पाकिस्तान में सियासी भूचाल: PTI मार्च से पहले इस्लामाबाद-रावलपिंडी सील, महंगाई से बेहाल जनता
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के 27 सितंबर 2026 को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से पहले इस्लामाबाद और रावलपिंडी को व्यावहारिक रूप से देश के बाकी हिस्सों से काट दिया गया है — सड़कें बंद, सैकड़ों कंटेनर तैनात और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ जारी हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार पर आरोप है कि आर्थिक, राजनीतिक और शासन संबंधी मुद्दों के कुप्रबंधन ने उसकी स्थिति को पूरी तरह उजागर कर दिया है।
मुख्य घटनाक्रम
पाकिस्तानी मीडिया डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद में स्थानीय प्रशासन ने दो महीने के लिए सभी प्रकार की सभाओं, जुलूसों और प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस आदेश के तहत रेड जोन सहित किसी भी सार्वजनिक स्थान पर 5 या अधिक व्यक्तियों के जमावड़े पर रोक है।
पंजाब सरकार ने भी पूरे प्रांत में 13 दिनों का प्रतिबंध लगाया है। अटक और रावलपिंडी में और उसके आसपास सड़कों व व्यवसायों को बंद करते हुए चार जिलों में रेंजर्स अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया है। यह सब PTI के संस्थापक अध्यक्ष इमरान खान की रिहाई और बढ़ती महंगाई के विरोध में प्रस्तावित मार्च से पहले हुआ है।
महंगाई और जनता पर असर
कराची विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर और सामाजिक विज्ञान संकाय के पूर्व डीन मोनिस अहमर ने एक प्रमुख पाकिस्तानी दैनिक में लिखा कि पाकिस्तान सरकार रोज़ाना ईंधन की कीमतों की समीक्षा करती है और अधिकारी न तो स्वयं को जवाबदेह मानते हैं और न ही आम नागरिकों पर महंगाई के असर को लेकर चिंतित हैं।
उन्होंने उल्लेख किया कि कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आने के बावजूद सरकार ने पेट्रोल-डीजल की दरें कम नहीं कीं। पेट्रोलियम उत्पादों के अलावा बिजली टैरिफ, गैस, सब्जियाँ, फल, मांस, दूध, आटा और खाद्य तेल — सभी की कीमतें बढ़ी हैं। रिपोर्टों के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी (JI) का पेट्रोलियम लेवी विरोधी मार्च भी सरकार पर कोई विशेष दबाव नहीं बना सका।
सरकार की प्रतिक्रिया और विशेषज्ञ की राय
प्रोफेसर अहमर के अनुसार, 26वें और 27वें संवैधानिक संशोधनों ने पाकिस्तानी अधिकारियों को जन-विद्रोह दबाने की व्यापक शक्ति दी है। उन्होंने लिखा कि न्यायपालिका को नियंत्रित कर लिया गया है, मीडिया को निष्क्रिय किया जा चुका है और नागरिक समाज कमज़ोर पड़ गया है।
उन्होंने चेताया, 'इस्लामाबाद और रावलपिंडी को देश के बाकी हिस्सों से अलग करना गंभीर प्रकृति के संकट को संभालने में मदद नहीं करेगा। राजधानी सील करने की आर्थिक लागत के साथ-साथ देश की अंतरराष्ट्रीय छवि भी धूमिल होती है।' उन्होंने जोड़ा कि यदि सैन्य प्रतिष्ठान के करीबी हलकों में गृहयुद्ध जैसी स्थिति से बचने पर मंथन हो रहा है, तो इसे विवेक और रणनीतिक समझदारी कहा जाना चाहिए।
राजनीतिक संकट की पृष्ठभूमि
यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान पहले से ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की शर्तों के बोझ तले दबी अर्थव्यवस्था और राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहा है। गौरतलब है कि इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद से PTI कई बड़े विरोध प्रदर्शन कर चुकी है, और हर बार सरकार ने बल प्रयोग का सहारा लिया है।
प्रोफेसर अहमर के विश्लेषण के अनुसार, पाकिस्तान सरकार की प्राथमिकता अपनी आलीशान जीवनशैली बनाए रखना और विदेशी व घरेलू ऋणों पर ब्याज चुकाना है — जिसके लिए नागरिकों पर करों और शुल्कों का बोझ लगातार बढ़ाया जा रहा है।
क्या होगा आगे
PTI का 27 सितंबर का प्रस्तावित मार्च पाकिस्तान के राजनीतिक तापमान के लिए अगली बड़ी परीक्षा होगी। प्रोफेसर अहमर की राय में, बल-प्रयोग की सीमा तभी टूटेगी जब नागरिक समाज, वकील, मीडिया और पाकिस्तान का युवावर्ग यथास्थिति के खिलाफ एक संगठित आंदोलन खड़ा करने का जोखिम उठाने का साहस दिखाएगा। फिलहाल, शहबाज शरीफ सरकार प्रतिबंधों और बल के बल पर स्थिति संभालने की कोशिश में है — लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह दीर्घकालिक समाधान नहीं है।