चीन का वैश्विक शासन श्वेत पत्र: 160 देशों का समर्थन, शी चिनफिंग की 'साझा भविष्य' अवधारणा केंद्र में
सारांश
मुख्य बातें
चीनी राज्य परिषद सूचना कार्यालय ने 17 जून 2025 को 'अधिक न्यायपूर्ण और समान वैश्विक शासन: चीन की अवधारणा, पहल और कार्य' शीर्षक से एक विस्तृत श्वेत पत्र जारी किया। 20,000 से अधिक शब्दों वाले इस दस्तावेज़ का उद्देश्य वैश्विक शासन पर चीन के दृष्टिकोण को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करना और व्यापक सहमति बनाना है।
श्वेत पत्र की मुख्य अवधारणा
दस्तावेज़ में कहा गया है कि वैश्विक शासन मानवता के साझा हितों और कल्याण से जुड़ा विषय है। इसमें राष्ट्रपति शी चिनफिंग द्वारा प्रस्तुत 'मानव जाति के साझे भविष्य वाले समुदाय' की अवधारणा को केंद्रीय स्तंभ के रूप में रेखांकित किया गया है। श्वेत पत्र के अनुसार, चीन परामर्श, संयुक्त योगदान और साझा लाभ पर आधारित वैश्विक शासन दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
वैश्विक शासन पहल को मिला समर्थन
दस्तावेज़ में दावा किया गया है कि वर्ष 2025 में प्रस्तुत वैश्विक शासन पहल को लगभग 160 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों का त्वरित समर्थन मिला। इनमें से 60 से अधिक देश सक्रिय रूप से 'वैश्विक शासन मित्र समूह' में शामिल हुए। श्वेत पत्र के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि यह पहल बहुपक्षवाद को कायम रखने और न्यायपूर्ण भविष्य की दिशा में एक स्पष्ट संदेश देती है।
संयुक्त राष्ट्र केंद्रित ढाँचा
श्वेत पत्र में स्पष्ट किया गया है कि चीन की वैश्विक शासन पहल का सबसे मूलभूत पहलू संयुक्त राष्ट्र के अधिकार और प्रतिष्ठा को बनाए रखना है। दस्तावेज़ में अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों एवं सिद्धांतों को अक्षुण्ण रखने पर बल दिया गया है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता पर बहस तेज़ है।
दस्तावेज़ की संरचना
प्रस्तावना और निष्कर्ष के अतिरिक्त श्वेत पत्र को पाँच भागों में विभाजित किया गया है — विश्व के समक्ष मौजूदा संकट, वैश्विक शासन पहल के समाधान, वैश्विक शासन में चीन का योगदान, परिवर्तन की दिशा का मार्गदर्शन, और ऐतिहासिक मोड़ पर सामूहिक प्रयास। यह संरचना इसे एक नीतिगत घोषणापत्र की तरह प्रस्तुत करती है।
आगे की दिशा
चीन का यह श्वेत पत्र ऐसे समय में आया है जब वैश्विक व्यवस्था में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहे हैं और विकासशील देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की माँग कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि इस दस्तावेज़ की व्याख्या पश्चिमी देश अलग नज़रिए से करेंगे, जबकि ग्लोबल साउथ के देश इसे अपनी आकांक्षाओं के करीब पाएँगे। इस पहल का दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि चीन इसे व्यवहार में कितना उतार पाता है।