1 अक्टूबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस 2 अक्टूबर: गांधी का शांति-दर्शन आज भी 140+ देशों को करता है प्रेरित

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस 2 अक्टूबर: गांधी का शांति-दर्शन आज भी 140+ देशों को करता है प्रेरित

सारांश

2 अक्टूबर सिर्फ एक जन्मदिन नहीं है — यह एक विचार का वैश्विक उत्सव है। 2007 में संयुक्त राष्ट्र ने 140 से अधिक देशों की सहमति से इस तिथि को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित किया। राजघाट से जिनेवा तक, गांधी का शांति-दर्शन आज भी दुनिया के संघर्षों को दिशा देने वाली कसौटी बना हुआ है।

मुख्य बातें

2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती के उपलक्ष्य में अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून 2007 को यह प्रस्ताव बिना मतदान, सर्वसम्मति से पारित किया।
प्रस्ताव को 140 से अधिक देशों ने सह-प्रायोजित किया; भारत की ओर से तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने इसे पेश किया।
बेल्जियम, अमेरिका, स्पेन, सर्बिया, स्विट्जरलैंड, थाईलैंड, कज़ाकिस्तान और नीदरलैंड सहित कई देशों में स्मरणोत्सव आयोजित होते हैं।
भारत में राजघाट पर श्रद्धांजलि, जन-अभियान और शैक्षिक कार्यक्रम इस दिन का केंद्रीय हिस्सा होते हैं।
गांधी का अहिंसा-दर्शन अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन और दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद-विरोधी संघर्ष को भी गहराई से प्रभावित कर चुका है।

अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस हर वर्ष 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है — वह तारीख जो भारत के लिए राष्ट्रीय श्रद्धांजलि का दिन है और शेष विश्व के लिए अहिंसा, शांति एवं मानवीय संवाद के सार्वभौमिक संदेश की याद दिलाती है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून 2007 को एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित कर इस तिथि को वैश्विक मान्यता प्रदान की, जिसे 140 से अधिक देशों ने सह-प्रायोजित किया।

संयुक्त राष्ट्र का ऐतिहासिक प्रस्ताव

गांधी के अहिंसा-दर्शन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की पहल भारत की ओर से की गई थी। तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने महासभा में यह प्रस्ताव पेश किया, जिसे बिना किसी मतदान के सर्वसम्मति से पारित किया गया — यह स्वयं इस विचार की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। प्रस्ताव में अहिंसा के सिद्धांत की सार्वभौमिक प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए शांति, सहिष्णुता, आपसी समझ और अहिंसा की संस्कृति को प्रोत्साहित करने की इच्छा व्यक्त की गई।

गांधी का अहिंसा-दर्शन: विचार से रणनीति तक

महात्मा गांधी के लिए अहिंसा केवल एक नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष की एक सुनियोजित रणनीति थी। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने सत्याग्रह और असहयोग के माध्यम से यह सिद्ध किया कि हिंसा के बिना भी सत्ता से लोहा लिया जा सकता है। गौरतलब है कि उनके इस दर्शन ने केवल भारत को नहीं, बल्कि अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन और दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद-विरोधी संघर्ष को भी गहराई से प्रभावित किया।

वैश्विक स्मरणोत्सव

2 अक्टूबर को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इस दिवस का आयोजन होता है। बेल्जियम, अमेरिका, स्पेन, सर्बिया, स्विट्जरलैंड, थाईलैंड, कज़ाकिस्तान और नीदरलैंड जैसे देशों में स्मरणोत्सव आयोजित किए जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में होने वाले कार्यक्रमों और महासचिव के वक्तव्यों में गांधी के दर्शन को दुनिया के मौजूदा संघर्षों के परिप्रेक्ष्य में रखा जाता है, जहाँ बार-बार यह बात उभरती है कि सत्य और अहिंसा में गांधी का विश्वास किसी भी सैन्य शक्ति से कहीं अधिक दूरगामी प्रभाव रखता था।

