गांधी जयंती पर संयुक्त राष्ट्र में राजनयिकों ने किया अहिंसा के संदेश को याद, वैश्विक प्रासंगिकता पर दिया जोर
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र में 2 अक्टूबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के अवसर पर दुनिया भर के राजनयिकों ने महात्मा गांधी की जयंती पर उनके अहिंसा के संदेश को याद किया और समकालीन वैश्विक चुनौतियों से निपटने में उनके आदर्शों की प्रासंगिकता पर जोर दिया। वक्ताओं ने बताया कि गांधी के सिद्धांत उनके अपने-अपने क्षेत्रों में आज भी किस तरह गूंजते हैं।
मुख्य घटनाक्रम
मोरक्को के संयुक्त राष्ट्र स्थायी प्रतिनिधि उमर हिलाले ने इस स्मृति कार्यक्रम में कहा, 'अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उनके जन्मदिन पर अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाकर उनकी विरासत को सभी लोगों के लिए एक साझा धरोहर बनाने का फैसला किया है।' उन्होंने कहा, 'उनकी समझ में, अहिंसा एक सक्रिय शक्ति है — यह अनुशासन, साहस और दूसरे की मानवता में अटूट विश्वास की माँग करती है।'
हिलाले ने यह भी रेखांकित किया कि मोरक्को में राजा मोहम्मद छठे ने सदैव संयम, सहिष्णुता और शांतिपूर्ण संवाद के मार्ग को अपनाया है, जहाँ विभिन्न धर्म और संस्कृतियाँ मिलजुलकर रहती हैं।
भारत का दृष्टिकोण: गांधीवाद का समकालीन उदाहरण
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने गांधीवादी सिद्धांतों के एक ताज़े उदाहरण का उल्लेख किया — घायल पायलट स्मित मच्छार का, जिन्होंने फ्लाईदुबई एयरलाइंस की उड़ान में अहिंसक साहस के ज़रिए यात्रियों की जान बचाई। हरीश ने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि पायलट 'अहिंसा के सिद्धांत का सच्चा प्रतीक' हैं।
मोदी के शब्दों को उद्धृत करते हुए हरीश ने बताया कि पायलट ने हमले के बावजूद 'न केवल इसे सहन किया, बल्कि बहादुरी और साहस दिखाते हुए यह सुनिश्चित किया कि उड़ान सुरक्षित गंतव्य तक पहुँचे और उनकी जिम्मेदारी में सभी यात्री सुरक्षित रहें।' गौरतलब है कि चाकू से घायल होने के बावजूद मच्छार ने कॉकपिट का दरवाज़ा खोल दिया ताकि यात्री उस सह-पायलट पर काबू पा सकें, जिसने आतंकी अपहरण की कोशिश में उन पर हमला किया था।
कार्यक्रम से पूर्व हरीश ने संयुक्त राष्ट्र परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।
लातिन अमेरिका में गांधी का प्रभाव
उरुग्वे की संयुक्त राष्ट्र स्थायी प्रतिनिधि लौरा डुप्यू लासेरे ने बताया कि गांधी का संदेश दक्षिण अमेरिका में किस तरह आत्मसात किया गया। उन्होंने कहा कि यह संदेश 'अर्जेंटीना और उरुग्वे में तानाशाही के दौर में भी प्रासंगिक रहा, जब दादियाँ अपने जबरन गायब किए गए बच्चों और पोते-पोतियों की तलाश में मानवीय संकट से जूझ रही थीं।'
जी77 की पूर्व अध्यक्ष लासेरे ने जोड़ा, 'गांधी ने दिखाया कि अहिंसा कमज़ोरी या निष्क्रियता का प्रतीक नहीं, बल्कि साहस की अभिव्यक्ति है।' यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब दुनिया के कई हिस्सों में सशस्त्र संघर्ष और मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएँ जारी हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ: अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2007 में 141 देशों द्वारा प्रायोजित एक प्रस्ताव के ज़रिए 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में घोषित किया था। यह निर्णय इस बात का प्रमाण है कि गांधी के विचारों को वैश्विक स्तर पर किस व्यापकता से स्वीकार किया गया है। यह दिन हर वर्ष संघर्ष-ग्रस्त दुनिया को शांति और संवाद का स्मरण कराता है।
क्या होगा आगे
इस वार्षिक कार्यक्रम की परंपरा भविष्य में भी जारी रहने की उम्मीद है, और राजनयिक समुदाय की यह भागीदारी संकेत देती है कि गांधीवादी कूटनीति — जो संवाद और अहिंसा को केंद्र में रखती है — को बहुपक्षीय मंचों पर लगातार बल मिल रहा है।