UNSC सुधार में विफलता से यूएन पर जनविश्वास घट रहा: भारत की कड़ी चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरिश ने 15 जुलाई 2025 को स्पष्ट शब्दों में कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार न होने के कारण वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रति जनता का भरोसा तेज़ी से कमज़ोर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद को इस योग्य बनाया जाना चाहिए कि वह सक्रिय संघर्षों को समाप्त कर सके और प्रभावित आबादी की मानवीय पीड़ा को कम करने में ठोस भूमिका निभा सके।
मंत्रिस्तरीय गोलमेज में भारत का पक्ष
हरिश वर्ष 2024 के विश्व नेताओं के शिखर सम्मेलन में अपनाए गए 'पैक्ट फॉर द फ्यूचर' के लक्ष्यों के अंतर्गत 'भविष्य के अनुरूप बहुपक्षवाद को सक्षम बनाना' विषय पर आयोजित मंत्रिस्तरीय गोलमेज बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, 'हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र को लेकर लोगों की धारणा नकारात्मक हुई है। इसका मुख्य कारण यह है कि सुरक्षा परिषद दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी भीषण संघर्षों में सार्थक हस्तक्षेप करने में विफल रही है।'
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के अपने मूल संवैधानिक दायित्व को निभाने में भी पिछड़ती दिख रही है — जो संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का केंद्रीय उद्देश्य था।
80 साल पुरानी संरचना, आज की चुनौतियाँ
हरिश ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 80 वर्ष पहले बनाई गई संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा संरचना आज की जटिल वैश्विक चुनौतियों के लिए पर्याप्त नहीं रह गई है। उन्होंने खेद जताते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद सुधार पर चल रही अंतर-सरकारी वार्ताएं (IGN) केवल 'पहले से तैयार बयानों के अंतहीन दौर' तक सीमित होकर रह गई हैं और इनसे कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है।
गौरतलब है कि UNSC सुधार की माँग दशकों पुरानी है और भारत, जर्मनी, जापान तथा ब्राज़ील सहित कई देश स्थायी सदस्यता विस्तार की पुरज़ोर वकालत करते आए हैं। बावजूद इसके, पाँच स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार के कारण यह प्रक्रिया वर्षों से अवरुद्ध है।
'पैक्ट फॉर द फ्यूचर' के एक्शन प्वाइंट कागज़ों तक सीमित
हरिश ने बताया कि 'पैक्ट फॉर द फ्यूचर' के एक्शन प्वाइंट 39 से 42 — जिनमें हिंसा, नस्लवाद और विदेशी-विरोधी मानसिकता (ज़ेनोफोबिया) को समाप्त करने, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने तथा सुरक्षा परिषद द्वारा प्रभावी शांति स्थापना रणनीतियाँ तैयार करने का आह्वान किया गया है — अधिकतर कागज़ों तक ही सीमित रह गए हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है और इसमें बदलाव होना चाहिए।'
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इन एक्शन प्वाइंट्स को लेकर भारत की कुछ गंभीर आपत्तियाँ थीं, लेकिन कहा कि 'भारत की रचनात्मक भावना ने हमें व्यापक रूप से इस पैक्ट के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।'
व्यापक संस्थागत सुधारों की दरकार
हरिश ने UNSC के अलावा संयुक्त राष्ट्र महासभा को अधिक प्रभावी बनाने और आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC) की भूमिका को आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय — सतत विकास के तीनों आयामों में मज़बूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों को भी 'अपने मूल दायित्वों को बनाए रखते हुए अधिक प्रतिनिधिक, अधिक जवाबदेह और विकासोन्मुख बनना होगा।'
वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के संदर्भ में उन्होंने कहा कि सतत विकास लक्ष्यों (SDG) की प्राप्ति के लिए पर्याप्त, सस्ती और पूर्वानुमान योग्य वित्तीय व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। अपने संबोधन के अंत में हरिश ने कहा कि भारत 'वसुधैव कुटुंबकम्' — अर्थात पूरी दुनिया एक परिवार है — के सिद्धांत पर आधारित दृष्टिकोण के साथ इस वैश्विक प्रयास में सहभागी है। आने वाले महीनों में IGN की अगली बैठकों में भारत का रुख और भी अहम हो जाएगा।