17वें कर्मापा को साधने में जुटी CCP: तिब्बती बौद्ध धर्म पर चीन की पकड़ मजबूत करने की कथित रणनीति
सारांश
मुख्य बातें
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट (UFWD) कथित तौर पर 17वें कर्मापा ओग्येन त्रिनले दोर्जे के साथ नियमित संपर्क बनाए हुए है — और इसका मकसद तिब्बती बौद्ध धर्म को चीनी राज्य व्यवस्था के अनुकूल ढालना बताया जा रहा है। यह दावा द तिब्बत एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट में किया गया है, जिसके लेखक 14वें दलाई लामा के भतीजे खेदरूब थोंदुप हैं।
रिपोर्ट में क्या दावा किया गया है
रिपोर्ट के अनुसार, UFWD कर्मापा और उनके माता-पिता की हांगकांग में मुलाकातें आयोजित करवाने के साथ-साथ उनके भविष्य को लेकर नियमित सलाह भी दे रहा है। कहा गया है कि इस सलाह में कर्मापा के सार्वजनिक बयान, यात्रा कार्यक्रम और अन्य धार्मिक नेताओं से मुलाकात जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हो सकते हैं।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ओग्येन त्रिनले दोर्जे CCP के राजनीतिक उद्देश्यों के अनुरूप रहें और तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन या चीन-विरोधी गतिविधियों का समर्थन न करें। हालाँकि, इस पर चीन का आधिकारिक पक्ष रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया है।
कर्मापा की विशेष स्थिति
ओग्येन त्रिनले दोर्जे तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक नेताओं में गिने जाते हैं। गौरतलब है कि उन्हें दलाई लामा और चीन — दोनों ने 17वें कर्मापा के रूप में मान्यता दी है, जो कि अत्यंत असामान्य परिस्थिति है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन इसी दोहरी मान्यता का लाभ उठाते हुए उन्हें तिब्बती बौद्ध समुदाय के भीतर एक प्रभावशाली सहयोगी के रूप में तैयार करना चाहता है।
यह ऐसे समय में आया है जब दलाई लामा उत्तराधिकार का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केंद्र में है, और चीन धार्मिक संस्थाओं पर नियंत्रण को अपनी तिब्बत नीति का अभिन्न हिस्सा मानता है।
पंचेन लामा मामला: पृष्ठभूमि
रिपोर्ट में मई 2026 में इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत (ICT) द्वारा जारी बयान का भी उल्लेख है। ICT ने चीन से 11वें पंचेन लामा गेधुन चोएक्यी न्यिमा को तत्काल रिहा कर उनके अधिकार बहाल करने की माँग की थी।
ICT के अनुसार, 1995 में दलाई लामा द्वारा छह वर्षीय गेधुन चोएक्यी न्यिमा को पंचेन लामा के रूप में मान्यता दिए जाने के कुछ दिनों के भीतर ही चीनी अधिकारियों ने उन्हें और उनके परिवार को हिरासत में ले लिया था। संगठन का कहना है कि तब से वे सार्वजनिक रूप से कहीं नहीं दिखे। चीन ने बाद में ग्याल्त्सेन नोर्बू को पंचेन लामा नियुक्त किया, जिसे निर्वासित तिब्बती समुदाय मान्यता नहीं देता — यह विवाद तीन दशक बाद भी अनसुलझा बना हुआ है।
व्यापक रणनीतिक संदर्भ
रिपोर्ट में इस पूरी कवायद को चीन की व्यापक सांस्कृतिक और धार्मिक समावेशन रणनीति का हिस्सा बताया गया है। आलोचकों का कहना है कि UFWD दशकों से धार्मिक, जातीय और प्रवासी समुदायों को प्रभावित करने के लिए इसी तरह की पद्धतियाँ अपनाता रहा है।
यह रिपोर्ट केवल तिब्बत तक सीमित नहीं है — इसके निहितार्थ उन देशों तक भी जाते हैं जहाँ तिब्बती बौद्ध समुदाय निर्वासन में रहते हैं, जिनमें भारत, नेपाल और पश्चिमी देश शामिल हैं। इस संदर्भ में भारत की संवेदनशीलता विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय है।
आगे क्या
इस रिपोर्ट पर अब तक चीन सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ICT और निर्वासित तिब्बती समुदाय लगातार अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिश में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी दलाई लामा उत्तराधिकार प्रक्रिया इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बना सकती है।