13 अक्टूबर 2026
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संयुक्त राष्ट्र में भारत की माँग: आतंकवाद को 'मानवता के विरुद्ध अपराध' की संधि में शामिल करें

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संयुक्त राष्ट्र में भारत की माँग: आतंकवाद को 'मानवता के विरुद्ध अपराध' की संधि में शामिल करें

सारांश

संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली की छठी कमेटी में भारत ने दो-टूक कहा — 2028 की प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय संधि में आतंकवाद को 'मानवता के विरुद्ध अपराध' माना जाए। यह भारत की उस रणनीतिक कोशिश का हिस्सा है जो आतंकवाद को वैश्विक कानूनी ढाँचे में पूरी तरह से जवाबदेह बनाना चाहती है।

मुख्य बातें

मैथिली ने 13 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली की छठी कमेटी में भारत का पक्ष रखा।
भारत की माँग है कि 2028 की प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय संधि में आतंकवाद को 'मानवता के विरुद्ध अपराध' के दायरे में शामिल किया जाए।
भारत ने राष्ट्रीय न्यायालयों को अधिकार-क्षेत्र में प्राथमिकता देने और देशों की संप्रभुता के सम्मान पर जोर दिया।
संधि का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया जारी है; जनवरी 2026 में पहला तैयारी-सम्मेलन हो चुका है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इस संधि का लक्ष्य मानवता के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता अपनाना है।

संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली की छठी कमेटी की बैठक में भारत ने 13 अक्टूबर 2026 को यह स्पष्ट रुख अपनाया कि 2028 में प्रस्तावित 'मानवता के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम और सजा' संधि में आतंकवाद को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिए। भारत के इस कदम को वैश्विक आतंकवाद-विरोधी कानूनी ढाँचे को मजबूत करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण राजनयिक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

भारत का मुख्य पक्ष

भारत के संयुक्त राष्ट्र मिशन की काउंसलर आर. मैथिली ने सोमवार को कहा, 'आतंकवादियों द्वारा किए गए अपराध और अत्याचार, अगर वे जरूरी पैमानों पर खरे उतरते हैं, तो उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध के दायरे में उचित रूप से शामिल किया जाना चाहिए।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आतंकवादी गतिविधियों की 'गंभीर प्रकृति' और आम लोगों पर उनके विनाशकारी प्रभाव को देखते हुए इस मुद्दे पर संधि के मसौदे के समग्र नज़रिए से विचार किया जाए — केवल मौजूदा कानूनी व्यवस्थाओं को नई संधि में जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा।

राष्ट्रीय जिम्मेदारी और संप्रभुता पर जोर

मैथिली ने इस बात पर बल दिया कि मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन और बड़े पैमाने पर होने वाले अत्याचारों के मामलों में न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित करना हर देश की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित संधि को यह सिद्धांत और भी मजबूत करना चाहिए कि इन अपराधों से नागरिकों की सुरक्षा की मुख्य जिम्मेदारी संबंधित राष्ट्र की है। साथ ही, भारत ने यह भी रेखांकित किया कि इस पूरी प्रक्रिया में देशों की संप्रभुता और उनके आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप के सिद्धांत का पूरा सम्मान होना चाहिए।

अधिकार-क्षेत्र और पीड़ितों के हित

भारतीय प्रतिनिधि ने यह भी कहा कि न्याय के हितों, आरोपी के अधिकारों और पीड़ितों के हितों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय न्यायालयों को अधिकार-क्षेत्र में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह रुख अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) जैसी संस्थाओं की भूमिका के संदर्भ में भारत की परंपरागत नीति के अनुरूप है, जहाँ वह राष्ट्रीय न्यायपालिका की प्राथमिकता का पक्षधर रहा है।

सम्मेलन की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली ने 2024 में एक प्रस्ताव के माध्यम से 2028 में मानवता के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम और सजा पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने का आह्वान किया था। इस सम्मेलन की तैयारी के लिए दो प्रारंभिक बैठकें निर्धारित हैं, जिनमें से पहली जनवरी 2026 में कन्वेंशन पर वार्ता और मसौदा तैयार करने के लिए आयोजित हुई थी। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस सम्मेलन का उद्देश्य मानवता के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम और दंड के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता अपनाना है।

