और मीडिया को नए सिरे से 'रंगा' जाता है — वास्तव में लोकतंत्र की नहीं, केवल सत्ता-परिवर्तन की संस्कृति को पोषित करता है। असली सवाल यह है कि बांग्लादेश का नागरिक समाज और नई पीढ़ी इस चक्र को तोड़ने की राजनीतिक इच्छाशक्ति कहाँ से जुटाएगी — जब हर दल सत्ता में आते ही उन्हीं संस्थाओं का दुरुपयोग दोहराता है जिनकी वह विपक्ष में आलोचना करता था।
RashtraPress
5 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महफूज अनाम ने बांग्लादेश के लोकतंत्र के बारे में क्या कहा?
'द डेली स्टार' के संपादक महफूज अनाम ने कहा कि बांग्लादेश तानाशाही खत्म करने में तो सक्षम है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाएं बनाने में बेहद कमज़ोर साबित हुआ है। उन्होंने यह बात 5 अक्टूबर 2026 को ढाका में 'बे ऑफ बंगाल कन्वर्सेशन' सम्मेलन में कही।
बांग्लादेश में लोकतंत्र कमज़ोर क्यों रहा है?
अनाम के अनुसार, बांग्लादेश ने पुलिस, खुफिया एजेंसियों और एंटी-करप्शन कमीशन सहित लगभग सभी संस्थाओं का जरूरत से ज्यादा राजनीतिकरण कर दिया, जिससे उनकी स्वतंत्रता और कार्यक्षमता नष्ट हो गई। राजनीतिक दलबंदी डॉक्टरों और पत्रकारों जैसे पेशों तक भी फैल गई।
1991 में इरशाद के पतन के बाद बांग्लादेश में क्या हुआ?
सैन्य शासक हुसैन मुहम्मद इरशाद के पतन के बाद 1991 में बांग्लादेश लोकतंत्र की ओर लौटा और कार्यवाहक सरकारों के तहत कई विश्वसनीय चुनाव हुए। हालाँकि, अनाम के अनुसार, वे व्यवस्थाएं टिकाऊ नहीं रहीं और देश झगड़ों व प्रतिद्वंद्विता की ओर बढ़ता गया।
'बे ऑफ बंगाल कन्वर्सेशन' सम्मेलन क्या है?
यह ढाका स्थित 'सेंटर फॉर गवर्नेंस स्टडीज' द्वारा आयोजित एक नीतिगत संवाद मंच है, जहाँ क्षेत्रीय शासन और लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है। 5 अक्टूबर 2026 को आयोजित इस सम्मेलन में महफूज अनाम ने बांग्लादेश की लोकतांत्रिक चुनौतियों पर अपने विचार रखे।
बांग्लादेश में तानाशाही विरोधी आंदोलनों के बाद एकता क्यों बिखरती है?
महफूज अनाम के अनुसार, तानाशाही के खिलाफ लड़ने वाले समूह एक साझा दुश्मन से एकजुट होते हैं, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद साझा लक्ष्य खत्म हो जाता है और वही समूह आपसी दुश्मन बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि इस सामूहिक ऊर्जा को राष्ट्र-निर्माण में बदलने का कोई कारगर तरीका अब तक नहीं खोजा जा सका है।
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