क्या ग्रीनलैंड में भीषण ठंड के बीच 'कब्जे' वाली नीति तापमान बढ़ा रही है?
सारांश
Key Takeaways
- ग्रीनलैंड का भू-राजनीतिक महत्व अत्यधिक है।
- संसाधनों की प्रचुरता इसे और अधिक आकर्षक बनाती है।
- अमेरिका, रूस और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।
- डेनमार्क की स्थिति ग्रीनलैंड के बिना कमजोर हो जाएगी।
- आर्कटिक समुद्री मार्ग का खुलना वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकता है।
नई दिल्ली, 19 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। ग्रीनलैंड को लेकर वैश्विक स्तर पर हलचल मची हुई है। अमेरिका लगातार ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की धमकी दे रहा है, जबकि डेनमार्क उसकी इस मंशा के खिलाफ खड़ा है। रूस और चीन भी अमेरिका को चेतावनी दे रहे हैं। आइए समझते हैं कि सुविधाओं की कमी और कम जनसंख्या के बावजूद ग्रीनलैंड के लिए महाशक्तियों के बीच यह तनातनी क्यों है।
हालांकि ग्रीनलैंड बर्फ से ढका, सुनसान और सुविधाओं से वंचित क्षेत्र लगता है, लेकिन भू-राजनीति के दृष्टिकोण से इसकी महत्वता बहुत अधिक है। यहां न तो बड़े सड़कें हैं और न ही विकसित शहर। इसकी जनसंख्या भी केवल करीब 56 हजार है, फिर भी रूस, चीन और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश ग्रीनलैंड पर नियंत्रण चाहते हैं। वर्तमान में, ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का शासन है।
ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के मध्य स्थित सबसे बड़ा द्वीप है और भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है। इसकी एकमात्र सीमा कनाडा से जुड़ी हुई है। ग्रीनलैंड को आंतरिक प्रशासन की स्वतंत्रता प्राप्त है, लेकिन रक्षा और विदेश नीति की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है।
ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र का प्रवेश द्वार है और जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं, आर्कटिक समुद्री मार्ग खुलते जा रहे हैं। ग्लेशियर के पिघलने से एक नया शिपिंग रूट तैयार हो रहा है, जो एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच की दूरी और समय को काफी कम कर सकता है। जिस देश के पास इन रूटों पर नियंत्रण होगा, वह वैश्विक व्यापार में प्रमुख भूमिका निभाएगा। इसके अलावा, ग्रीनलैंड की बर्फ में छिपे खजाने भी महत्वपूर्ण हैं।
अमेरिका का कहना है कि ग्रीनलैंड उसकी सुरक्षा के लिए जरूरी है। वहां पहले से ही थुले एयर बेस मौजूद है, जो मिसाइल चेतावनी और स्पेस सर्विलांस के लिए महत्वपूर्ण है। हाल के समय में रूस और चीन की सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं, जिससे अमेरिका ग्रीनलैंड को अपनी आर्कटिक सुरक्षा का एक प्रमुख तत्व मानता है।
रूस ग्रीनलैंड को अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है और इसे नाटो और अमेरिका की निगरानी के एक महत्वपूर्ण स्थान के रूप में मानता है। वहीं, चीन ग्रीनलैंड में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के प्रयास में है।
ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ मिनरल्स, यूरेनियम, जिंक, आयरन ओर और संभावित तेल-गैस भंडार हैं, जो किसी खजाने से कम नहीं हैं। ये खनिज इलेक्ट्रिक गाड़ियों, सेमीकंडक्टर, रक्षा और उच्च तकनीक उद्योग के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। चीन पहले से ही इन मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन में प्रमुखता रखता है। ऐसे में अमेरिका के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह ग्रीनलैंड पर अपना नियंत्रण स्थापित करे।
यदि डेनमार्क ग्रीनलैंड को खो देता है, तो वह आर्कटिक राजनीति से लगभग बाहर हो जाएगा।