हिंदी दिवस 2026: 'उर्मिला-विषयक उदासीनता' की शिकार हिंदी — बाज़ार, राजनीति और हिंग्लिश ने कैसे बदला स्वरूप?
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी दिवस हर वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाता है — उस ऐतिहासिक तिथि की याद में जब 1949 में संविधान सभा ने हिंदी को भारत की आधिकारिक राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। किंतु आज, जब दुनिया की दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा के रूप में हिंदी को गिना जाता है, तब यह प्रश्न और भी तीखा हो जाता है कि आखिर इस भाषा को एक 'दिवस' की आवश्यकता क्यों पड़ी — और क्यों महावीर प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में 'उर्मिला-विषयक उदासीनता' इसकी नियति बन गई है?
हिंदी का ऐतिहासिक सफर
हिंदी का जन्म प्राचीन संस्कृत की कोख से हुआ। वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत, पाली और अपभ्रंश से होते हुए जिस भाषा ने आकार लिया, वह थी आज की हिंदी। भाषाविदों के अनुसार इस भाषा का एक सुव्यवस्थित स्वरूप तैयार होने में 250 से अधिक वर्ष लगे। साहित्य-सृजन की दृष्टि से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को हिंदी भाषा का पिता माना जाता है।
यह भाषा एक हज़ार वर्षों से अधिक के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। इसकी विशेषता यह रही कि इसने अन्य भाषाओं के शब्दों को गंगा की तरह अपने में समाहित किया — अरबी, फ़ारसी, तुर्की और स्थानीय बोलियों के शब्द इसमें घुलते चले गए और भाषा और समृद्ध होती रही।
राजभाषा का दर्जा और संवैधानिक यात्रा
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को भारत की आधिकारिक राजभाषा के रूप में मान्यता दी। यह निर्णय 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने के साथ प्रभावी हुआ। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया।
गौरतलब है कि भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को 'राष्ट्रभाषा' का दर्जा नहीं दिया गया — हिंदी और अंग्रेजी केवल दो 'कार्यालयी कामकाजी भाषाएँ' हैं। संविधान में यह लक्ष्य था कि अंग्रेजी का प्रयोग 26 जनवरी 1965 तक धीरे-धीरे कम किया जाएगा, किंतु जब 1965 में हिंदी को अनिवार्य करने का प्रयास हुआ, तब तमिलनाडु में हिंसक आंदोलन भड़क उठे।
इसके परिणामस्वरूप कांग्रेस कार्यसमिति ने स्वीकार किया कि हिंदी को एकमात्र आधिकारिक भाषा नहीं बनाया जा सकता। तब राजभाषा अधिनियम, 1963 लागू हुआ, जिसे 1967 में संशोधित कर भारत ने द्विभाषीय पद्धति — हिंदी और अंग्रेजी — को अपना लिया।
महापुरुषों की दृष्टि में हिंदी
आज़ादी से पहले हिंदी के महत्व को लेकर अनेक मनीषियों ने स्पष्ट मत दिए। ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय का मानना था कि देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है। ब्रह्म समाज से संबद्ध केशव चंद्र सेन ने लिखा था कि भारत में एकता का एकमात्र उपाय यही है कि सारे देश में एक ही भाषा का व्यवहार हो।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी कहा था कि हिंदी द्वारा समग्र भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। महात्मा गांधी के शब्द और भी स्पष्ट थे — उन्होंने कहा था: 'अगर हिन्दुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है, क्योंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है, वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता।'
हिंदी की दुर्दशा के कारण
भाषाविदों के अनुसार किसी भाषा का पतन तब तेज़ी से होता है जब वह केवल 'राजकीय कार्य की भाषा' बनकर रह जाती है और उसमें लचीलापन समाप्त होने लगता है। जब भाषा व्याकरण-निष्ठा के बोझ तले दब जाती है और संवाद में 'शुद्धता' की खोज होने लगती है, तो वह जीवंत भाषा से औपचारिक ढाँचे में तब्दील हो जाती है। यही हश्र कालांतर में संस्कृत और पाली का हुआ था।
हिंदी की दुर्दशा के लिए केवल समाज नहीं, बल्कि बाज़ार और राजनीति दोनों उत्तरदायी हैं। अंग्रेजी ने एक ऐसी मानसिकता को जन्म दिया जिसमें परिवारों में 'टमाटर' की जगह 'टोमैटो', 'चावल' की जगह 'राइस' और 'केले' की जगह 'बनाना' कहना श्रेष्ठता का प्रतीक बन गया। बुआ, चाची, मौसी सब 'आंटी' और चाचा, फूफा, मौसा सब 'अंकल' हो गए। हिंदी की गिनती तक भुला दी गई।
दूसरी ओर कुछ गैर-हिंदी भाषी राज्यों में यह भ्रम बना रहा कि हिंदी के सर्वमान्य होने से क्षेत्रीय भाषाओं का दायरा सिकुड़ जाएगा। इस भ्रम ने राजनीतिक विरोध को हवा दी और हिंदी-विरोध कई नेताओं की राजनीति चमकाने का माध्यम बन गया।
'उर्मिला-विषयक उदासीनता' — एक सटीक रूपक
हिंदी के महान निबंधकार महावीर प्रसाद द्विवेदी ने एक निबंध लिखा था — 'कवियों की उर्मिला-विषयक उदासीनता'। रामायण में उर्मिला लक्ष्मण की पत्नी थीं — जो महलों में रहकर 14 वर्षों तक पति के बिना, सबसे अधिक कष्ट में जीती रहीं, किंतु महाकाव्य में उनकी उपेक्षा होती रही। हिंदी की स्थिति भी ठीक ऐसी ही है — सबसे अधिक बोली जाने वाली, सबसे अधिक समझी जाने वाली, किंतु सबसे कम संरक्षित।
आज हिंदी 'हिंग्लिश' के रूप में एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश उसे समृद्ध करने के बजाय कमज़ोर कर रहा है। बावजूद इसके, हिंदी के बढ़ते पाठक वर्ग ने इस भाषा के साहित्य को जीवित रखा है — और यही उसके अस्तित्व की सबसे बड़ी ताक़त है। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी को केवल एक दिवस तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे रोज़मर्रा की जीवंत भाषा के रूप में अपनाया जाए।