यूएनएससी सुधार: भारत ने केवल अस्थायी सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को 'विफलता की कगार' बताकर नकारा
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार की वैश्विक बहस एक निर्णायक मोड़ पर है — और भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 16 जून को सुरक्षा परिषद सुधार पर अंतर-सरकारी वार्ता (आईजीएन) की बैठक में कहा कि यदि सुधार केवल अस्थायी सदस्यता तक सीमित रहा, तो यह प्रक्रिया 'विफलता की कगार पर' पहुँच जाएगी। भारत का आग्रह है कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का विस्तार किए बिना कोई भी सुधार सार्थक नहीं होगा।
भारत का स्पष्ट रुख
हरीश ने आईजीएन बैठक में कहा, 'समूहों और सदस्य देशों ने वास्तविक और सार्थक बदलाव के लिए लंबे समय तक इंतजार किया है। यदि सुधार केवल अस्थायी सदस्यता तक सीमित रहा, तो यूएनएससी सुधार विफलता की कगार पर पहुंच जाएगा।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि स्थायी सदस्यता का विस्तार किए बिना पी5 — यानी ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस और अमेरिका — की एकाधिकार-आधारित निर्णय संरचना में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आएगा।
यूएफसी समूह और प्रक्रियागत अवरोध
इटली के नेतृत्व वाले यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस (यूएफसी) समूह — जिसे अनौपचारिक रूप से 'कॉफी क्लब' भी कहा जाता है और जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है — ने नए स्थायी सदस्यों को जोड़ने का लगातार विरोध किया है। यह समूह 1990 के दशक में गठित हुआ था और तब से स्थायी सीटों के विस्तार को रोकने की रणनीति अपनाता रहा है। भारत का आरोप है कि यूएफसी ऐसे वार्ता-पाठ (नेगोशिएटिंग टेक्स्ट) को अपनाने से रोकता है जो ठोस सुधार चर्चा का आधार बन सके।
हरीश ने यूएफसी का नाम लिए बिना कहा, 'यथास्थितिवादी पक्षों ने इस तर्क का इस्तेमाल अपने हित में किया है और इस प्रकार सुरक्षा परिषद में मौजूद असमानताओं को और मजबूत किया है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि 'जब तक हर मुद्दे पर सहमति न बन जाए, तब तक किसी भी मुद्दे पर सहमति नहीं' जैसी सोच को प्रगति में बाधा नहीं बनने देना चाहिए।
चार्टर और संरचनात्मक असमानता
भारतीय प्रतिनिधि ने वर्तमान सुरक्षा परिषद की संरचना को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वैश्विक परिस्थितियों का अवशेष बताया। उन्होंने कहा कि जहाँ संयुक्त राष्ट्र महासभा संप्रभु समानता के सिद्धांत पर चलती है, वहीं सुरक्षा परिषद की मूल संरचना इस सिद्धांत को पूरी तरह लागू नहीं होने देती। हरीश ने स्पष्ट किया, 'आर्टिकल 23 साफ तौर पर यूएनएससी सदस्यों को दो कैटेगरी में बांटता है: स्थायी और अस्थायी। इसलिए, स्थायी सीट की परिभाषा को और विस्तार में बताने की जरूरत नहीं है।'
एलिमेंट्स पेपर पर आपत्ति
हरीश ने आईजीएन सह-अध्यक्षों द्वारा तैयार 'एलिमेंट्स पेपर' की भी आलोचना की। उनके अनुसार यह दस्तावेज विभिन्न विचारों को समेकित रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता है, लेकिन स्थायी सदस्यता की अवधारणा पर पर्याप्त स्पष्टता नहीं देता। उन्होंने चेताया कि ऐसा दृष्टिकोण सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के बजाय उसे और लंबा खींच सकता है।
भारत की माँग: स्पष्ट टाइमलाइन और वार्ता-पाठ
भारत ने आईजीएन सह-अध्यक्षों से अपील की है कि वे एक ऐसा वार्ता-पाठ तैयार करने में पहल करें जिसमें स्पष्ट माइलस्टोन और टाइमलाइन हों। गौरतलब है कि यूएनएससी सुधार की माँग दशकों पुरानी है और भारत — जो जी4 समूह (भारत, जर्मनी, जापान, ब्राज़ील) का हिस्सा है — स्थायी सीट का प्रमुख दावेदार रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब संयुक्त राष्ट्र में बहुपक्षीय सुधार की माँग वैश्विक दक्षिण में और तेज हो रही है।