यूएनएससी को आतंकियों को वैधता देने का मंच नहीं बनने देंगे: भारत की दो-टूक चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की खुली बहस में भारत ने 20 अगस्त 2026 को कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि परिषद की सदस्यता का उपयोग आतंकवादियों को प्रतिबंध सूची से हटाकर उन्हें वैधता प्रदान करने या राजनीतिक आधार पर किसी संगठन को आतंकी घोषित करने के लिए नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान की भूमिका पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए यह बयान ऐसे समय आया है जब यूएनएससी की आतंकवाद-रोधी सहायक समितियों में आठ महीने से अधिक समय से अध्यक्षों के पद रिक्त हैं।
भारत का स्पष्ट संदेश
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रभारी योजना पटेल ने सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर आयोजित खुली बहस में कहा, "सुरक्षा परिषद में मौजूदगी का इस्तेमाल आतंकवादियों को सूची से हटाकर उन्हें वैधता प्रदान करने या बिना किसी वस्तुनिष्ठ मानदंड और पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य के केवल राजनीतिक विचारों के आधार पर अन्य संस्थाओं को आतंकवादी संगठन घोषित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि "सुरक्षा परिषद की सदस्यता अपने साथ बड़ी जिम्मेदारियाँ लेकर आती है — इसे संकीर्ण राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए।"
पाकिस्तान और चीन की भूमिका पर संदर्भ
गौरतलब है कि इस वर्ष पाकिस्तान और चीन ने बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और मजीद ब्रिगेड को यूएनएससी की प्रतिबंध सूची में शामिल कराने का प्रयास किया था, जिसे अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने विफल कर दिया। इसके अतिरिक्त, सुरक्षा परिषद के निर्वाचित सदस्य पाकिस्तान ने उन आतंकियों और संगठनों को प्रतिबंध सूची से हटाने की कोशिश की है जिन्हें वह अपने यहाँ शरण देता है। चीन ने वर्षों तक जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर और लश्कर-ए-तैयबा के नेता साजिद मीर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने के प्रयासों को अवरुद्ध किया था।
समितियों में गतिरोध और भारत की माँग
योजना पटेल ने रेखांकित किया कि आठ महीने बीत जाने के बाद भी यूएनएससी अपनी आतंकवाद-रोधी और प्रतिबंध संबंधी सहायक समितियों के अध्यक्ष नियुक्त नहीं कर पाई है। रिपोर्टों के अनुसार इसका प्रमुख कारण पाकिस्तान द्वारा प्रतिबंध समिति का नेतृत्व करने की इच्छा है, जबकि परिषद में आम सहमति अनिवार्य होने के कारण गतिरोध बना हुआ है। पटेल ने माँग की कि इन नियुक्तियों के लिए "स्पष्ट, अंतिम और गैर-परक्राम्य समयसीमा" तय की जाए। जापान के उप-स्थायी प्रतिनिधि मिकानागी तोमोहिरो ने भी इस देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए संतुलित और पारदर्शी परामर्श के ज़रिए शीघ्र सहमति बनाने का आग्रह किया।
शांति स्थापना और सुधार की माँग
पटेल ने शांति स्थापना अभियानों में योगदान देने वाले देशों — जो अनिवार्य रूप से सुरक्षा परिषद के सदस्य नहीं हैं — को जनादेश और संसाधनों से जुड़े निर्णयों में शामिल किए जाने की वकालत की। उन्होंने यूएनएससी की मौजूदा संरचना को दूसरे विश्व युद्ध के 80 वर्ष पुराने परिणामों पर आधारित बताते हुए स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सदस्यता विस्तार की भारत की चिरपरिचित माँग दोहराई। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूएनएससी सुधार केवल स्पष्ट लक्ष्य और समयसीमा के साथ पाठ-आधारित वार्ताओं (टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशंस) के माध्यम से ही संभव है। उल्लेखनीय है कि अंतर-सरकारी वार्ताओं (आईजीएन) के अंतर्गत चल रही सुधार प्रक्रिया में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है, और भारत का आरोप है कि पाकिस्तान सहित इटली की अगुवाई में कुछ देश प्रक्रियागत उपायों से वार्ता-पाठ को अपनाने में बाधा डालते रहे हैं।
आगे क्या होगा
यूएनएससी की सहायक समितियों में गतिरोध यदि जारी रहता है, तो वैश्विक आतंकवाद-रोधी तंत्र की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठते रहेंगे। भारत की यह दो-टूक स्थिति न केवल पाकिस्तान को सीधा संदेश है, बल्कि यूएनएससी सुधार की दिशा में बहुपक्षीय समर्थन जुटाने की व्यापक रणनीति का भी हिस्सा है।