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यूएनएससी सुधार पर भारत का कड़ा रुख: '1945 का ढांचा आज की दुनिया के लिए नाकाफी'

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यूएनएससी सुधार पर भारत का कड़ा रुख: '1945 का ढांचा आज की दुनिया के लिए नाकाफी'

सारांश

भारत ने न्यूयॉर्क में यूएनएससी सुधार की माँग को और तेज किया — स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 1945 के ढांचे को 'एनिएक कंप्यूटर पर AI चलाने' जैसा बताया। द्वितीय विश्व युद्ध में 25 लाख सैनिकों के योगदान का हवाला देकर भारत ने स्थायी सदस्यता पर अपना दावा दोहराया, जबकि इटली-पाकिस्तान नेतृत्व वाला यूएफसी समूह सुधारों को रोकता रहा।

मुख्य बातें

हरीश ने 27 मई 2026 को संयुक्त राष्ट्र में कहा कि आठ दशक पुराना यूएनएससी ढांचा आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के लिए अपर्याप्त है।
'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' (यूएफसी) समूह — जिसमें इटली और पाकिस्तान शामिल हैं — प्रक्रियागत नियमों से सुधार वार्ता रोक रहा है।
भारत ने स्थायी सदस्यता श्रेणी के विस्तार को असली बदलाव की शर्त बताया।
द्वितीय विश्व युद्ध में 25 लाख से अधिक भारतीय सैनिकों की भागीदारी और 87,000 से अधिक की शहादत का हवाला देकर भारत ने ऐतिहासिक दावेदारी दोहराई।
महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी परिषद की विश्वसनीयता के संकट की पुष्टि की और अफ्रीका को स्थायी प्रतिनिधित्व से बाहर रखे जाने पर चिंता जताई।

भारत के संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 27 मई 2026 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के सुधारों पर जोरदार दलील पेश करते हुए कहा कि आठ दशक पुराना यूएनएससी ढांचा आज की भू-राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'जमे हुए हित' और प्रक्रियागत अवरोध सुधारों को रोक रहे हैं, जबकि परिषद की विश्वसनीयता दांव पर है।

मुख्य घटनाक्रम

हरीश संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों को बनाए रखने पर आयोजित उच्चस्तरीय बहस में बोल रहे थे। उन्होंने कहा, "अंतर-सरकारी वार्ताओं (आईजीएन) में सुरक्षा परिषद सुधारों पर कोई प्रगति न होना इस बात का संकेत है कि कई सदस्य देश यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं और आठ दशक पुराने यूएनएससी ढांचे को बदलना नहीं चाहते।"

उन्होंने 1945 के पहले इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर 'एनिएक' का उदाहरण देते हुए कहा, "यह ऐसा है जैसे हम 1945 के 'एनिएक' पर आज की एडवांस एआई तकनीक चलाने की कोशिश कर रहे हों।" उनका तर्क था कि जिस तरह मानवता की प्रगति उसकी अनुकूलन क्षमता पर टिकी है, उसी तरह संयुक्त राष्ट्र को भी बदलना होगा।

सुधार के रास्ते में रुकावट

सुधारों को मुख्य रूप से 'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' (यूएफसी) समूह रोकता है, जिसका नेतृत्व इटली करता है और जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है। यह समूह प्रक्रिया से जुड़े नियमों का सहारा लेकर बातचीत को आगे बढ़ने से रोकता है। भारत का मानना है कि स्थायी सदस्यता श्रेणी का विस्तार किए बिना परिषद के निर्णय-प्रक्रिया में कोई असली बदलाव संभव नहीं है।

हरीश ने कहा, "हमें स्थायी सदस्यता श्रेणी को बढ़ाना ही होगा, क्योंकि इससे ही इस परिषद के फैसले लेने के तरीके में असली बदलाव आएगा।" उन्होंने यह भी चेताया कि यदि परिषद ने खुद को नहीं बदला, तो उसकी "ताकत, विश्वसनीयता, वैधता और प्रभावशीलता" और घटती जाएगी।

गुटेरेस की चिंता और अफ्रीका का सवाल

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी परिषद की विश्वसनीयता के संकट पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि "ऐसी सुरक्षा परिषद जो आज की भू-राजनीतिक हकीकत को नहीं दिखाती, वह अपने दायित्वों को पूरी तरह निभा नहीं सकती। वैश्विक संस्थाओं को आज की वास्तविकताओं को दिखाना चाहिए, न कि 1945 की दुनिया को।"

