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बांग्लादेश में नीति निर्माण की संस्थागत कमज़ोरी: 55 साल बाद भी 'पहली कक्षा' में अटका

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बांग्लादेश में नीति निर्माण की संस्थागत कमज़ोरी: 55 साल बाद भी 'पहली कक्षा' में अटका

सारांश

55 साल की आर्थिक तरक्की के बावजूद बांग्लादेश नीति निर्माण में 'पहली कक्षा' से आगे नहीं निकल पाया। समस्या प्रतिभा की नहीं, बल्कि बार-बार तबादले और विशेषज्ञता की अनदेखी की है — जो हर सुधार को ज़मीन पर उतरने से पहले ही दफ़न कर देती है।

मुख्य बातें

'द डेली स्टार' की रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश 55 वर्षों बाद भी नीति निर्माण में संस्थागत क्षमता विकसित करने में विफल रहा है।
नीति निर्धारकों का बार-बार तबादला , अल्प कार्यकाल और विशेषज्ञता की अनदेखी इस संकट के मुख्य कारण बताए गए हैं।
ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ.
सैयद अब्दुल हमीद ने कहा कि यह कार्यप्रणाली दीर्घकालिक सुधारों की क्षमता को कमज़ोर करती है।
रिपोर्ट के अनुसार समस्या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि संस्थागत अनुभव को सुरक्षित न रख पाना है।
डिजिटल सेवाओं में नेतृत्व बदलाव के साथ बार-बार निवेश से सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी का भी उल्लेख किया गया।
सुधार के लिए न्यूनतम कार्यकाल , विशेषज्ञता-आधारित नियुक्ति और विश्वविद्यालयों-शोध संस्थानों की सक्रिय भागीदारी की सिफारिश।

बांग्लादेश ने पिछले 55 वर्षों में सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन नीति निर्माण के लिए ज़रूरी संस्थागत क्षमता की गंभीर कमी अब भी बनी हुई है। बांग्लादेश के प्रमुख समाचार पत्र 'द डेली स्टार' की एक हालिया रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया है कि पाँच दशकों से अधिक समय बीतने के बावजूद देश नीति निर्माण में 'पहली कक्षा' से आगे नहीं बढ़ पाया है।

समस्या की जड़: बार-बार तबादला और विशेषज्ञता की अनदेखी

रिपोर्ट के अनुसार, नीति निर्धारकों का बार-बार तबादला, उनका अत्यल्प कार्यकाल और संबंधित क्षेत्र की विशेषज्ञता की अनदेखी कर अधिकारियों की नियुक्ति इस संकट के मूल कारण हैं। जिन अधिकारियों को किसी क्षेत्र का पूर्व अनुभव नहीं होता, उन्हें अपने सीमित कार्यकाल का बड़ा हिस्सा बुनियादी जानकारी जुटाने में ही खर्च करना पड़ता है।

इस प्रक्रिया में सुधारों को लागू करने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं बचता। जब तक कोई अधिकारी संबंधित क्षेत्र की पर्याप्त समझ विकसित कर पाता है, तब तक उसका तबादला हो जाता है या वह सेवानिवृत्त हो जाता है — जिससे महत्वपूर्ण सुधार ज़मीन पर उतरने से पहले ही ठप हो जाते हैं।

विशेषज्ञ की राय

ढाका विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर डॉ. सैयद अब्दुल हमीद ने कहा कि सार्वजनिक प्रशासन में इस तरह की कार्यप्रणाली दीर्घकालिक सुधारों की योजना बनाने और उन्हें निरंतर लागू करने की क्षमता को गंभीर रूप से कमज़ोर करती है।

डॉ. हमीद ने प्रमुख पदों पर नियुक्तियों में संबंधित क्षेत्र की विशेषज्ञता को अधिक महत्व देने, अनावश्यक तबादलों को सीमित करने और अधिकारियों के लिए उचित न्यूनतम कार्यकाल सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने नीतियों के पीछे के तर्क और उनके क्रियान्वयन से जुड़े रिकॉर्ड को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने पर भी ज़ोर दिया।

संस्थागत विफलता, प्रतिभा की नहीं

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि बांग्लादेश में नीति निर्माण की यह समस्या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि संस्थागत अनुभव को सुरक्षित रखने और विशिष्ट क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित करने में विफलता है। रिपोर्ट के शब्दों में, 'शासन का एक महत्वपूर्ण पहलू अब भी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाया है — यह मज़बूत संस्थानों और निरंतर नेतृत्व के माध्यम से सार्वजनिक नीतियों को तैयार करने, लागू करने, उनका मूल्यांकन करने और उनमें सुधार करने की क्षमता है।'

