चीन-रूस गठजोड़ बदल रहा बाल्टिक रणनीति, अमेरिकी सीनेटरों ने जताई गंभीर चिंता

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चीन-रूस गठजोड़ बदल रहा बाल्टिक रणनीति, अमेरिकी सीनेटरों ने जताई गंभीर चिंता

सारांश

अमेरिकी संसद की सुनवाई में सामने आया कि चीन रूस के रक्षा उद्योग को 80% डुअल यूज़ सामान दे रहा है — और इससे बाल्टिक देश बीजिंग के साथ अपने आर्थिक रिश्तों पर पुनर्विचार कर रहे हैं। यूक्रेन युद्ध अब सिर्फ यूरोपीय संकट नहीं, बल्कि एशिया-प्रशांत रणनीति को भी आकार दे रहा है।

मुख्य बातें

अमेरिकी विदेश विभाग के उप सहायक सचिव क्रिस्टोफर स्मिथ ने कहा कि चीन रूस के रक्षा औद्योगिक ढाँचे को लगभग 80% डुअल यूज़ सामान उपलब्ध कराता है।
लिथुआनिया , लातविया और एस्टोनिया अब चीन के साथ आर्थिक संबंधों को यूक्रेन युद्ध से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दे के रूप में देख रहे हैं।
बाल्टिक देश अपने संचार तंत्र से चीनी पुर्जे हटा चुके हैं और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला पर अमेरिका के साथ सहयोग कर रहे हैं।
प्रतिनिधि विलियम कीटिंग ने कहा कि चीन ताइवान रणनीति के लिए यूक्रेन और बाल्टिक घटनाक्रमों का विश्लेषण कर रहा है।
2004 में नाटो में शामिल हुए बाल्टिक देश नाटो के रक्षा खर्च लक्ष्यों को पार कर चुके हैं और यूक्रेन के सबसे सक्रिय समर्थकों में हैं।

वाशिंगटन में 15 मई 2026 को हाउस फॉरेन अफेयर्स सब-कमेटी की सुनवाई के दौरान अमेरिकी सीनेटरों और विदेश विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि रूस की युद्ध मशीन को चीन का बढ़ता समर्थन लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया की बीजिंग के प्रति सोच को तेज़ी से बदल रहा है। तीनों बाल्टिक देश अब चीन के साथ आर्थिक संबंधों को यूक्रेन युद्ध से सीधे जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे के रूप में देख रहे हैं।

सुनवाई में क्या उठे मुद्दे

बाल्टिक सुरक्षा पर केंद्रित इस संसदीय सुनवाई में दोनों दलों के सांसदों ने एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया को नाटो के सबसे भरोसेमंद अग्रिम मोर्चे के सहयोगी बताया। उन्होंने रेखांकित किया कि ये तीनों देश न केवल नाटो के रक्षा खर्च के लक्ष्यों को पार कर चुके हैं, बल्कि यूक्रेन को सैन्य और राजनीतिक समर्थन देने में भी अग्रणी रहे हैं। गौरतलब है कि बाल्टिक देश पहले सोवियत संघ का हिस्सा थे और 2004 में नाटो में शामिल हुए थे।

चीन का रूस को समर्थन — आँकड़े क्या कहते हैं

अमेरिकी विदेश विभाग के उप सहायक सचिव क्रिस्टोफर स्मिथ ने सांसदों को बताया, 'चीन, रूस के रक्षा औद्योगिक ढाँचे के लिए लगभग 80 फीसदी डुअल यूज़ सामान उपलब्ध कराता है।' उन्होंने कहा कि इसी कारण बाल्टिक सरकारें बीजिंग के साथ व्यापार और रणनीतिक संबंधों पर पुनर्विचार कर रही हैं। स्मिथ ने यह भी बताया कि बाल्टिक देश अपने संचार तंत्र से कई चीनी पुर्जे पहले ही हटा चुके हैं और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला पर अमेरिका के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

ताइवान कोण और चीन की रणनीतिक निगाह

रैंकिंग मेंबर प्रतिनिधि विलियम कीटिंग ने कहा कि चीन यूक्रेन संघर्ष पर गहरी नज़र बनाए हुए है और देख रहा है कि नाटो अपनी पूर्वी सीमा पर कैसे प्रतिक्रिया देता है। कीटिंग ने कहा, 'चीन को लेकर हमारी रणनीतिक नीति उसे सीमित करने की है।' यह बयान उस प्रश्न के संदर्भ में आया जिसमें पूछा गया था कि क्या बीजिंग ताइवान को लेकर अपनी रणनीति बनाते समय यूक्रेन और बाल्टिक घटनाक्रमों का विश्लेषण कर रहा है। स्मिथ ने इससे सहमति जताते हुए कहा कि चीन निश्चित रूप से यूक्रेन युद्ध का गहराई से अध्ययन कर रहा है।