व्यापक संदर्भ और आगे की राह

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के नए स्वरूप — साइबर आतंकवाद, राज्य-प्रायोजित आतंकवाद और सीमापार आतंकवाद — को लेकर अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचे की सीमाओं पर बहस तेज हो रही है। भारत की यह माँग उसकी उस दीर्घकालिक नीति का हिस्सा है, जिसमें वह आतंकवाद को 'अच्छे' और 'बुरे' में वर्गीकृत करने की प्रवृत्ति का विरोध करता रहा है। 2028 के सम्मेलन से पहले इस संधि का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया जारी रहेगी, और भारत की यह दलील उस मसौदे को प्रभावित कर सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके रास्ते में एक पुरानी चुनौती है — 'आतंकवाद की परिभाषा' पर संयुक्त राष्ट्र में आज भी सर्वसम्मति नहीं बन पाई है, और कई देश इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील मानते हैं। 2028 की संधि का मसौदा तैयार करते वक्त यह विभाजन और गहरा हो सकता है। भारत अपनी संप्रभुता और अहस्तक्षेप की माँग के साथ-साथ आतंकवाद पर वैश्विक जवाबदेही चाहता है — यह एक नाजुक संतुलन है जो हर देश के लिए मुश्किल है। असली परीक्षण यह है कि क्या भारत अपने सहयोगियों को इस प्रस्ताव के पीछे लामबंद कर पाता है, या यह सिर्फ एक नैतिक बयान बनकर रह जाता है।
RashtraPress
13 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संयुक्त राष्ट्र में भारत ने आतंकवाद पर क्या माँग रखी?
भारत ने 13 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली की छठी कमेटी में माँग की कि 2028 में प्रस्तावित 'मानवता के विरुद्ध अपराधों' की अंतरराष्ट्रीय संधि में आतंकवाद को भी शामिल किया जाए। भारत का तर्क है कि आतंकवादी अपराध जरूरी पैमानों पर खरे उतरने पर मानवता के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में आने चाहिए।
2028 की मानवता विरुद्ध अपराध संधि क्या है?
यह संयुक्त राष्ट्र के 2024 के प्रस्ताव के तहत 2028 में आयोजित होने वाला एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है, जिसमें मानवता के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम और दंड के लिए एक कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता अपनाया जाना है। इसकी तैयारी के लिए दो प्रारंभिक सम्मेलन निर्धारित हैं, जिनमें से पहला जनवरी 2026 में हो चुका है।
भारत ने राष्ट्रीय संप्रभुता पर क्या रुख अपनाया?
भारत ने स्पष्ट किया कि मानवता के विरुद्ध अपराधों से निपटने के उपायों में देशों की संप्रभुता और उनके आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप के सिद्धांत का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए। साथ ही, भारत ने राष्ट्रीय न्यायालयों को अधिकार-क्षेत्र में प्राथमिकता देने की वकालत की।
भारत ने इस संधि के मसौदे पर क्या सुझाव दिया?
भारत ने कहा कि संधि के मसौदे में आतंकवाद को उसकी 'गंभीर प्रकृति' और लोगों पर असर के आधार पर समग्र नज़रिए से शामिल किया जाए, न कि केवल मौजूदा कानूनी व्यवस्थाओं को नई संधि में जोड़कर काम चलाया जाए। न्याय के हितों, आरोपी के अधिकारों और पीड़ितों के हितों — तीनों को ध्यान में रखा जाए।
इस मुद्दे पर भारत का यह रुख क्यों महत्त्वपूर्ण है?
भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ कठोर वैश्विक कानूनी ढाँचे की माँग करता रहा है। 2028 की संधि एक ऐतिहासिक अवसर है जब इस माँग को कानूनी बाध्यता मिल सकती है, इसलिए भारत की यह दलील संधि के अंतिम स्वरूप को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
राष्ट्र प्रेस
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