गुटेरेस ने अफ्रीका को स्थायी सदस्यता से बाहर रखे जाने पर विशेष चिंता जताई और कहा कि सुधार का अर्थ है परिषद की विश्वसनीयता को वापस लाना तथा उसे "निर्णायक और समावेशी" बनाना।

भारत का ऐतिहासिक दावा

हरीश ने स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी को ऐतिहासिक संदर्भ में रखा। उन्होंने बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध में 25 लाख से अधिक भारतीय सैनिकों ने मित्र देशों के साथ लड़ाई लड़ी और 87,000 से अधिक सैनिकों ने अपनी जान गंवाई — यही वह बलिदान था जिसने संयुक्त राष्ट्र के गठन की नींव रखने में भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा, "यह हमारा युद्ध नहीं था, लेकिन हमने इसकी भारी कीमत चुकाई। इसलिए हमारे लिए संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य बनना स्वाभाविक था।" भारत ने शांति स्थापना अभियानों — कोरिया, इंडोचाइना, कांगो और गाजा — में भी अपनी प्रतिबद्धता जारी रखी है।

आगे की राह

यह ऐसे समय में आया है जब यूएनएससी के भीतर स्थायी वीटो शक्ति वाले सदस्यों के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं। हरीश ने कहा कि "यूएन में दक्षता और कामकाज सुधारने की बातें आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई हैं।" गौरतलब है कि यूएनएससी सुधार की माँग दशकों पुरानी है, लेकिन वीटो-धारक देशों की असहमति के कारण यह अब तक ठोस आकार नहीं ले पाई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और हर बार वही दीवार खड़ी मिलती है। असली सवाल यह है कि क्या भारत इस बार महज वक्तव्य से आगे जाकर कोई कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति रखता है, या यह फिर एक और प्रभावशाली भाषण बनकर रह जाएगा। यूएफसी समूह की रणनीति स्पष्ट है — प्रक्रिया में उलझाओ, निर्णय टालो। जब तक वीटो-धारक देशों में से कोई एक भारत के पक्ष में खुलकर नहीं आता, तब तक स्थायी सदस्यता की राह संरचनात्मक रूप से बंद है। गुटेरेस की सहानुभूति और भारत के ऐतिहासिक तर्क नैतिक रूप से ठोस हैं, लेकिन यूएनएससी का गणित नैतिकता से नहीं, वीटो से चलता है।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूएनएससी सुधार पर भारत का क्या रुख है?
भारत चाहता है कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता श्रेणी का विस्तार किया जाए, ताकि आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताएँ उसमें प्रतिबिंबित हों। स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 27 मई 2026 को कहा कि बिना स्थायी सदस्यता विस्तार के परिषद के निर्णय-तंत्र में कोई असली बदलाव नहीं आएगा।
'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' (यूएफसी) समूह क्या है और यह सुधारों को कैसे रोकता है?
यूएफसी उन देशों का समूह है जो यूएनएससी में नई स्थायी सीटें जोड़े जाने का विरोध करते हैं। इसका नेतृत्व इटली करता है और पाकिस्तान भी इसमें शामिल है। यह समूह अंतर-सरकारी वार्ताओं (आईजीएन) में प्रक्रियागत नियमों का उपयोग कर बातचीत को आगे बढ़ने से रोकता है।
यूएनएससी में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का ऐतिहासिक आधार क्या है?
पी. हरीश ने बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध में 25 लाख से अधिक भारतीय सैनिकों ने मित्र देशों के साथ लड़ाई लड़ी और 87,000 से अधिक ने अपनी जान गंवाई। यह वही बलिदान था जिसने संयुक्त राष्ट्र के गठन की नींव रखने में भूमिका निभाई, इसलिए भारत का संस्थापक-स्तर का दावा बनता है।
महासचिव गुटेरेस ने यूएनएससी सुधार पर क्या कहा?
एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि जो परिषद आज की भू-राजनीतिक हकीकत को नहीं दिखाती, वह अपने दायित्व पूरी तरह नहीं निभा सकती। उन्होंने अफ्रीका को स्थायी प्रतिनिधित्व से बाहर रखे जाने पर विशेष चिंता जताई और सुधार को परिषद की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए जरूरी बताया।
यूएनएससी सुधार न होने से क्या नुकसान है?
पी. हरीश के अनुसार, यदि परिषद बदलती परिस्थितियों के अनुसार नहीं ढली, तो उसकी ताकत, विश्वसनीयता, वैधता और प्रभावशीलता और घटती जाएगी। वर्तमान में स्थायी वीटो-धारक सदस्यों के बीच गहरे मतभेद परिषद की निर्णय क्षमता को पहले से ही बाधित कर रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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