11 जुलाई 2026
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संयुक्त राष्ट्र में भारत की दो-टूक: एकतरफा प्रतिबंध राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन, तत्काल समाप्ति हो

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संयुक्त राष्ट्र में भारत की दो-टूक: एकतरफा प्रतिबंध राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन, तत्काल समाप्ति हो

सारांश

संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने एकतरफा प्रतिबंधों को संप्रभुता का उल्लंघन करार देते हुए उनकी समाप्ति की माँग की। यह बयान क्यूबा पर अमेरिकी पाबंदियों की वार्षिक चर्चा के दौरान आया — और भारत के उस व्यापक रुख की पुष्टि करता है जो ग्लोबल साउथ की आवाज़ को बुलंद करता है।

मुख्य बातें

11 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों को राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन बताया।
भारत के काउंसलर एल्डोस मैथ्यू पुन्नूस ने कहा कि ये प्रतिबंध महिलाओं और बच्चों सहित आम जनता के विकास, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य अधिकारों को नुकसान पहुँचाते हैं।
वर्ष 1992 से महासभा प्रतिवर्ष क्यूबा पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध हटाने की माँग वाले प्रस्ताव पारित करती आई है।
अमेरिकी प्रतिनिधि माइक वाल्ट्ज ने किसी नाकेबंदी से इनकार करते हुए कहा कि अमेरिका क्यूबा को 10 करोड़ डॉलर की सहायता दे रहा है।
ट्रंप के रूस-तेल प्रतिबंध से प्रभावित होने के बाद भारत का एकतरफा दबाव-नीति के विरुद्ध यह रुख और मुखर हुआ है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में 11 जुलाई को भारत ने एकतरफा आर्थिक पाबंदियों और प्रतिबंधों को तत्काल समाप्त करने की मांग करते हुए कहा कि ये उपाय न केवल प्रभावित देशों के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में बाधक हैं, बल्कि उनकी राष्ट्रीय संप्रभुता का सीधा उल्लंघन भी करते हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के काउंसलर एल्डोस मैथ्यू पुन्नूस ने यह बयान क्यूबा पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों पर महासभा की वार्षिक चर्चा के दौरान दिया।

भारत का मूल पक्ष

काउंसलर पुन्नूस ने कहा, 'दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत बहुपक्षवाद को अपनी मूल आस्था मानता है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि एकतरफा प्रतिबंध मानवाधिकारों की रक्षा में बाधा डालते हैं और विकास, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों पर प्रतिकूल असर डालते हैं। उन्होंने कहा, 'हम अन्य देशों के साथ मिलकर ऐसे प्रतिबंधों को समाप्त करने की मांग करते हैं, जो प्रभावित देशों की आबादी — विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों — के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं।'

पुन्नूस ने यह भी याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा पहले ही सभी देशों से आग्रह कर चुकी है कि वे ऐसे कानूनों और उपायों को न तो लागू करें और न ही बनाए रखें, जिनका सीमापार (एक्स्ट्राटेरिटोरियल) प्रभाव अन्य देशों की संप्रभुता को प्रभावित करता हो।

क्यूबा प्रतिबंध: वैश्विक बहुमत बनाम अमेरिकी नीति

यह चर्चा उस संदर्भ में हुई जिसमें वर्ष 1992 से प्रत्येक वर्ष महासभा क्यूबा पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने की माँग करने वाले प्रस्ताव पारित करती आई है। पुन्नूस ने कहा कि क्यूबा पर लगाए गए ये एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अमेरिका की जिम्मेदारियों के विपरीत हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इन प्रतिबंधों के बावजूद क्यूबा ने जरूरतमंद देशों में अपने चिकित्सा कर्मियों को भेजकर वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

गौरतलब है कि हाल के वर्षों में इन प्रतिबंधों में कभी ढील दी गई तो कभी इन्हें और कड़ा किया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'अधिकतम दबाव' की रणनीति अपनाते हुए क्यूबा के खिलाफ पाबंदियाँ और सख्त कर दी हैं।

अमेरिका का प्रतिपक्ष

इसी सप्ताह महासभा में बोलते हुए संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के स्थायी प्रतिनिधि माइक वाल्ट्ज ने किसी भी नाकेबंदी या रोक से इनकार किया। उन्होंने कहा, 'क्यूबा पर अमेरिका की ओर से कोई नाकेबंदी नहीं है। क्यूबा में असली प्रतिबंध तो वह गिलोटिन है, जिसे वहाँ की सरकार ने अपने ही लोगों के सिर पर लटका रखा है।' वाल्ट्ज ने यह भी कहा कि अमेरिका स्वयं क्यूबा को 10 करोड़ डॉलर की सहायता उपलब्ध करा रहा है और कैथोलिक चर्च के साथ मिलकर जरूरतमंद लोगों तक भोजन तथा दवाइयाँ पहुँचाने का काम कर रहा है।

