सीजीटीएन सर्वे: लॉन्ग मार्च के 90 साल बाद भी सीपीसी को मिल रहा वैश्विक समर्थन, 41 देशों में किया गया अध्ययन
सारांश
मुख्य बातें
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की स्थापना और लॉन्ग मार्च की विजय के 90 वर्ष पूरे होने के अवसर पर सीजीटीएन द्वारा किए गए एक व्यापक सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि दुनिया के बड़े हिस्से में सीपीसी की छवि एक सक्षम और स्थिरता-समर्थक राजनीतिक शक्ति के रूप में बनी हुई है। 41 देशों के 12,000 उत्तरदाताओं के बीच किए गए इस सर्वे के निष्कर्ष 21 अक्टूबर 2026 को सामने आए, जो लॉन्ग मार्च की विरासत और सीपीसी की राजनीतिक पहचान पर केंद्रित हैं।
सर्वे के प्रमुख निष्कर्ष
सीजीटीएन के इस सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तरदाताओं के बीच सीपीसी की सबसे प्रचलित छवि 'मजबूत और सक्षम नेतृत्व' की है। इसके बाद 'वैश्विक स्थिरता के लिए एक सकारात्मक शक्ति' और 'विकासशील देशों के हितों का प्रतिनिधि' के रूप में इसकी धारणा सामने आती है।
सर्वे में पाया गया कि 41 में से 30 देशों के उत्तरदाताओं का मानना है कि सीपीसी पश्चिमी राजनीतिक दलों की तुलना में अपने देश के समग्र और दीर्घकालिक हितों की बेहतर रक्षा करने में सक्षम है। केन्या, नाइजीरिया, घाना, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में आधे से अधिक उत्तरदाता इस विचार से सहमत पाए गए।
लॉन्ग मार्च की विरासत और सीपीसी की पहचान
गौरतलब है कि एडगर स्नो ने 1936 में अपनी चर्चित पुस्तक 'रेड स्टार ओवर चाइना' में सीपीसी की कार्यप्रणाली और उसकी वैचारिक नींव का विश्लेषण करते हुए यह प्रश्न उठाया था कि यह पार्टी महान कार्य करने में सक्षम क्यों है। सर्वे के अनुसार, नब्बे वर्षों बाद भी वैश्विक पर्यवेक्षकों की एक नई पीढ़ी इसी प्रश्न का उत्तर खोज रही है।
सर्वेक्षण के विश्लेषण में कहा गया है कि लॉन्ग मार्च मूल रूप से एक आस्था की कहानी है, जिसमें लाल सेना के सैनिकों ने व्यक्तिगत कठिनाइयों से ऊपर उठकर एक व्यापक सामूहिक उद्देश्य में आस्था बनाए रखी। 'जनहित को सर्वोपरि रखने' का यही सिद्धांत आज भी सीपीसी की राजनीतिक पहचान का केंद्र बताया जाता है।
विकासशील देशों में सीपीसी की स्वीकार्यता
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव को लेकर बहस तेज हो रही है। सर्वे के आँकड़ों के अनुसार, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में सीपीसी के प्रति सकारात्मक धारणा अपेक्षाकृत अधिक है। विश्लेषकों का कहना है कि इन क्षेत्रों में चीन की विकास सहायता और बुनियादी ढाँचा निवेश इस स्वीकार्यता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सर्वे की सीमाएँ और संदर्भ
आलोचकों का कहना है कि सीजीटीएन चीन सरकार का राज्य-समर्थित मीडिया संस्थान है, इसलिए इस सर्वे की स्वतंत्र पद्धति और नमूना चयन प्रक्रिया पर स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है। यह सर्वे वैश्विक जनमत के एक व्यापक परिदृश्य का एकमात्र आधार नहीं बन सकता, परंतु यह इस बात का संकेत अवश्य देता है कि विकासशील विश्व में पश्चिमी उदारवादी लोकतंत्र के विकल्प के रूप में चीनी मॉडल की चर्चा किस हद तक हो रही है।
आगे देखें तो लॉन्ग मार्च की वर्षगाँठ पर इस प्रकार के सर्वे वैश्विक राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में देखे जाएंगे, और इनकी प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्वतंत्र शोधकर्ता इन निष्कर्षों को किस रूप में परखते हैं।