बांग्लादेश के ICT पर HRW का बड़ा सवाल: शेख हसीना मुकदमे में निष्पक्ष सुनवाई के मानक नहीं
सारांश
मुख्य बातें
प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) ने 29 जुलाई 2026 को बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि यह अदालत अंतरराष्ट्रीय कानूनी मानकों पर खरी नहीं उतर रही। संगठन ने चेतावनी दी है कि इन खामियों के चलते पीड़ितों को न्याय मिलने में बाधा आ सकती है, कानून के शासन को नुकसान पहुँच सकता है और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को गलत तरीके से जेल भेजा जा सकता है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब सोमवार, 27 जुलाई को ICT के अभियोजन पक्ष ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और 40 अन्य लोगों के खिलाफ मानवता के विरुद्ध अपराधों से जुड़े एक मामले में औपचारिक आरोप दाखिल किए। यह मामला 2013 में ढाका के शापला चत्तर में हुई हिफाजत-ए-इस्लाम रैली पर की गई कार्रवाई से संबंधित है।
मुख्य आरोप और चिंताएँ
HRW की उप एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, 'शेख हसीना सरकार के दौरान हुए कई कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। लेकिन कई मामलों में मुकदमे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निष्पक्ष सुनवाई के मानकों पर खरे नहीं उतर रहे। बांग्लादेश को अपने आपराधिक न्याय तंत्र में तुरंत सुधार करने की जरूरत है। नई सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खराब जांच और मनमाने आरोपों के जरिए राजनीतिक बदले की भावना को बढ़ावा न मिले।'
संगठन के अनुसार, ट्रिब्यूनल से जुड़ा कानून अभियोजकों को पर्याप्त साक्ष्य की प्रारंभिक सीमा पूरी किए बिना ही किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की माँग करने की अनुमति देता है। इसके अलावा, आरोपियों को कई महीनों तक हिरासत में रखा जा सकता है और किसी अलग अदालत में अंतरिम अपील का अधिकार भी नहीं दिया जाता।
प्रक्रियागत खामियाँ
HRW ने विस्तार से बताया कि अभियोजन पक्ष द्वारा साक्ष्य साझा किए जाने के मात्र तीन सप्ताह बाद ही मुकदमे की सुनवाई शुरू हो सकती है, जिससे बचाव पक्ष को तैयारी के लिए अत्यंत कम समय मिलता है। संगठन ने यह भी कहा कि अनुपस्थिति में चलने वाले मुकदमों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं — जैसे कि आरोपी को अपनी पसंद का वकील चुनने का अधिकार। इसके साथ ही, ट्रिब्यूनल बचाव पक्ष के वकीलों की गवाहों से जिरह करने की क्षमता को भी सीमित करता है।
गौरतलब है कि संगठन ने आरोप लगाया कि ट्रिब्यूनल के अभियोजक और न्यायाधीश ऐसे बयानों पर भरोसा कर रहे हैं जिनके कई हिस्से अलग-अलग गवाहों के बयानों में हूबहू दोहराए गए हैं — जो इन बयानों की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ट्रिब्यूनल की पृष्ठभूमि
यह ट्रिब्यूनल मूल रूप से मार्च 2010 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली आवामी लीग सरकार ने स्थापित किया था, ताकि 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना का साथ देने वाले लोगों पर मुकदमा चलाया जा सके। 2024 में जब विरोध प्रदर्शनों के बाद आवामी लीग सरकार सत्ता से बाहर हो गई, तो मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने ट्रिब्यूनल कानून में संशोधन किए और अपराधों की परिभाषा में बदलाव किए।
हालांकि, HRW के अनुसार, ये संशोधन भी उचित कानूनी प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय अदालतों जैसी प्रक्रियागत सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। उल्लेखनीय है कि फरवरी 2026 में सत्ता में आई बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार ने भी उन संशोधनों में कोई बदलाव नहीं किया है।
आरोपों का दायरा
27 जुलाई 2026 को अभियोजकों ने दो पत्रकारों सहित कुल 41 लोगों के खिलाफ ट्रिब्यूनल में आरोप दाखिल किए, जिनमें मानवता के विरुद्ध अपराध और नरसंहार के आरोप शामिल हैं। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समुदाय में बांग्लादेश की न्यायिक प्रक्रिया को लेकर चिंताओं को और गहरा कर दिया है।
यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि बांग्लादेश सरकार HRW की इन सिफारिशों पर क्या रुख अपनाती है और क्या आने वाले महीनों में ट्रिब्यूनल की प्रक्रियाओं में कोई सुधार किया जाता है।