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हिंदी दिवस पर अमित शाह का संदेश: हिंदी प्रतिस्पर्धी नहीं, राष्ट्रीय एकात्मता की कड़ी

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हिंदी दिवस पर अमित शाह का संदेश: हिंदी प्रतिस्पर्धी नहीं, राष्ट्रीय एकात्मता की कड़ी

सारांश

हिंदी दिवस पर गृह मंत्री अमित शाह का संदेश सिर्फ शुभकामना नहीं था — यह भाषाई राजनीति की एक सुविचारित पुनर्स्थापना थी। हिंदी को 'प्रतिस्पर्धी नहीं, संवाद की कड़ी' कहकर शाह ने उस पुरानी बहस को शांत करने की कोशिश की, जो अक्सर हिंदी बनाम क्षेत्रीय भाषाओं के रूप में सुर्खियाँ बनती है।

मुख्य बातें

गृह मंत्री अमित शाह ने 14 सितंबर 2026 को हिंदी दिवस पर देशवासियों को शुभकामनाएँ दीं।
शाह ने कहा कि हिंदी किसी भाषा की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकात्मता की अहम कड़ी है।
स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के उदाहरणों से हिंदी के जन-संपर्क के महत्व को रेखांकित किया।
संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा घोषित किया था।
शाह ने स्वतंत्रता के बाद स्वभाषा को 'हाशिये पर धकेले जाने' का आरोप लगाया और नई शिक्षा नीति के तहत भारतीय भाषाओं में तकनीकी व चिकित्सा शिक्षा को सकारात्मक कदम बताया।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने 14 सितंबर 2026 को हिंदी दिवस के अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएँ देते हुए स्पष्ट किया कि हिंदी किसी भी भारतीय भाषा की प्रतिस्पर्धी नहीं है, बल्कि यह देश की विभिन्न भाषाओं के बीच आत्मीय संवाद और राष्ट्रीय एकात्मता की एक अहम कड़ी है। उन्होंने कहा कि भाषाई विविधता भारत की सबसे बड़ी ताकत है और इसी विविधता में एकता की भावना देश को अद्वितीय बनाती है।

हिंदी और भारतीय भाषाओं का संबंध

शाह ने अपने संदेश में कहा, 'भारत भाषाई विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि की अनुपम भूमि है।' उनके अनुसार, हर भाषा अपने साथ एक इतिहास, लोक परंपरा और जीवन-दृष्टि लेकर चलती है, जो नई पीढ़ी के संस्कारों को समृद्ध करती है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि किसी भी समाज की स्मृति और आत्मबोध होती है।

शाह ने कहा, 'हिंदी का विकास तभी सार्थक है, जब वह सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान, संरक्षण और संवर्धन के साथ आगे बढ़े।' यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में हिंदी थोपे जाने की आशंका को लेकर समय-समय पर बहस छिड़ती रही है।

ऐतिहासिक उदाहरणों से दिया संदेश

गृह मंत्री ने हिंदी के महत्व को स्थापित करने के लिए ऐतिहासिक महापुरुषों के उदाहरण दिए। उन्होंने बताया कि स्वामी दयानंद सरस्वती की मातृभाषा गुजराती थी, फिर भी उन्होंने 'सत्यार्थ प्रकाश' हिंदी में लिखा। महात्मा गांधी ने 1918 में मद्रास में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की। इसी क्रम में उन्होंने यह भी याद दिलाया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस बांग्लाभाषी थे, लेकिन उन्होंने आजाद हिंद फौज की संपर्क भाषा हिंदी को बनाया और देश को 'जय हिंद' का नारा दिया।

शाह ने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनकी अपनी मातृभाषा भी गुजराती है, लेकिन देश के किसी भी कोने में जाने पर हिंदी ही उन्हें आम जनता से सीधा जोड़ती है।

साहित्यिक विरासत और स्वतंत्रता आंदोलन

शाह ने हिंदी की साहित्यिक यात्रा का भी उल्लेख किया। उन्होंने आदिकाल में विद्यापति की 'पदावली' और पृथ्वीराज रासो की वीरगाथाओं से लेकर भक्तिकाल तक की चर्चा की, जब तुलसीदास ने रामकथा को घर-घर पहुँचाया और सूरदास ने वात्सल्य को स्वर दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वराज, स्वदेशी और स्वभाषा के विचारों ने राष्ट्रीय चेतना को नई ऊर्जा दी।