यह ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश अपने शासन-ढाँचे में व्यापक सुधार की बात कर रहा है। गौरतलब है कि नीति की निरंतरता के अभाव में डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों में नेतृत्व परिवर्तन के साथ नई प्रणालियाँ बनाने और बार-बार निवेश करने से सार्वजनिक संसाधनों की भारी बर्बादी होती है।

सुधार के लिए सुझाव

रिपोर्ट में मंत्रालयों और सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया है। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, पेशेवर संगठनों और स्वतंत्र विशेषज्ञों को नीति निर्माण तथा उनके मूल्यांकन में अधिक प्रभावी भूमिका देने की सिफारिश की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, बेहतर नीति निर्माण एक सतत प्रक्रिया है जिसमें समस्याओं की पहचान, साक्ष्य संग्रह और विश्लेषण, संबंधित पक्षों से परामर्श, विभिन्न विकल्पों का आकलन तथा वित्तीय एवं प्रशासनिक व्यवहार्यता की जाँच अनिवार्य है। इस सहयोग को प्रभावी बनाने के लिए विश्वसनीय डेटा प्रणाली और साक्ष्यों को साझा करने की मज़बूत व्यवस्था भी ज़रूरी बताई गई है।

आगे की राह

विश्लेषकों का मानना है कि जब तक बांग्लादेश अधिकारियों की नियुक्ति और कार्यकाल की नीति में मूलभूत सुधार नहीं करता, तब तक सामाजिक और आर्थिक प्रगति का पूरा लाभ उठाना कठिन रहेगा। रिपोर्ट एक स्पष्ट संकेत है कि केवल संसाधन बढ़ाने से काम नहीं चलेगा — संस्थागत स्मृति और विशेषज्ञता की निरंतरता उतनी ही ज़रूरी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन जिस संस्थागत ढाँचे पर यह प्रगति टिकी है, वह खोखला रह गया। असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक नेतृत्व तबादला-व्यवस्था में सुधार करने की इच्छाशक्ति रखता है — जो अक्सर संरक्षण-राजनीति का औज़ार बन जाती है। जब तक विशेषज्ञता को पुरस्कृत करने वाला ढाँचा नहीं बनेगा, तब तक हर नई रिपोर्ट केवल पुरानी कमज़ोरियों का दर्पण बनती रहेगी।
RashtraPress
16 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बांग्लादेश में नीति निर्माण की संस्थागत कमज़ोरी क्या है?
'द डेली स्टार' की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में नीति निर्धारकों का बार-बार तबादला, अल्प कार्यकाल और विशेषज्ञता की अनदेखी कर नियुक्तियाँ होने से संस्थागत अनुभव सुरक्षित नहीं रह पाता। इससे दीर्घकालिक सुधारों को लागू करने की क्षमता गंभीर रूप से कमज़ोर होती है।
यह रिपोर्ट किसने तैयार की और इसमें क्या कहा गया है?
यह रिपोर्ट बांग्लादेश के प्रमुख अखबार 'द डेली स्टार' ने प्रकाशित की है, जिसमें ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सैयद अब्दुल हमीद समेत विशेषज्ञों के विचार शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 55 वर्षों की प्रगति के बावजूद देश नीति निर्माण में 'पहली कक्षा' से आगे नहीं बढ़ पाया।
बार-बार तबादले से नीति निर्माण पर क्या असर पड़ता है?
जिन अधिकारियों को किसी क्षेत्र का पूर्व अनुभव नहीं होता, वे अपना अधिकांश कार्यकाल बुनियादी जानकारी जुटाने में गँवा देते हैं। जब तक वे उस क्षेत्र की गहरी समझ विकसित करते हैं, तब तक उनका तबादला हो जाता है — जिससे सुधार अधूरे रह जाते हैं।
रिपोर्ट में सुधार के लिए क्या सुझाव दिए गए हैं?
रिपोर्ट में प्रमुख पदों पर विशेषज्ञता-आधारित नियुक्तियाँ, अधिकारियों के लिए न्यूनतम कार्यकाल सुनिश्चित करना और नीतियों के क्रियान्वयन के रिकॉर्ड को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने की सिफारिश की गई है। साथ ही विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और स्वतंत्र विशेषज्ञों की नीति निर्माण में सक्रिय भागीदारी पर भी ज़ोर दिया गया है।
क्या यह समस्या केवल बांग्लादेश तक सीमित है?
रिपोर्ट का केंद्र बांग्लादेश है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिण एशिया के कई देशों में नौकरशाही की 'रोटेशन संस्कृति' नीतिगत निरंतरता को बाधित करती है। बांग्लादेश की विशेषता यह है कि उसने आर्थिक मोर्चे पर बड़ी छलाँग लगाई, लेकिन शासन-ढाँचे को उसी गति से नहीं सुधारा।
राष्ट्र प्रेस
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