UN मानवाधिकार परिषद में भारत का कड़ा संदेश: आतंकवाद पर 'शून्य सहिष्णुता' और निरंतर निगरानी की माँग
सारांश
मुख्य बातें
भारत ने 31 अक्टूबर 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बहस के दौरान स्पष्ट रूप से कहा कि आतंकवाद मानवाधिकारों — और विशेषतः जीवन के अधिकार — के लिए आज भी सबसे गंभीर खतरों में से एक है। भारत ने मानवाधिकार परिषद से आग्रह किया कि वह 'शून्य सहिष्णुता' के सिद्धांत पर इस खतरे पर निरंतर ध्यान बनाए रखे।
भारत का मुख्य पक्ष
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने महासभा में मानवाधिकार परिषद की वार्षिक रिपोर्ट पर आयोजित बहस में देश का पक्ष रखा। उन्होंने कहा, "आतंकवाद मानवाधिकारों — और सबसे बढ़कर, जीवन के अधिकार — का आनंद लेने के रास्ते में सबसे गंभीर खतरों में से एक बना हुआ है।"
मंगलानंदन ने यह भी रेखांकित किया कि जिनेवा स्थित मानवाधिकार परिषद ने जुलाई 2026 में एक प्रस्ताव अपनाया था, जिसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आतंकवाद को रोकने और उससे निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया गया था। भारत ने परिषद को प्रोत्साहित किया कि वह इस दिशा में अपने प्रयास जारी रखे।
पाकिस्तान पर परोक्ष प्रहार
भारत के बयान में उन देशों की नीति की परोक्ष आलोचना भी की गई, जो आतंकवादी कृत्यों के बीच 'मनगढ़ंत अंतर' पैदा करने या उन्हें किसी न किसी आधार पर सही ठहराने की कोशिश करते हैं। यह सीधे तौर पर पाकिस्तान की उस कूटनीतिक रणनीति का संदर्भ था, जिस पर भारत लंबे समय से आपत्ति जताता रहा है।
मंगलानंदन ने स्पष्ट किया कि जुलाई का प्रस्ताव "इस बात पर फिर से जोर देता है कि आतंकवाद के सभी रूप और तरीके मानवाधिकारों, मौलिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र को नष्ट करने के उद्देश्य से किए जाते हैं।" यह कृत्य देशों की क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा के लिए सीधा खतरा हैं।
परिषद की विश्वसनीयता पर सवाल
भारत ने मानवाधिकारों के मुद्दे को 'हथियार' की तरह इस्तेमाल करने और दोहरे मापदंड अपनाने की परिषद की कुछ कोशिशों की आलोचना की। मंगलानंदन ने कहा, "मानवाधिकारों को बातचीत, क्षमता निर्माण और सच्ची साझेदारी के माध्यम से सबसे बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है, न कि राजनीतिकरण, चुनिंदा रवैये या दोहरे मापदंडों से।"
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि किसी देश की भागीदारी के बिना थोपे गए एकतरफा आदेश "जमीनी स्तर पर स्थिति में शायद ही कोई सुधार ला पाते हैं।" इसके विपरीत, ऐसे कदम परिषद के भीतर विभाजन को और गहरा करते हैं।
यूपीआर को सर्वश्रेष्ठ मंच बताया
भारत ने यूनिवर्सल पीरियोडिक रिव्यू (UPR) को मानवाधिकारों के लिए सबसे उपयुक्त मंच बताया। मंगलानंदन के अनुसार यह समीक्षा प्रक्रिया एकतरफा आलोचना के बजाय संबंधित देशों की अपनी रिपोर्टों, संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं और नागरिक समाज के इनपुट पर आधारित होती है, और सभी देशों के साथ समान व्यवहार करती है।
विकास के अधिकार की दो टूक पैरवी
मंगलानंदन ने उस संकीर्ण दृष्टिकोण की भी आलोचना की, जो मुख्यतः केवल राजनीतिक और नागरिक अधिकारों पर केंद्रित रहता है और आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक अधिकारों को नजरअंदाज करता है। उन्होंने कहा, "सभी मानवाधिकारों को समान आधार पर, निष्पक्ष और बराबर तरीके से देखा जाना चाहिए।"
उन्होंने विकासशील देशों की वास्तविकता को रेखांकित करते हुए कहा कि गरीबी, कर्ज और वित्त तथा तकनीक तक सीमित पहुँच, मानवाधिकारों के उपभोग में सबसे बड़ी और तत्काल बाधाएँ हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है, न कि दबाव या जबरदस्ती की।
गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद की परिभाषा और उसके वित्तपोषण को लेकर वैश्विक मंचों पर गहरे मतभेद बने हुए हैं। भारत की यह स्थिति स्पष्ट करती है कि नई दिल्ली इन बहसों में एक सक्रिय और दृढ़ आवाज़ बनी रहेगी।