संयुक्त राष्ट्र में हिंदी का विस्तार, फिर भी गैर आधिकारिक दर्जा बरकरार — भारत का स्वैच्छिक समर्थन जारी
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 9 अक्टूबर 2026 को हिंदी दिवस कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र के ग्लोबल कम्युनिकेशंस विभाग (UNDGC) में हिंदी को भारत के स्वैच्छिक सहयोग से समर्थन मिलता रहा है, किंतु हिंदी का दर्जा संयुक्त राष्ट्र में अब भी गैर आधिकारिक भाषा का ही है। यह स्थिति तब भी बनी हुई है जब महासभा ने हाल ही में एक बहुभाषावाद प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें गैर आधिकारिक भाषाओं के महत्व को मान्यता दी गई है।
बहुभाषावाद प्रस्ताव में हिंदी की मान्यता
हरीश ने कहा, "हाल ही में पारित बहुभाषावाद प्रस्ताव में हिंदी का गैर आधिकारिक भाषा का दर्जा बरकरार रखा गया है। इसका कारण यह है कि UNDGC हिंदी में समाचार और सोशल मीडिया सामग्री प्रसारित कर रहा है।" यह प्रस्ताव अंडोरा के सहयोग से महासभा में पेश किया गया था और पिछले महीने पारित हुआ।
प्रस्ताव में यह भी दोहराया गया है कि कोई भी राजनयिक प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में गैर आधिकारिक भाषाओं में अपना वक्तव्य दे सकता है। गौरतलब है कि इस प्रस्ताव ने गैर आधिकारिक भाषाओं के सांस्कृतिक, राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व को औपचारिक रूप से स्वीकार किया है — जो हिंदी के लिए एक सकारात्मक संकेत है, भले ही आधिकारिक दर्जा अभी दूर है।
'हिंदी एट यूएन' परियोजना और MOU की भूमिका
हरीश ने बताया कि भारत स्वेच्छा से 'हिंदी एट यूएन' परियोजना का समर्थन कर रहा है, जिसके ज़रिए दुनिया भर के हिंदी भाषियों तक संयुक्त राष्ट्र की खबरें और जानकारी हिंदी में पहुँचाई जाती हैं। भाजपा सांसद सी.पी. जोशी ने बताया कि वर्ष 2018 में UNDGC और भारत के बीच एक समझौता ज्ञापन (MOU) हुआ था, जिसके तहत नई दिल्ली के स्वैच्छिक योगदान से संयुक्त राष्ट्र की सामग्री हिंदी में प्रसारित की जाती है। जोशी ने बताया कि पिछले वर्ष इस समझौते को पाँच वर्षों के लिए और बढ़ा दिया गया।
यह ऐसे समय में उल्लेखनीय है जब भारत वैश्विक मंचों पर अपनी सॉफ्ट पावर को मज़बूत करने की दिशा में सक्रिय है और हिंदी को उसके प्रमुख सांस्कृतिक उपकरण के रूप में आगे बढ़ा रहा है।
हिंदी की वैश्विक पहुँच और प्रभाव
हरीश ने रेखांकित किया कि हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है और इसका प्रभाव भारत की सीमाओं से कहीं आगे तक फैला हुआ है। उन्होंने कहा कि भारतीय प्रवासी समुदाय, साहित्य, सिनेमा और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने हिंदी को विश्व के अलग अलग हिस्सों तक पहुँचाने में निर्णायक भूमिका निभाई है।
सांसद जोशी ने कहा, "आज हिंदी भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बना रही है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत एक बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक सभ्यता है और देश की सभी भाषाएँ साझा विरासत का हिस्सा हैं।
अंडोरा के राजदूत की भाषा कूटनीति पर राय
बहुभाषावाद प्रस्ताव को प्रायोजित करने वाले अंडोरा के स्थायी प्रतिनिधि जोआन फोर्नेर रोविरा ने कहा, "संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पहला अनुच्छेद हमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग, मानवाधिकारों और मूलभूत स्वतंत्रताओं के सम्मान को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करता है।" रोविरा ने स्पष्ट किया कि भाषा इस लक्ष्य को हासिल करने का एक अहम माध्यम है और "संयुक्त राष्ट्र के भीतर भाषा कूटनीति के सबसे महत्वपूर्ण साधनों में से एक है।"
आगे की राह: आधिकारिक दर्जे की चुनौती
हरीश ने गृह मंत्री अमित शाह के एक वक्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा कि "भाषा का सबसे बड़ा महत्व तब होता है, जब वह लोगों और संस्कृतियों को जोड़ने का काम करे, न कि उन्हें बाँटे।" भारत लगातार संयुक्त राष्ट्र में बहुभाषावाद से जुड़े प्रस्तावों का सह प्रायोजक रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा का दर्जा पाने के लिए सदस्य देशों की व्यापक सहमति और वित्तीय प्रतिबद्धता दोनों की आवश्यकता होगी — एक दीर्घकालिक कूटनीतिक यात्रा जो अभी जारी है।