लिथुआनिया और ताइवान विवाद का संदर्भ

रिपब्लिकन प्रतिनिधि यंग किम ने 2021 में लिथुआनिया द्वारा ताइवान को 'ताइवानीज़' नाम से एक प्रतिनिधि कार्यालय खोलने की अनुमति देने के फैसले का उल्लेख किया, जिस पर बीजिंग ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। किम ने पूछा कि क्या लिथुआनिया के नेताओं की हालिया टिप्पणियों के बाद देश चीन के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में बढ़ रहा है। स्मिथ ने जवाब दिया कि लिथुआनिया यूरोप के भीतर चीन के आर्थिक दबाव के विरुद्ध एक मज़बूत आवाज़ बना हुआ है।

आगे क्या होगा

रिपब्लिकन प्रतिनिधि रैंडी फाइन ने कहा कि चीन इन देशों का भी शत्रु बनता जा रहा है, चाहे भौगोलिक दूरी कितनी भी अधिक क्यों न हो। यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब यूक्रेन युद्ध अपने चौथे वर्ष में है और पूरे यूरोप में यह चिंता गहरा रही है कि चीन रूस के लिए एक अहम आर्थिक और तकनीकी जीवन-रेखा बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाल्टिक देशों का यह रुख आने वाले महीनों में यूरोपीय संघ की चीन नीति को भी प्रभावित कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि इसने एशिया-प्रशांत समीकरणों को भी सीधे प्रभावित करना शुरू कर दिया है। चीन का 80% डुअल यूज़ समर्थन का आँकड़ा चौंकाने वाला है, लेकिन मुख्यधारा की कवरेज अक्सर यह नहीं पूछती कि पश्चिमी प्रतिबंध व्यवस्था इतनी बड़ी खामी को क्यों नहीं रोक पाई। बाल्टिक देशों का चीनी पुर्जे हटाने का कदम व्यावहारिक है, पर यह सवाल बना रहता है कि यूरोपीय संघ एकजुट होकर बीजिंग पर आर्थिक दबाव बनाएगा या नहीं। ताइवान कोण को जोड़ना इस बहस को और जटिल बनाता है — अगर नाटो बाल्टिक सीमा पर कमज़ोर दिखा, तो चीन इसे ताइवान के संदर्भ में एक संकेत के रूप में पढ़ सकता है।
RashtraPress
15 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बाल्टिक देश चीन के साथ अपने संबंध क्यों सीमित कर रहे हैं?
लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया इसलिए चीन के साथ आर्थिक संबंध सीमित कर रहे हैं क्योंकि चीन रूस के रक्षा उद्योग को लगभग 80% डुअल यूज़ सामान उपलब्ध करा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार ये देश इसे यूक्रेन युद्ध से जुड़ा सीधा राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा मानते हैं।
हाउस फॉरेन अफेयर्स सब-कमेटी की सुनवाई में क्या हुआ?
15 मई 2026 को वाशिंगटन में बाल्टिक सुरक्षा पर केंद्रित इस सुनवाई में अमेरिकी सांसदों और विदेश विभाग के अधिकारियों ने चीन के रूस समर्थन पर गंभीर चिंता जताई। उप सहायक सचिव क्रिस्टोफर स्मिथ ने 80% डुअल यूज़ सामान का आँकड़ा पेश किया और बताया कि बाल्टिक देश पहले ही अपने संचार तंत्र से चीनी पुर्जे हटा चुके हैं।
चीन यूक्रेन युद्ध का अध्ययन क्यों कर रहा है?
अमेरिकी सांसद विलियम कीटिंग और अधिकारी क्रिस्टोफर स्मिथ के अनुसार चीन यह समझने की कोशिश कर रहा है कि नाटो अपनी पूर्वी सीमा पर कैसे प्रतिक्रिया देता है, ताकि वह ताइवान को लेकर अपनी रणनीति तैयार कर सके। स्मिथ ने कहा कि चीन निश्चित रूप से इस युद्ध का गहराई से विश्लेषण कर रहा है।
लिथुआनिया और ताइवान विवाद क्या है?
2021 में लिथुआनिया ने ताइवान को 'ताइवानीज़' नाम से एक प्रतिनिधि कार्यालय खोलने की अनुमति दी थी, जिस पर बीजिंग ने तीखी प्रतिक्रिया दी। अमेरिकी सांसद यंग किम ने सुनवाई में यह मुद्दा उठाया और पूछा कि क्या लिथुआनिया चीन के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में जा रहा है, जिस पर स्मिथ ने कहा कि लिथुआनिया यूरोप में चीन के आर्थिक दबाव के विरुद्ध मज़बूत आवाज़ बना हुआ है।
बाल्टिक देश नाटो में कब शामिल हुए और यूक्रेन युद्ध में उनकी भूमिका क्या है?
एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया 2004 में नाटो में शामिल हुए थे और पहले सोवियत संघ का हिस्सा रहे हैं। 2022 में रूस के यूक्रेन पर बड़े पैमाने के हमले के बाद से ये तीनों देश कीव के सबसे सक्रिय समर्थकों में हैं और नाटो के रक्षा खर्च लक्ष्यों को पार कर चुके हैं।
राष्ट्र प्रेस
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