भारत में गांधी जयंती का स्वरूप

भारत में इस दिन राजघाट, नई दिल्ली पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित राजनीतिक एवं सामाजिक प्रतिनिधि श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। शैक्षिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा गांधी के आदर्शों पर आधारित जन-अभियान, प्रभातफेरी और निबंध प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। यह दिन केवल स्मरण तक सीमित नहीं रहता — यह गांधी के विचारों को सार्वजनिक जीवन में जीवंत बनाए रखने का अवसर भी बनता है।

आज के संदर्भ में अहिंसा का संदेश

यह ऐसे समय में आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में सशस्त्र संघर्ष जारी हैं और वैश्विक तनाव बढ़ रहा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस का मूल संदेश — कि संघर्ष का समाधान हमेशा संघर्ष नहीं होता — और भी प्रासंगिक हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव ने शिक्षा और जन-जागरूकता के माध्यम से इस संदेश को व्यापक बनाने पर विशेष ज़ोर दिया था। गांधी का यह विचार कि दुनिया की दिशा हिंसा से नहीं, शांति और संवाद से तय होती है — आज भी नीति-निर्माताओं, समाज-सुधारकों और आम नागरिकों के लिए एक कसौटी बना हुआ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या इस दिवस का प्रभाव सिर्फ प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित रह गया है। जब दुनिया के दर्जनों देश सशस्त्र संघर्षों में उलझे हैं, तो गांधी के नाम पर होने वाले वार्षिक समारोहों और वास्तविक नीतिगत बदलावों के बीच की खाई को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। भारत की विदेश नीति भी इस विरोधाभास से अछूती नहीं है — एक ओर वह गांधी के अहिंसा-दर्शन का वैश्विक झंडाबरदार बनती है, दूसरी ओर रक्षा व्यय और रणनीतिक साझेदारियों का दायरा निरंतर बढ़ता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस तब सार्थक होगा जब यह केवल श्रद्धांजलि का अवसर न रहकर संवाद और संघर्ष-समाधान की ठोस नीतियों का उत्प्रेरक बने।
RashtraPress
1 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस क्या है और यह 2 अक्टूबर को क्यों मनाया जाता है?
अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस प्रतिवर्ष 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर मनाया जाता है, क्योंकि गांधी अहिंसा के सबसे प्रभावशाली वैश्विक प्रतीक माने जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून 2007 को इस तिथि को आधिकारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित किया।
संयुक्त राष्ट्र ने यह प्रस्ताव कब और कैसे पारित किया?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून 2007 को यह प्रस्ताव बिना किसी मतदान के सर्वसम्मति से पारित किया। भारत की ओर से तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने इसे पेश किया और 140 से अधिक देशों ने इसे सह-प्रायोजित किया।
गांधी के अहिंसा-दर्शन का वैश्विक प्रभाव कहाँ-कहाँ देखा गया?
गांधी के अहिंसा-दर्शन ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन और दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद-विरोधी संघर्ष को भी गहराई से प्रभावित किया। बेल्जियम, स्पेन, थाईलैंड, कज़ाकिस्तान और नीदरलैंड जैसे देशों में भी 2 अक्टूबर को स्मरणोत्सव आयोजित होते हैं।
भारत में गांधी जयंती कैसे मनाई जाती है?
भारत में 2 अक्टूबर को राजघाट, नई दिल्ली पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित वरिष्ठ नेता श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। शैक्षिक संस्थाओं में जन-अभियान, प्रभातफेरी और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं जो गांधी के आदर्शों को जीवंत रखते हैं।
अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस का मूल संदेश क्या है?
इस दिवस का मूल संदेश यह है कि संघर्ष का समाधान हमेशा संघर्ष नहीं होता — शांति, सहिष्णुता, आपसी समझ और संवाद को सामाजिक व राजनीतिक जीवन का हिस्सा बनाना ज़रूरी है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव ने शिक्षा और जन-जागरूकता के ज़रिए इस संदेश को व्यापक बनाने पर विशेष ज़ोर दिया।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 घंटे पहले
  2. 5 घंटे पहले
  3. 12 महीने पहले
  4. 12 महीने पहले
  5. 12 महीने पहले
  6. 12 महीने पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले