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हिंदी दिवस 2026: 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को बनाया राजभाषा, जानें पूरा इतिहास

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हिंदी दिवस 2026: 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को बनाया राजभाषा, जानें पूरा इतिहास

सारांश

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा घोषित किया — यह निर्णय तीन वर्षों की गहन बहस का परिणाम था। 1953 से इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज भी यह तारीख भारत की भाषाई विविधता में एकता की सबसे बड़ी संवैधानिक मिसाल है।

मुख्य बातें

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया।
यह निर्णय 12 सितंबर से 14 सितंबर 1949 तक चले तीन दिवसीय निर्णायक विचार-विमर्श के बाद आया, जो करीब तीन वर्षों की बहस की परिणति थी।
संविधान के अनुच्छेद 343 (भाग 17) में राजभाषा प्रावधान हैं; हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' नहीं, केवल 'राजभाषा' का दर्जा प्राप्त है।
राजभाषा घोषणा के साथ ही अंग्रेज़ी को संक्रमणकालीन व्यवस्था के तहत सरकारी कामकाज में बनाए रखा गया, जिसे बाद में संसद ने कानून के ज़रिए विस्तार दिया।
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के सुझाव पर 1953 से 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई।

14 सितंबर को प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला हिंदी दिवस उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है जब 1949 में इसी तारीख को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। यह निर्णय तीन वर्षों की गहन बहस और भाषाई विविधता की जटिल चुनौतियों से गुज़रने के बाद आया था।

स्वतंत्रता के बाद भाषा की चुनौती

1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद नवजात भारत के सामने केवल शासन व्यवस्था और संविधान निर्माण की चुनौती नहीं थी। एक और बड़ा प्रश्न था — संघ के सरकारी कामकाज में किस भाषा का उपयोग हो? भारत सैकड़ों भाषाओं और बोलियों की धरती है, इसलिए किसी एक भाषा को आधिकारिक दर्जा देना राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील मामला था।

यह सवाल सिर्फ भाषाई नहीं, बल्कि क्षेत्रीय अस्मिताओं और भावनाओं से भी जुड़ा था। विभिन्न राज्यों और समुदायों की अपनी-अपनी भाषाई पहचान थी, जिसका सम्मान करते हुए राष्ट्रीय एकता बनाए रखना एक नाज़ुक संतुलन की माँग करता था।

संविधान सभा में तीन वर्षों की ऐतिहासिक बहस

संविधान सभा में भाषा के मुद्दे पर करीब तीन वर्षों तक विस्तृत और गंभीर विचार-विमर्श चला। अलग-अलग पहलुओं — भाषाई प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय भावनाएँ, प्रशासनिक व्यावहारिकता और राष्ट्रीय एकता — पर चर्चाएँ होती रहीं।

निर्णायक दौर 12 सितंबर 1949 से 14 सितंबर 1949 के बीच आया, जब संविधान सभा ने इस विषय पर अंतिम और व्यापक विमर्श किया। 14 सितंबर 1949 को सभा ने सर्वसम्मति से हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया।

अंग्रेज़ी का संक्रमणकालीन प्रावधान

राजभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार करते समय यह भी स्पष्ट किया गया कि अंग्रेज़ी का सरकारी कामकाज में उपयोग तत्काल पूर्णतः समाप्त नहीं किया जाएगा। एक संक्रमणकालीन व्यवस्था के तहत अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक प्रयोजनों के लिए जारी रखा गया। बाद में संसद ने कानून बनाकर अंग्रेज़ी के उपयोग से जुड़े प्रावधानों को आगे बढ़ाया।

राजभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर

गौरतलब है कि आम बोलचाल में हिंदी को प्रायः 'राष्ट्रभाषा' कहा जाता है, लेकिन संवैधानिक दृष्टि से यह सटीक नहीं है। भारतीय संविधान में हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' नहीं, बल्कि 'संघ की राजभाषा' कहा गया है। संविधान के भाग 17 में इससे संबंधित प्रावधान हैं और अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी होगी तथा उसकी लिपि देवनागरी होगी।

यह अंतर महत्त्वपूर्ण है — राजभाषा का अर्थ है सरकारी कामकाज की भाषा, जबकि राष्ट्रभाषा की अवधारणा व्यापक सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान से जुड़ी होती है। भारत के संविधान में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है।

हिंदी दिवस की शुरुआत कैसे हुई

14 सितंबर 1949 के ऐतिहासिक निर्णय को जीवित रखने और हिंदी के प्रचार-प्रसार को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के सुझाव पर 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने की परंपरा आरंभ हुई। यह दिन न केवल एक भाषाई उपलब्धि का स्मरण है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता में एकता की भावना का भी प्रतीक है।

सात दशकों से अधिक समय बाद भी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच संतुलन बनाने की बहस जारी है, जो दर्शाती है कि 14 सितंबर 1949 का वह निर्णय कितना दूरगामी और जटिल था।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 1949 का वह निर्णय किस तरह की राजनीतिक और सांस्कृतिक कसरत के बाद आया था। आज भी हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' कहने की गलतफहमी व्यापक रूप से प्रचलित है, जो दर्शाती है कि संविधान की मूल भावना और लोकप्रिय समझ के बीच एक बड़ी खाई है। दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी थोपने को लेकर समय-समय पर उठने वाले विवाद इस बात की याद दिलाते हैं कि 1949 का वह संतुलन आज भी नाज़ुक है। भाषा नीति पर एक राष्ट्रीय सहमति बनाए बिना, हिंदी दिवस महज़ एक सरकारी अनुष्ठान बनकर रह जाता है।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिंदी दिवस 14 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है?
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसी ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के सुझाव पर 1953 से 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।
हिंदी राजभाषा और राष्ट्रभाषा में क्या अंतर है?
भारतीय संविधान में हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' नहीं, बल्कि 'संघ की राजभाषा' कहा गया है। राजभाषा का अर्थ है सरकारी और संसदीय कामकाज की आधिकारिक भाषा, जबकि संविधान ने किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया है।
संविधान में हिंदी राजभाषा का प्रावधान किस अनुच्छेद में है?
संविधान के भाग 17 में राजभाषा से जुड़े प्रावधान हैं। अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी होगी और उसकी लिपि देवनागरी होगी।
हिंदी को राजभाषा बनाने में इतना समय क्यों लगा?
भारत भाषाई विविधता वाला देश है और संविधान सभा में यह सुनिश्चित करना था कि विभिन्न क्षेत्रों की भाषाई अस्मिताओं का सम्मान हो। इसलिए इस विषय पर करीब तीन वर्षों तक गहन बहस चली, जो 12-14 सितंबर 1949 के निर्णायक विमर्श के बाद समाप्त हुई।
हिंदी राजभाषा बनने के बाद अंग्रेज़ी का क्या हुआ?
1949 के निर्णय के समय यह तय किया गया था कि अंग्रेज़ी को सरकारी कामकाज से तत्काल नहीं हटाया जाएगा। एक संक्रमणकालीन व्यवस्था के तहत अंग्रेज़ी का उपयोग जारी रखा गया और बाद में संसद ने कानून के माध्यम से इस व्यवस्था को आगे बढ़ाया।
राष्ट्र प्रेस
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