होर्मुज संकट: वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव
सारांश
Key Takeaways
- होर्मुज स्ट्रेट से 20 प्रतिशत वैश्विक तेल की आपूर्ति होती है।
- ईरान और अमेरिका का संघर्ष ऊर्जा बाज़ार पर असर डाल रहा है।
- भारत ने ईरान से तेल आयात फिर से शुरू किया है।
- ऊर्जा की कीमतें बढ़ने की संभावना है।
- सप्लाई में रुकावट कृषि और उद्योग को प्रभावित कर रही है।
वाशिंगटन, 5 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है। ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष के कारण होर्मुज के मार्ग से ऊर्जा बाजार की आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो गई है।
द वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, ईरान युद्ध का वैश्विक ऊर्जा प्रवाह पर प्रभाव डाल रहा है, जिससे विभिन्न महाद्वीपों में तेल, गैस और आवश्यक आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट आ रही है।
लगभग 20 प्रतिशत वैश्विक तेल होर्मुज स्ट्रेट के माध्यम से ही गुजरता है। अमेरिका और ईरान के बीच का यह संघर्ष अब संकट का नया केंद्र बन चुका है। ईरान ने अमेरिका-इजरायली हमलों के प्रतिरोध में समुद्री यातायात पर रोक लगा दी है। इस रुकावट का प्रभाव पहले ही वैश्विक बाजार में नजर आ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा की कीमतें बढ़ रही हैं, आपूर्ति श्रृंखला में तंगी आ रही है, और सरकारें दीर्घकालिक कमी के लिए तैयारी कर रही हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि संघर्ष जारी रहा, तो इसका अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
भारत, जो ऊर्जा निर्यात पर अत्यधिक निर्भर है, ने आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए त्वरित कदम उठाए हैं।
अमेरिकी मीडिया सीएनएन के अनुसार, भारत ने कई वर्षों के बाद ईरान से तेल खरीदना शुरू किया है। अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते ईरानी कच्चे तेल से दूरी बनाए रखने के बाद, भारत ने अब फिर से ईरान से तेल आयात को शुरू किया है, जिसे एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भारत ने ईरान से 44,000 मीट्रिक टन लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) भी आयात किया है, जिसकी शिपमेंट मैंगलोर पोर्ट पर पहुँच गई है।
द वाशिंगटन पोस्ट के आकलन के अनुसार, यदि यह रुकावट तीन महीने तक जारी रहती है, तो तेल की कीमतें प्रति बैरल 170 डॉलर तक बढ़ सकती हैं, जबकि छह महीने का लंबा संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर ले जा सकता है।
आपूर्ति में रुकावट केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। इस रुकावट का असर फर्टिलाइज़र, पेट्रोकेमिकल्स और औद्योगिक इनपुट पर भी पड़ा है, जिसकी कमी पहले से ही एशिया में देखी जा रही है और यह आने वाले हफ्तों में यूरोप और अमेरिका तक फैल सकती है।
द वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, भारत और चीन जैसे देशों में पेट्रोकेमिकल संयंत्रों को प्लास्टिक, वस्त्र और उपभोक्ता सामान बनाने में उपयोग होने वाले कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ रहा है। यह संघर्ष खेती के लिए भी खतरा उत्पन्न कर रहा है।
इस वजह से, कई देशों ने ईंधन की राशनिंग और बचत के उपाय अपनाना शुरू किया है, जबकि अन्य देश प्रभाव को कम करने के लिए वैकल्पिक आपूर्ति के मार्ग और आपातकालीन रिजर्व खोजने में लगे हैं।