संयुक्त राष्ट्र में भारत की दो-टूक: एकतरफा प्रतिबंध राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन, तत्काल समाप्ति हो
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र महासभा में 11 जुलाई को भारत ने एकतरफा आर्थिक पाबंदियों और प्रतिबंधों को तत्काल समाप्त करने की मांग करते हुए कहा कि ये उपाय न केवल प्रभावित देशों के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में बाधक हैं, बल्कि उनकी राष्ट्रीय संप्रभुता का सीधा उल्लंघन भी करते हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के काउंसलर एल्डोस मैथ्यू पुन्नूस ने यह बयान क्यूबा पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों पर महासभा की वार्षिक चर्चा के दौरान दिया।
भारत का मूल पक्ष
काउंसलर पुन्नूस ने कहा, 'दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत बहुपक्षवाद को अपनी मूल आस्था मानता है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि एकतरफा प्रतिबंध मानवाधिकारों की रक्षा में बाधा डालते हैं और विकास, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों पर प्रतिकूल असर डालते हैं। उन्होंने कहा, 'हम अन्य देशों के साथ मिलकर ऐसे प्रतिबंधों को समाप्त करने की मांग करते हैं, जो प्रभावित देशों की आबादी — विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों — के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं।'
पुन्नूस ने यह भी याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा पहले ही सभी देशों से आग्रह कर चुकी है कि वे ऐसे कानूनों और उपायों को न तो लागू करें और न ही बनाए रखें, जिनका सीमापार (एक्स्ट्राटेरिटोरियल) प्रभाव अन्य देशों की संप्रभुता को प्रभावित करता हो।
क्यूबा प्रतिबंध: वैश्विक बहुमत बनाम अमेरिकी नीति
यह चर्चा उस संदर्भ में हुई जिसमें वर्ष 1992 से प्रत्येक वर्ष महासभा क्यूबा पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने की माँग करने वाले प्रस्ताव पारित करती आई है। पुन्नूस ने कहा कि क्यूबा पर लगाए गए ये एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अमेरिका की जिम्मेदारियों के विपरीत हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इन प्रतिबंधों के बावजूद क्यूबा ने जरूरतमंद देशों में अपने चिकित्सा कर्मियों को भेजकर वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
गौरतलब है कि हाल के वर्षों में इन प्रतिबंधों में कभी ढील दी गई तो कभी इन्हें और कड़ा किया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'अधिकतम दबाव' की रणनीति अपनाते हुए क्यूबा के खिलाफ पाबंदियाँ और सख्त कर दी हैं।
अमेरिका का प्रतिपक्ष
इसी सप्ताह महासभा में बोलते हुए संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के स्थायी प्रतिनिधि माइक वाल्ट्ज ने किसी भी नाकेबंदी या रोक से इनकार किया। उन्होंने कहा, 'क्यूबा पर अमेरिका की ओर से कोई नाकेबंदी नहीं है। क्यूबा में असली प्रतिबंध तो वह गिलोटिन है, जिसे वहाँ की सरकार ने अपने ही लोगों के सिर पर लटका रखा है।' वाल्ट्ज ने यह भी कहा कि अमेरिका स्वयं क्यूबा को 10 करोड़ डॉलर की सहायता उपलब्ध करा रहा है और कैथोलिक चर्च के साथ मिलकर जरूरतमंद लोगों तक भोजन तथा दवाइयाँ पहुँचाने का काम कर रहा है।
भारत का व्यापक रुख और ट्रंप के रूस-तेल प्रतिबंध
यह ऐसे समय में आया है जब भारत खुद भी एकतरफा प्रतिबंधों के दबाव से अछूता नहीं रहा। राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में रूस से तेल खरीदने पर द्वितीयक प्रतिबंध लगाए थे, जिसका सामना भारत को भी करना पड़ा था। हालाँकि, अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रंप प्रशासन के उस प्रतिबंध को बाद में निरस्त कर दिया। भारत लगातार उन देशों के खिलाफ अपना पक्ष रखता आया है जो एकतरफा दबाव वाले आर्थिक उपाय अपनाते हैं। पुन्नूस ने स्मरण कराया कि 'साल दर साल, महासभा ने ऐसे कानूनों और नियमों को लागू करने से मना किया है जिनका असर दूसरे देशों पर पड़ता है।'
आगे की राह
महासभा में इस विषय पर वार्षिक मतदान की परंपरा जारी रहने की संभावना है। भारत की यह स्थिति वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के उस व्यापक आग्रह के अनुरूप है जिसमें बहुपक्षीय ढाँचे को एकतरफा दबाव की राजनीति से ऊपर रखने की माँग की जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को बाध्यकारी नहीं बनाया जाता, तब तक इस मुद्दे पर व्यावहारिक बदलाव सीमित ही रहेगा।