यूएनएससी सुधार पर भारत का कड़ा रुख: '1945 का ढांचा आज की दुनिया के लिए नाकाफी'
सारांश
मुख्य बातें
भारत के संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 27 मई 2026 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के सुधारों पर जोरदार दलील पेश करते हुए कहा कि आठ दशक पुराना यूएनएससी ढांचा आज की भू-राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'जमे हुए हित' और प्रक्रियागत अवरोध सुधारों को रोक रहे हैं, जबकि परिषद की विश्वसनीयता दांव पर है।
मुख्य घटनाक्रम
हरीश संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों को बनाए रखने पर आयोजित उच्चस्तरीय बहस में बोल रहे थे। उन्होंने कहा, "अंतर-सरकारी वार्ताओं (आईजीएन) में सुरक्षा परिषद सुधारों पर कोई प्रगति न होना इस बात का संकेत है कि कई सदस्य देश यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं और आठ दशक पुराने यूएनएससी ढांचे को बदलना नहीं चाहते।"
उन्होंने 1945 के पहले इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर 'एनिएक' का उदाहरण देते हुए कहा, "यह ऐसा है जैसे हम 1945 के 'एनिएक' पर आज की एडवांस एआई तकनीक चलाने की कोशिश कर रहे हों।" उनका तर्क था कि जिस तरह मानवता की प्रगति उसकी अनुकूलन क्षमता पर टिकी है, उसी तरह संयुक्त राष्ट्र को भी बदलना होगा।
सुधार के रास्ते में रुकावट
सुधारों को मुख्य रूप से 'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' (यूएफसी) समूह रोकता है, जिसका नेतृत्व इटली करता है और जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है। यह समूह प्रक्रिया से जुड़े नियमों का सहारा लेकर बातचीत को आगे बढ़ने से रोकता है। भारत का मानना है कि स्थायी सदस्यता श्रेणी का विस्तार किए बिना परिषद के निर्णय-प्रक्रिया में कोई असली बदलाव संभव नहीं है।
हरीश ने कहा, "हमें स्थायी सदस्यता श्रेणी को बढ़ाना ही होगा, क्योंकि इससे ही इस परिषद के फैसले लेने के तरीके में असली बदलाव आएगा।" उन्होंने यह भी चेताया कि यदि परिषद ने खुद को नहीं बदला, तो उसकी "ताकत, विश्वसनीयता, वैधता और प्रभावशीलता" और घटती जाएगी।
गुटेरेस की चिंता और अफ्रीका का सवाल
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी परिषद की विश्वसनीयता के संकट पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि "ऐसी सुरक्षा परिषद जो आज की भू-राजनीतिक हकीकत को नहीं दिखाती, वह अपने दायित्वों को पूरी तरह निभा नहीं सकती। वैश्विक संस्थाओं को आज की वास्तविकताओं को दिखाना चाहिए, न कि 1945 की दुनिया को।"
गुटेरेस ने अफ्रीका को स्थायी सदस्यता से बाहर रखे जाने पर विशेष चिंता जताई और कहा कि सुधार का अर्थ है परिषद की विश्वसनीयता को वापस लाना तथा उसे "निर्णायक और समावेशी" बनाना।
भारत का ऐतिहासिक दावा
हरीश ने स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी को ऐतिहासिक संदर्भ में रखा। उन्होंने बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध में 25 लाख से अधिक भारतीय सैनिकों ने मित्र देशों के साथ लड़ाई लड़ी और 87,000 से अधिक सैनिकों ने अपनी जान गंवाई — यही वह बलिदान था जिसने संयुक्त राष्ट्र के गठन की नींव रखने में भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा, "यह हमारा युद्ध नहीं था, लेकिन हमने इसकी भारी कीमत चुकाई। इसलिए हमारे लिए संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य बनना स्वाभाविक था।" भारत ने शांति स्थापना अभियानों — कोरिया, इंडोचाइना, कांगो और गाजा — में भी अपनी प्रतिबद्धता जारी रखी है।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब यूएनएससी के भीतर स्थायी वीटो शक्ति वाले सदस्यों के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं। हरीश ने कहा कि "यूएन में दक्षता और कामकाज सुधारने की बातें आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई हैं।" गौरतलब है कि यूएनएससी सुधार की माँग दशकों पुरानी है, लेकिन वीटो-धारक देशों की असहमति के कारण यह अब तक ठोस आकार नहीं ले पाई है।