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यूएनएससी सुधार: भारत ने केवल अस्थायी सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को 'विफलता की कगार' बताकर नकारा

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यूएनएससी सुधार: भारत ने केवल अस्थायी सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को 'विफलता की कगार' बताकर नकारा

सारांश

भारत ने यूएनएससी सुधार बहस में साफ कह दिया — केवल अस्थायी सीटें बढ़ाना 'विफलता की कगार' है। स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने पी5 के एकाधिकार को चुनौती देते हुए स्पष्ट वार्ता-पाठ और टाइमलाइन की माँग की। यह दशकों पुरानी लड़ाई में भारत का अब तक का सबसे मुखर बयान है।

मुख्य बातें

भारत ने 16 जून को आईजीएन बैठक में केवल अस्थायी यूएनएससी सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को 'विफलता की कगार' बताकर खारिज किया।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी.
हरीश ने कहा कि पी5 की एकाधिकार संरचना को संतुलित करने के लिए स्थायी सदस्यता का विस्तार अनिवार्य है।
इटली के नेतृत्व वाले यूएफसी (कॉफी क्लब) — जिसमें पाकिस्तान भी है — पर नए स्थायी सदस्यों को रोकने के लिए प्रक्रियागत अवरोध पैदा करने का आरोप।
भारत ने आईजीएन सह-अध्यक्षों से स्पष्ट माइलस्टोन और टाइमलाइन वाला वार्ता-पाठ तैयार करने की अपील की।
हरीश ने यूएन चार्टर के आर्टिकल 23 का हवाला देते हुए कहा कि स्थायी और अस्थायी सदस्यता की परिभाषा पहले से स्पष्ट है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार की वैश्विक बहस एक निर्णायक मोड़ पर है — और भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 16 जून को सुरक्षा परिषद सुधार पर अंतर-सरकारी वार्ता (आईजीएन) की बैठक में कहा कि यदि सुधार केवल अस्थायी सदस्यता तक सीमित रहा, तो यह प्रक्रिया 'विफलता की कगार पर' पहुँच जाएगी। भारत का आग्रह है कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का विस्तार किए बिना कोई भी सुधार सार्थक नहीं होगा।

भारत का स्पष्ट रुख

हरीश ने आईजीएन बैठक में कहा, 'समूहों और सदस्य देशों ने वास्तविक और सार्थक बदलाव के लिए लंबे समय तक इंतजार किया है। यदि सुधार केवल अस्थायी सदस्यता तक सीमित रहा, तो यूएनएससी सुधार विफलता की कगार पर पहुंच जाएगा।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि स्थायी सदस्यता का विस्तार किए बिना पी5 — यानी ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस और अमेरिका — की एकाधिकार-आधारित निर्णय संरचना में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आएगा।

यूएफसी समूह और प्रक्रियागत अवरोध

इटली के नेतृत्व वाले यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस (यूएफसी) समूह — जिसे अनौपचारिक रूप से 'कॉफी क्लब' भी कहा जाता है और जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है — ने नए स्थायी सदस्यों को जोड़ने का लगातार विरोध किया है। यह समूह 1990 के दशक में गठित हुआ था और तब से स्थायी सीटों के विस्तार को रोकने की रणनीति अपनाता रहा है। भारत का आरोप है कि यूएफसी ऐसे वार्ता-पाठ (नेगोशिएटिंग टेक्स्ट) को अपनाने से रोकता है जो ठोस सुधार चर्चा का आधार बन सके।

हरीश ने यूएफसी का नाम लिए बिना कहा, 'यथास्थितिवादी पक्षों ने इस तर्क का इस्तेमाल अपने हित में किया है और इस प्रकार सुरक्षा परिषद में मौजूद असमानताओं को और मजबूत किया है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि 'जब तक हर मुद्दे पर सहमति न बन जाए, तब तक किसी भी मुद्दे पर सहमति नहीं' जैसी सोच को प्रगति में बाधा नहीं बनने देना चाहिए।

चार्टर और संरचनात्मक असमानता

भारतीय प्रतिनिधि ने वर्तमान सुरक्षा परिषद की संरचना को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वैश्विक परिस्थितियों का अवशेष बताया। उन्होंने कहा कि जहाँ संयुक्त राष्ट्र महासभा संप्रभु समानता के सिद्धांत पर चलती है, वहीं सुरक्षा परिषद की मूल संरचना इस सिद्धांत को पूरी तरह लागू नहीं होने देती। हरीश ने स्पष्ट किया, 'आर्टिकल 23 साफ तौर पर यूएनएससी सदस्यों को दो कैटेगरी में बांटता है: स्थायी और अस्थायी। इसलिए, स्थायी सीट की परिभाषा को और विस्तार में बताने की जरूरत नहीं है।'

