हिंदी दिवस पर अजीत भारती: 'क्रिया और कारक न बदलें तो हिंदी में मिलावट भाषा का विकास है'
सारांश
मुख्य बातें
पत्रकार, लेखक और साहित्यकार अजीत भारती ने 14 सितंबर 2026 को राष्ट्रीय हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी भाषा के विकास, मिश्रण और डिजिटल दौर में उसकी बदलती पहचान पर विस्तृत विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक हिंदी की क्रियाएँ और कारक चिह्न अपरिवर्तित रहते हैं, तब तक अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश भाषा-क्षरण नहीं बल्कि भाषा-समृद्धि है।
क्लासिक और आधुनिक हिंदी में अंतर
भारती ने कहा, 'किसी भी भाषा का स्वाभाविक विकास वही होता है कि आपको क्या मिल रहा है और आपसे दूसरी भाषाओं में क्या जा रहा है। इसकी एक ग्राह्यता होनी चाहिए, तभी हिंदी भाषा विकसित होगी और दूसरे लोगों को स्वीकार होगी।' उन्होंने बताया कि क्लासिक हिंदी के दौर में अंग्रेज़ी का प्रभाव न्यूनतम था और उर्दू को एक अलग भाषा के रूप में मान्यता मिली हुई थी।
उनके अनुसार हिंदी में उर्दू का मिश्रण काफ़ी हद तक हिंदी फ़िल्मों और उनके लेखकों की देन है। 1970 के दशक के आसपास जब समाज में अंग्रेज़ी का प्रभाव बढ़ा, तब से अंग्रेज़ी शब्दों का हिंदी में समावेश होने लगा। आज टीवी, ओटीटी प्लेटफॉर्म और आपसी वार्तालाप के ज़रिये बच्चों की पहुँच एक साथ कई भाषाओं तक है, जिसने यह प्रक्रिया और तेज़ कर दी है।
रोमन हिंदी का उदय और एसएमएस की भूमिका
रोमन लिपि में हिंदी लिखने के बढ़ते चलन पर भारती ने कहा कि इसकी जड़ें वर्ष 2000 में मोबाइल फ़ोन के आगमन से जुड़ी हैं। उस समय मोबाइल में हिंदी कीबोर्ड नहीं होते थे, इसलिए लोग लघु संदेश सेवा (SMS) के ज़रिये एक-दूसरे से संवाद करने के लिए रोमन लिपि में हिंदी लिखते थे। उनके अनुसार, '2010 के बाद मोबाइल में हिंदी टाइपिंग वाला कीबोर्ड चलन में आया।'
यह ऐसे समय में आया जब डिजिटल संचार की रफ़्तार ने भाषाई सीमाओं को और धुंधला कर दिया। गौरतलब है कि आज भी इंटरनेट और सोशल मीडिया पर रोमन हिंदी और देवनागरी दोनों समानांतर रूप से प्रचलित हैं।
मिलावट कब विकास है और कब क्षरण
भारती ने हिंदी में अंग्रेज़ी, उर्दू, स्थानीय बोलियों और इंटरनेट स्लैंग के बढ़ते समावेश को तब तक अनुचित नहीं माना, 'जब तक हिंदी की क्रियाएँ और कारक चिह्न नहीं बदलते।' उनके अनुसार जब ये बदलने लगेंगे, तभी भाषा-क्षरण की शुरुआत होगी। इससे पहले यह भाषा के विकास का मार्ग है।
'शुद्ध हिंदी' के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि तत्समनिष्ठ भाषा को ही शुद्ध हिंदी माना जाएगा। लेखन में यथासंभव शुद्धता बरती जानी चाहिए, किंतु बोलचाल में यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। उन्होंने मिश्रित भाषा में लिखी पुस्तकों और इंटरनेट सामग्री को भी स्वीकार्य बताया।
डिजिटल दौर में देवनागरी और हिंदी शिक्षा
भारती ने बताया कि डिजिटल युग में देवनागरी में लिखने का प्रचलन बढ़ा है और जिन्हें देवनागरी लिखनी नहीं आती, वे भी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) की सहायता से लिख रहे हैं। शिक्षा के संदर्भ में उन्होंने कहा कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में CBSE बोर्ड में 10वीं कक्षा तक हिंदी अनिवार्य रूप से पढ़ाई जानी चाहिए।
हालाँकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी भी क्षेत्र में हिंदी थोपने के विरुद्ध हैं। उनका मानना है कि अन्य राज्यों को भी हिंदी की जानकारी होनी चाहिए, लेकिन यह जागरूकता स्वैच्छिक होनी चाहिए, न कि बाध्यकारी।
सोशल मीडिया, साहित्य और हिंदी का लोकतांत्रिकरण
सोशल मीडिया पर हिंदी के विस्तार पर भारती ने कहा, 'भाषा का विस्तार तभी होता है, जब उसका लोकतांत्रिकरण होगा, तभी नए शब्द जुड़ेंगे।' उनके अनुसार अत्यधिक कठिन भाषा से बचना ज़रूरी है। अब समाज के लोग स्वयं 'सही हिंदी' का निर्धारण कर रहे हैं और भाषा किसी एक संस्था के नियंत्रण में नहीं रही।
साहित्य में गालियों के प्रयोग पर उन्होंने कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से इसके समर्थक नहीं हैं, लेकिन समाज में इसका अस्तित्व है और यदि वास्तविक संवाद साहित्य में उतारना हो तो सड़कों पर बोली जाने वाली भाषा भी लिखनी पड़ती है। उन्होंने चेताया कि हिंदी लेखन में अंग्रेज़ी के अत्यधिक मिश्रण को रोकना वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है। आने वाले वर्षों में डिजिटल मंचों पर देवनागरी की बढ़ती उपस्थिति इस चुनौती से निपटने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।