क्या अमेरिकी प्रतिनिधियों ने व्यापारिक तनाव को दरकिनार करते हुए भारत के साथ दीर्घकालिक संबंधों पर जोर दिया?
सारांश
Key Takeaways
- भारत और अमेरिका के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी
- छोटे व्यापारिक विवाद अस्थायी हैं
- अमेरिकी कंपनियों का भारत में बड़ा निवेश
- कृषि मुद्दा संवेदनशील लेकिन संभावनाओं से भरा
- दंडात्मक शुल्कों का विरोध
वाशिंगटन, १३ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों ने यह स्वीकार किया है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक मुद्दों पर कुछ मतभेद उत्पन्न हुए हैं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इन छोटे विवादों के बावजूद दोनों देशों के संबंध दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी पर आधारित हैं। उनका कहना है कि शुल्क, वीजा और बाजार तक पहुँच जैसे मुद्दे अस्थायी हैं।
सीएसआईएस के एक कार्यक्रम में बोलते हुए, रिप्रेजेंटेटिव अमी बेरा ने कहा कि कभी-कभी तनाव होता है, लेकिन भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा मजबूत है। उन्होंने बताया कि कारोबारी वर्ग दीर्घकालिक दृष्टिकोण से काम करता है और परिस्थितियों को अच्छी तरह समझता है।
अमी बेरा ने भारत यात्रा के दौरान एक घटना को याद करते हुए कहा कि उस समय वीजा और शुल्क को लेकर कई समस्याएं थीं। एच-वन-बी वीजा और उच्च शुल्क जैसे मुद्दों से तनाव बढ़ा था, लेकिन इसके बावजूद सच्चाई यह है कि दोनों पक्ष बड़ी तस्वीर को समझते हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिकी कंपनियां निवेश के लिए भारत को प्राथमिकता देती हैं। उनका कहना था कि अमेरिका की बड़ी कंपनियां अरबों डॉलर का निवेश भारत में कर रही हैं, न कि किसी अन्य पड़ोसी देश में।
वहीं, प्रतिनिधि रिच मैककॉर्मिक ने कहा कि आर्थिक मतभेदों को केवल झगड़े के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि एक व्यापक रणनीतिक दृष्टि से समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि संतुलन जरूरी है, लेकिन हर मामले में पूर्ण समानता संभव नहीं होती, जैसे विवाह में भी नहीं होती।
रिच मैककॉर्मिक ने बताया कि वे व्यापार के समर्थक हैं और दंडात्मक शुल्कों के खिलाफ हैं। उनके अनुसार, ज्यादा शुल्क पूंजी के विकास में रुकावट डालते हैं। उन्होंने कहा कि खुले व्यापार से समाज को अंततः लाभ होता है। जब व्यापार अच्छा होता है, तो लोगों की जिंदगी बेहतर होती है और विकास के अवसर बढ़ते हैं।
कृषि के मुद्दे पर भी दोनों सांसदों ने चर्चा की, जो भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं में हमेशा एक संवेदनशील विषय रहा है। मैककॉर्मिक ने कहा कि भारत जैसी बड़ी जनसंख्या वाला देश कृषि में आत्मनिर्भर है, जो अपने आप में एक बड़ी बात है, हालांकि कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में अभी संभावनाएं हैं।
अमी बेरा ने कहा कि भारत में कृषि से जुड़े निर्णय लेना आसान नहीं है, क्योंकि अनेक छोटे किसान जुड़े होते हैं और नीतियों को लेकर विरोध होता रहा है। मैककॉर्मिक ने यह भी कहा कि भारत की बड़ी जनसंख्या और विकास की गति उसे दीर्घकालिक लाभ देती है। उन्होंने कहा, "भारत दुनिया के केवल दो स्थानों में से एक है, जहाँ जनसंख्या अभी भी बढ़ रही है।"
उन्होंने भारत की तकनीकी क्षमता का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत ने बहुत कम लागत में चंद्रमा के उस हिस्से पर अंतरिक्ष यान भेजा, जहाँ पहले कोई नहीं गया था। यह भारत की कुशल तकनीक को दर्शाता है।
अमी बेरा ने कहा कि कूटनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यापार और निवेश के आंकड़े लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि आर्थिक सहयोग जारी है। उन्होंने कहा, "आप अभी भी व्यापार और निवेश पर उच्च-आवृत्ति डेटा देख सकते हैं, जो अभी भी वास्तविक वृद्धि दिखा रहा है।"
अमेरिकी सांसदों ने यह भी स्वीकार किया कि भारत की अपनी घरेलू आवश्यकताएँ और सीमाएँ हैं, विशेष रूप से ऊर्जा के संदर्भ में। रिच मैककॉर्मिक ने कहा कि सस्ता रूसी तेल खरीदना भारत के लिए एक आर्थिक आवश्यकता है ताकि देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया जा सके। उन्होंने कहा, "वह यह अपने देश के सर्वश्रेष्ठ हित के लिए कर रहे हैं ताकि सस्ती ऊर्जा से अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ा सकें।"
दोनों सांसदों ने स्पष्ट किया कि तमाम मतभेदों के बावजूद भारत और अमेरिका के बीच सहयोग का आधार बहुत मजबूत है। उनका मानना है कि दोनों देश तात्कालिक लाभ नहीं, बल्कि दीर्घकालिक साझेदारी पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।