भारत का व्यापक रुख और ट्रंप के रूस-तेल प्रतिबंध

यह ऐसे समय में आया है जब भारत खुद भी एकतरफा प्रतिबंधों के दबाव से अछूता नहीं रहा। राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में रूस से तेल खरीदने पर द्वितीयक प्रतिबंध लगाए थे, जिसका सामना भारत को भी करना पड़ा था। हालाँकि, अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रंप प्रशासन के उस प्रतिबंध को बाद में निरस्त कर दिया। भारत लगातार उन देशों के खिलाफ अपना पक्ष रखता आया है जो एकतरफा दबाव वाले आर्थिक उपाय अपनाते हैं। पुन्नूस ने स्मरण कराया कि 'साल दर साल, महासभा ने ऐसे कानूनों और नियमों को लागू करने से मना किया है जिनका असर दूसरे देशों पर पड़ता है।'

आगे की राह

महासभा में इस विषय पर वार्षिक मतदान की परंपरा जारी रहने की संभावना है। भारत की यह स्थिति वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के उस व्यापक आग्रह के अनुरूप है जिसमें बहुपक्षीय ढाँचे को एकतरफा दबाव की राजनीति से ऊपर रखने की माँग की जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को बाध्यकारी नहीं बनाया जाता, तब तक इस मुद्दे पर व्यावहारिक बदलाव सीमित ही रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी व्यावहारिक धरातल पर कुछ नहीं बदलता — क्योंकि ये प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं हैं। भारत की 'बहुपक्षवाद' की दुहाई तब तक नैतिक दबाव से अधिक कुछ नहीं बन सकती, जब तक वह सुरक्षा परिषद में वीटो-सुधार जैसे ढाँचागत बदलावों की माँग से नहीं जोड़ी जाती। ग्लोबल साउथ की नेतृत्वकारी भूमिका का दावा करने वाले भारत के लिए यह एक सुअवसर है — लेकिन केवल भाषणों से नहीं, ठोस गठबंधन-निर्माण से।
RashtraPress
11 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संयुक्त राष्ट्र में भारत ने प्रतिबंधों पर क्या कहा?
भारत ने 11 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र महासभा में एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और पाबंदियों को राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए उनकी तत्काल समाप्ति की माँग की। काउंसलर एल्डोस मैथ्यू पुन्नूस ने कहा कि ये प्रतिबंध विकास, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों को नुकसान पहुँचाते हैं।
क्यूबा पर अमेरिकी प्रतिबंध कब से लागू हैं और महासभा का रुख क्या है?
अमेरिका ने क्यूबा पर दशकों पहले आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे और वर्ष 1992 से संयुक्त राष्ट्र महासभा प्रतिवर्ष इन्हें हटाने की माँग करने वाले प्रस्ताव पारित करती आई है। हालाँकि ये प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं हैं, इसलिए व्यावहारिक बदलाव सीमित रहा है।
अमेरिका ने क्यूबा प्रतिबंधों पर भारत के बयान का जवाब कैसे दिया?
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी स्थायी प्रतिनिधि माइक वाल्ट्ज ने किसी नाकेबंदी से इनकार किया और कहा कि अमेरिका क्यूबा को 10 करोड़ डॉलर की सहायता दे रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि क्यूबा की असली समस्या उसकी अपनी सरकार की नीतियाँ हैं, न कि अमेरिकी प्रतिबंध।
भारत खुद एकतरफा प्रतिबंधों से कैसे प्रभावित हुआ है?
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने पर द्वितीयक प्रतिबंध लगाए थे, जिसका सामना भारत को भी करना पड़ा था। बाद में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने उस प्रतिबंध को निरस्त कर दिया, लेकिन इस अनुभव ने भारत के एकतरफा दबाव-नीति के विरोध को और मुखर किया है।
भारत का 'बहुपक्षवाद' पर जोर क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय विवादों और दबाव के मामलों में संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों की भूमिका होनी चाहिए, न कि किसी एक देश की एकतरफा कार्रवाई की। यह रुख ग्लोबल साउथ के उस व्यापक आग्रह से मेल खाता है जो विकासशील देशों की संप्रभुता और विकास के अधिकार की रक्षा चाहता है।
राष्ट्र प्रेस
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