एलिमेंट्स पेपर पर आपत्ति

हरीश ने आईजीएन सह-अध्यक्षों द्वारा तैयार 'एलिमेंट्स पेपर' की भी आलोचना की। उनके अनुसार यह दस्तावेज विभिन्न विचारों को समेकित रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता है, लेकिन स्थायी सदस्यता की अवधारणा पर पर्याप्त स्पष्टता नहीं देता। उन्होंने चेताया कि ऐसा दृष्टिकोण सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के बजाय उसे और लंबा खींच सकता है।

भारत की माँग: स्पष्ट टाइमलाइन और वार्ता-पाठ

भारत ने आईजीएन सह-अध्यक्षों से अपील की है कि वे एक ऐसा वार्ता-पाठ तैयार करने में पहल करें जिसमें स्पष्ट माइलस्टोन और टाइमलाइन हों। गौरतलब है कि यूएनएससी सुधार की माँग दशकों पुरानी है और भारत — जो जी4 समूह (भारत, जर्मनी, जापान, ब्राज़ील) का हिस्सा है — स्थायी सीट का प्रमुख दावेदार रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब संयुक्त राष्ट्र में बहुपक्षीय सुधार की माँग वैश्विक दक्षिण में और तेज हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी भाषा पहले से कहीं अधिक तीखी है — और यह जानबूझकर है। दशकों से यूएनएससी सुधार की माँग करने वाले भारत के लिए 'विफलता की कगार' जैसा पद चुनना एक कूटनीतिक संदेश है कि अब अर्द्ध-सुधार स्वीकार्य नहीं। विडंबना यह है कि जिस पी5 संरचना को भारत बदलना चाहता है, उसी के एक स्थायी सदस्य — चीन — ने भारत की स्थायी सदस्यता का खुलकर विरोध किया है, जो इस पूरी बहस की सबसे बड़ी बाधा है और जिसका ज़िक्र अक्सर मुख्यधारा की कवरेज में छूट जाता है। यूएफसी को 'यथास्थितिवादी' कहना भारत की बढ़ती बेसब्री को दर्शाता है, लेकिन असली सवाल यह है कि बिना चीन की सहमति के स्थायी सीट का रास्ता कैसे खुलेगा।
RashtraPress
1 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूएनएससी सुधार पर भारत का क्या रुख है?
भारत का स्पष्ट रुख है कि केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है — स्थायी सदस्यता का विस्तार भी होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 16 जून को कहा कि बिना स्थायी सदस्यता विस्तार के सुधार 'विफलता की कगार' पर होगा।
यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस (यूएफसी) समूह क्या है और भारत इसका विरोध क्यों करता है?
यूएफसी — जिसे 'कॉफी क्लब' भी कहते हैं — इटली के नेतृत्व में 1990 के दशक में बना एक देशों का समूह है जो यूएनएससी में नई स्थायी सीटों का विरोध करता है। इसमें पाकिस्तान भी शामिल है। भारत का आरोप है कि यह समूह प्रक्रियागत हथकंडों से ठोस वार्ता को रोकता है।
आईजीएन क्या है और इसमें भारत ने क्या माँग की?
आईजीएन यानी अंतर-सरकारी वार्ता यूएनएससी सुधार पर संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक बातचीत प्रक्रिया है। भारत ने इसके सह-अध्यक्षों से एक स्पष्ट वार्ता-पाठ तैयार करने की अपील की है जिसमें तय माइलस्टोन और टाइमलाइन हों।
भारत यूएनएससी की वर्तमान संरचना को अनुचित क्यों मानता है?
भारत का कहना है कि यूएनएससी की मौजूदा संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों को दर्शाती है और आज की वास्तविकता से मेल नहीं खाती। यूएन चार्टर का सिद्धांत — संप्रभु समानता — सुरक्षा परिषद में पूरी तरह लागू नहीं होता क्योंकि पी5 को वीटो का विशेषाधिकार प्राप्त है।
'एलिमेंट्स पेपर' पर भारत की आपत्ति क्या है?
भारत ने आईजीएन सह-अध्यक्षों द्वारा तैयार 'एलिमेंट्स पेपर' की आलोचना करते हुए कहा कि यह दस्तावेज स्थायी सदस्यता की अवधारणा पर पर्याप्त स्पष्टता नहीं देता। पी. हरीश ने कहा कि ऐसा दृष्टिकोण सुधार को आगे बढ़ाने के बजाय उसे और लंबा खींच सकता है।
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