पीटीआई का 27 सितंबर को लॉन्ग मार्च: इमरान खान की बहनें हिरासत में, पाक सत्ता पर बड़ा सवाल
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने 27 सितंबर 2026 को इस्लामाबाद में बड़े विरोध प्रदर्शन और लॉन्ग मार्च का ऐलान किया है, जिसका मुख्य मुद्दा जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई, संविधान की सर्वोच्चता और लोकतंत्र की बहाली है। इस प्रदर्शन से ठीक पहले इमरान खान की तीनों बहनों — उजमा खान, नोरीन नियाजी और अलीमा खान — को 30-30 दिन की प्रशासनिक हिरासत में लिया जा चुका है, जिसे पीटीआई सरकार की 'घबराहट' का प्रमाण बता रही है।
हिरासत का ब्यौरा और कानूनी आधार
पाकिस्तान के अखबार डॉन के अनुसार, लाहौर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय ने पंजाब मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर ऑर्डिनेंस, 1960 के तहत उजमा खान और नोरीन नियाजी को 30 दिनों के लिए हिरासत में लेने का आदेश दिया। आदेश में दोनों को 'सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए प्रतिकूल' बताया गया है। अलीमा खान को भी इसी तरह के आदेश के तहत हिरासत में लिया गया। पीटीआई इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रही है।
प्रदर्शन के पीछे व्यापक मांगें
पीटीआई नेताओं हारिस तौरो, शाहिद अनवर, रियाजुर रहमान और इंसाफ लॉयर्स फोरम के अध्यक्ष अधिवक्ता सज्जाद अहमद ने 13 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया था कि यह प्रदर्शन केवल इमरान खान की रिहाई तक सीमित नहीं है। पार्टी ने पाकिस्तान के गंभीर राजनीतिक और आर्थिक संकट का हवाला देते हुए कहा कि संवैधानिक व कानूनी संस्थाएँ कमज़ोर हुई हैं और चुनावी प्रक्रिया को नुकसान पहुँचाया गया है। पीटीआई ने दावा किया है कि सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग के कुछ सदस्यों ने भी माना है कि मौजूदा व्यवस्था विफल हो चुकी है।
पाकिस्तान का गहरा संरचनात्मक संकट
सामाजिक नीति विशेषज्ञ क्रिसौला एस्टरियाडू ने प्रेसेंजा इंटरनेशनल प्रेस एजेंसी में प्रकाशित एक लेख में कहा कि 1977 के सैन्य तख्तापलट के करीब पाँच दशक बाद भी पाकिस्तान इस बुनियादी सवाल का हल नहीं ढूंढ पाया है कि अंतिम राजनीतिक शक्ति निर्वाचित संस्थाओं के पास होनी चाहिए या सैन्य प्रतिष्ठान के पास। एस्टरियाडू के अनुसार, इमरान खान का मामला इस विरोधाभास को पुनः केंद्र में ले आया है — हालाँकि खान के अपने राजनीतिक सफर में भी ऐसे विरोधाभास रहे हैं, जिनकी वह अब आलोचना करते हैं।
गौरतलब है कि 2018 में इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने पर विश्लेषकों और राजनीतिक विरोधियों ने कथित तौर पर सैन्य प्रतिष्ठान के समर्थन का आरोप लगाया था, जिसे खान और पीटीआई ने हमेशा खारिज किया। उनकी सरकार पर पत्रकारों पर दबाव और आलोचक आवाज़ों को कथित तौर पर दबाने के आरोप भी लगे थे। रिपोर्टों के अनुसार, बाद में इमरान खान और सैन्य नेतृत्व के बीच संबंध बिगड़े — लेकिन इससे पुराना इतिहास नहीं मिटता।
सैन्य प्रतिष्ठान की बढ़ती ताकत
पाकिस्तान के मौजूदा सेना प्रमुख असीम मुनीर के कार्यकाल में यह मुद्दा और संवेदनशील हो गया है। मई 2025 में पाकिस्तान सरकार ने मुनीर को फील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत किया — वे अयूब खान के बाद पाकिस्तान के इतिहास में यह पद पाने वाले दूसरे सैन्य अधिकारी बने। इसके बाद नवंबर 2025 में 27वें संविधान संशोधन के ज़रिए सैन्य कमान की संरचना में बदलाव हुआ और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज का नया पद सृजित किया गया, जिसकी जिम्मेदारी भी मुनीर को सौंपी गई।
आगे क्या
रिपोर्टों के अनुसार, 27 सितंबर का प्रदर्शन पाकिस्तान की नागरिक-सैन्य सत्ता के असंतुलन को एक बार फिर परखेगा। पीटीआई इमरान खान को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताते हुए दावा करती है कि वही पाकिस्तान को मौजूदा संकट से उबार सकते हैं। हालाँकि, सरकार द्वारा इमरान खान की बहनों की हिरासत यह भी संकेत देती है कि सत्तापक्ष प्रदर्शन की गति को रोकने के लिए आक्रामक रुख अपनाए हुए है। पाकिस्तान में राजनीतिक तनाव का यह दौर आने वाले दिनों में और गहरा हो सकता है।