इसी क्रम में उन्होंने यह भी याद दिलाया कि संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था, जिसकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष हिंदी दिवस मनाया जाता है।

स्वतंत्रता के बाद की विडंबना और वर्तमान प्रयास

शाह ने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता के बाद स्वभाषा, स्वसंस्कृति और स्वाभिमान के विषयों को हाशिये पर धकेल दिया गया। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले से इस 'गुलामी की मानसिकता' से मुक्ति का आह्वान किया। उन्होंने राजपथ का नाम कर्तव्य पथ किए जाने और अंग्रेजों के दंड आधारित कानूनों की जगह तीन नए जन-केंद्रित कानून बनाए जाने का उल्लेख किया।

शाह ने नई शिक्षा नीति की सराहना करते हुए कहा कि आज इंजीनियरिंग और चिकित्सा की पढ़ाई भारतीय भाषाओं में हो रही है और प्रतियोगी परीक्षाएँ भी अनेक भारतीय भाषाओं में आयोजित की जा रही हैं। भाषाई समावेश की दिशा में यह एक ठोस कदम माना जा रहा है।

आगे की राह

हिंदी दिवस पर शाह का यह संदेश उस व्यापक बहस के बीच आया है जिसमें हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संतुलन को लेकर राजनीतिक मतभेद बने रहते हैं। गौरतलब है कि केंद्र सरकार की भाषा नीति को समय-समय पर कुछ दक्षिणी राज्यों की आपत्तियों का सामना करना पड़ा है। यदि सरकार की भाषाई समावेशिता की नीति व्यवहार में उतरती है, तो यह भारत की बहुभाषिक पहचान को और सुदृढ़ कर सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

विशेषकर तमिलनाडु, केंद्र की भाषा नीति को लेकर सशंकित रहते हैं। 'प्रतिस्पर्धी नहीं' वाला मंत्र एक राजनीतिक चतुराई है — लेकिन असली कसौटी नीति क्रियान्वयन है, न शब्द। नई शिक्षा नीति के तहत भारतीय भाषाओं में तकनीकी शिक्षा की शुरुआत एक ठोस कदम है, किंतु अभी यह प्रयोग सीमित संस्थानों तक ही सिमटा है। जब तक संघीय ढाँचे में सभी भाषाओं को समान प्रशासनिक प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, 'एकात्मता की कड़ी' का विचार राजनीतिक भाषण से आगे नहीं बढ़ पाएगा।
RashtraPress
14 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिंदी दिवस 14 सितंबर को क्यों मनाया जाता है?
14 सितंबर को हिंदी दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि संविधान सभा ने इसी दिन 1949 में हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इस ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में प्रत्येक वर्ष यह दिवस मनाया जाता है।
अमित शाह ने हिंदी दिवस 2026 पर क्या कहा?
गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि हिंदी किसी भाषा की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं के बीच आत्मीय संवाद और राष्ट्रीय एकात्मता की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी का विकास तभी सार्थक है जब वह सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान और संरक्षण के साथ आगे बढ़े।
शाह ने किन महापुरुषों का उदाहरण दिया?
शाह ने स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस का उदाहरण दिया — जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी, फिर भी उन्होंने हिंदी को जनसंवाद और राष्ट्रीय एकता का माध्यम बनाया। गांधी ने 1918 में मद्रास में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की और बोस ने आजाद हिंद फौज की संपर्क भाषा हिंदी को बनाया।
नई शिक्षा नीति और भारतीय भाषाओं का क्या संबंध है?
शाह के अनुसार, नई शिक्षा नीति मातृभाषा को शिक्षा के केंद्र में रखती है। इसके तहत इंजीनियरिंग और चिकित्सा की पढ़ाई भारतीय भाषाओं में शुरू की गई है और प्रतियोगी परीक्षाएँ भी अनेक भारतीय भाषाओं में आयोजित हो रही हैं।
क्या हिंदी को अन्य भाषाओं पर थोपा जा रहा है?
शाह ने स्पष्ट किया कि हिंदी किसी भी भाषा की प्रतिस्पर्धी नहीं है और इसका विकास सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान के साथ होना चाहिए। हालाँकि, दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में केंद्र की भाषा नीति को लेकर आशंकाएँ समय-समय पर व्यक्त होती रही हैं।
राष्ट्र प्रेस
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