जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान-OIC की टिप्पणी UNHRC में भारत ने नकारी, बताया अभिन्न अंग
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 62वें सत्र में 19 जून 2026 को भारत ने जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान के आरोपों और इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) की टिप्पणियों को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह क्षेत्र भारत का 'अभिन्न और अविभाज्य' हिस्सा है और हमेशा रहेगा। जिनेवा स्थित भारतीय मिशन की प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने यह कड़ा जवाब देते हुए एकमात्र अनसुलझे मुद्दे के रूप में भारतीय भूभाग पर पाकिस्तान के गैरकानूनी कब्जे को रेखांकित किया।
भारत का आधिकारिक जवाब
अनुपमा सिंह ने UNHRC में कहा, 'हम पाकिस्तान के लगाए बेबुनियाद और गलत इरादे वाले आरोपों को पूरी तरह से खारिज करते हैं। हम OIC की तरफ से जम्मू और कश्मीर को लेकर की गई टिप्पणी को भी पूरी तरह से खारिज करते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का जरूरी और अटूट हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा।
सिंह ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान का यह प्रचार उसके घरेलू मोर्चे पर विफलताओं और आतंकवाद को दिए जा रहे समर्थन को छिपाने की कोशिश मात्र है। उन्होंने कहा कि OIC समन्वयक की भूमिका का पाकिस्तान का दुरुपयोग इस भ्रामक अभियान को और उजागर करता है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर गंभीर आरोप
भारतीय प्रतिनिधि ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) की स्थिति पर कड़े शब्दों में कहा कि वहाँ फैली अशांति दशकों के दबाव, सैन्य नियंत्रण और बुनियादी अधिकारों से वंचित करने का नतीजा है। उन्होंने रावलकोट की घटनाओं का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि सैकड़ों आम लोगों की हत्या और बेरहम कार्रवाई जबरदस्ती के उस तंत्र का परिणाम है जिसे पाकिस्तानी सेना ने दशकों से बनाए रखा है।
सिंह ने कहा, 'रोटी, बिजली, अधिकार और सम्मान की मांग कर रहे लोगों को भी गोलियों और क्रूरता का सामना करना पड़ रहा है। एक गैरकानूनी कब्जा सिर्फ जबरदस्ती से ही बनाए रखा जा सकता है।' उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान ने POK में जनसंख्या संरचना में सुनियोजित बदलाव किया है।
पाकिस्तान पर आतंकवाद निर्यात का आरोप
अनुपमा सिंह ने पाकिस्तान पर सीधा आरोप लगाया कि वह आतंकवाद को सरकारी नीति के रूप में अपना रहा है, जबकि एक साथ खुद को आतंकवाद का शिकार बताता है। उन्होंने कहा, 'यह वह देश है जहाँ के मौजूदा रक्षा मंत्री आतंकवादियों को आश्रय देने, प्रशिक्षण देने और तैनात करने को सरकारी नीति बताते हैं और फिर भी पाकिस्तान खुद को आतंकवाद का पीड़ित कहता है।' उन्होंने इसे एक 'फ्रेंकस्टीन राज्य' का उदाहरण करार दिया।
सिंधु जल संधि पर भारत का कड़ा रुख
भारतीय प्रतिनिधि ने सिंधु जल संधि (1960) पर भी स्पष्ट रुख रखा। उन्होंने कहा कि जो देश नीति के तौर पर आतंक निर्यात करता है, वह सद्भावना और मित्रता पर आधारित सहयोग के विशेष अधिकारों की माँग नहीं कर सकता। उनके अनुसार यह संधि अब 'पुरानी हो चुकी है' और 1960 में हुई इस संधि को जवाबदेही और आज की हकीकत से अलग नहीं रखा जा सकता।
गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव अपने उच्चतम स्तर पर है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक टकराव तेज हो रहा है। भारत का यह स्पष्ट संदेश संकेत देता है कि जम्मू-कश्मीर और सिंधु जल जैसे मुद्दों पर नई दिल्ली किसी भी बाहरी दबाव को स्वीकार करने के मूड में नहीं है।