जमात गठबंधन से बांग्लादेश एनसीपी की पहचान संकट में, 60 से अधिक नेता छोड़ चुके पार्टी
सारांश
मुख्य बातें
बांग्लादेश की नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) का जमात-ए-इस्लामी (जेआई) के नेतृत्व वाले गठबंधन से जुड़ने का फैसला पार्टी की राजनीतिक पहचान पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का विरोध करने और पाकिस्तानी सेना का साथ देने के जमात के विवादास्पद इतिहास को देखते हुए यह गठबंधन एनसीपी की राजनीतिक विश्वसनीयता के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। ढाका से आ रही रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी की पहली वर्षगांठ तक कम से कम 60 नेता और कार्यकर्ता पार्टी को छोड़ चुके थे।
मुक्ति संग्राम का इतिहास और एनसीपी की राजनीतिक कीमत
जमात-ए-इस्लामी का 1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़ा अतीत बांग्लादेश की राजनीति में एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा रहा है। पार्टी पर पाकिस्तानी सेना का साथ देने और स्वतंत्रता संग्राम का विरोध करने के गंभीर आरोप लगे हैं। ऐसे में एनसीपी का इस संगठन के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होना उन मतदाताओं के बीच अविश्वास पैदा कर रहा है, जिन्होंने छात्र आंदोलन की नींव पर बनी इस नई पार्टी से एक अलग राजनीतिक विकल्प की उम्मीद लगाई थी।
रिपोर्टों के मुताबिक, जमात के साथ चुनावी गठबंधन को पार्टी के भीतर चल रहे वैचारिक मतभेदों का सबसे स्पष्ट प्रतीक माना जा रहा है।
नाहिद इस्लाम का लॉन्ग मार्च और विवादास्पद बयान
19 सितंबर को जमात के नेतृत्व वाले 11 दलों के विपक्षी गठबंधन के लॉन्ग मार्च को संबोधित करते हुए एनसीपी संयोजक नाहिद इस्लाम ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, 'उन्हें यह तय करना होगा कि वह हेलीकॉप्टर से देश छोड़कर भागेंगे या सम्मान के साथ इस्तीफा देंगे।'
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नाहिद इस्लाम यह टिप्पणी एनसीपी की किसी रैली में नहीं, बल्कि जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन के मंच से कर रहे थे। रिपोर्टों के अनुसार यह लॉन्ग मार्च सात सूत्रीय मांगों को लेकर आयोजित किया गया था — जिनमें फरवरी के जनमत संग्रह के फैसले को लागू करना, बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण, ऊर्जा और उर्वरक संकट से निपटना, बिगड़ती कानून-व्यवस्था में सुधार और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कदम उठाना शामिल था।
चुनाव के बाद भी जारी रही साझेदारी
रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव के बाद भी एनसीपी और जमात की साझेदारी बनी रही, जिसने इस प्रश्न को और पेचीदा बना दिया। जमात प्रमुख शफीकुर रहमान विपक्ष के नेता बने, जबकि एनसीपी संयोजक नाहिद इस्लाम ने विपक्ष के मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी संभाली। दोनों पार्टियाँ न केवल संसद के भीतर, बल्कि सड़कों पर भी एक साथ दिखती रही हैं।
गौरतलब है कि बांग्लादेश में अब यह एक आम तस्वीर बन गई है कि एनसीपी जमात के साथ लॉन्ग मार्च, गठबंधन की बैठकों और संसद के विरोध-प्रदर्शनों में एक साथ शिरकत करती है।
एनसीपी की अलग पहचान का सवाल
एनसीपी का उदय उस छात्र आंदोलन से हुआ था, जिसके बाद अगस्त 2024 में अवामी लीग की सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी। पार्टी ने एक नया राजनीतिक विकल्प देने का वादा किया था। अब सवाल यह उठ रहा है कि जमात के साथ निरंतर राजनीतिक सहयोग के बाद एनसीपी को जमात से अलग क्या बनाता है।
एनसीपी का तर्क है कि जमात के साथ उसका रिश्ता वैचारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक है। संस्थागत दृष्टि से यह सही भी हो सकता है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता किसी पार्टी की पहचान केवल उसके संविधान या आधिकारिक बयानों से नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक आचरण — किनके साथ मंच साझा होता है, किनके साथ संसद में काम होता है और सड़कों पर कौन साथ होता है — से भी आँकते हैं।
आगे की चुनौती
छात्र आंदोलन से उभरने के दो साल से भी कम समय के भीतर एनसीपी के सामने यह चुनौती है कि वह मतदाताओं को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के बारे में कैसे और कितनी विश्वसनीयता से समझाए। पार्टी से हो रहे पलायन और मतभेदों के बीच यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या एनसीपी बांग्लादेश की राजनीति में वह नई आवाज़ बन पाएगी, जिसका वादा उसने अपनी स्थापना के समय किया था।