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भारत अमेरिका साझेदारी रणनीतिक मतभेदों के बावजूद आगे, जयशंकर और निरुपमा राव की अहम टिप्पणियाँ

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भारत अमेरिका साझेदारी रणनीतिक मतभेदों के बावजूद आगे, जयशंकर और निरुपमा राव की अहम टिप्पणियाँ

सारांश

भारत अमेरिका संबंध पर एक ताज़ा विश्लेषण रिपोर्ट कहती है कि 25 साल पुरानी रणनीतिक सोच अब दबाव में है। पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव की दो टूक — बिना एनर्जी सिक्योरिटी, डिफेंस विविधता और तकनीकी क्षमता के 'स्वायत्तता' महज़ शब्द है। जयशंकर ने भी न्यूयॉर्क में आतंकवाद की अनदेखी को रिश्तों के लिए खतरा बताया।

मुख्य बातें

हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत अमेरिका संबंध पिछले 25 वर्षों से एक रणनीतिक सोच पर आधारित रहे हैं, लेकिन अब इस सोच को बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।
पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने कहा कि दोनों देशों के बीच 'साझेदारी की परिभाषा' को लेकर मूलभूत असहमति है — वॉशिंगटन राजनीतिक सहमति चाहता है, नई दिल्ली संप्रभु सहयोग।
राव ने ट्रंप के भारत पाकिस्तान मध्यस्थता के दावों को दशकों की कूटनीतिक मेहनत के लिए खतरा बताया।
जयशंकर ने न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी को संबोधित करते हुए आतंकवाद की अनदेखी को द्विपक्षीय संबंधों के लिए हानिकारक बताया।
राव ने कहा कि रणनीतिक स्वायत्तता के लिए डिफेंस सप्लाई विविधता, एनर्जी सिक्योरिटी और तकनीकी क्षमता — तीनों ज़रूरी हैं, वरना स्वायत्तता 'सिर्फ बातें' बनकर रह जाएगी।

भारत अमेरिका संबंध रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर गहरे मतभेदों के बावजूद आगे बढ़ रहे हैं — यह बात एक हालिया विश्लेषण रिपोर्ट में सामने आई है। नई दिल्ली में 9 अक्टूबर 2026 को सामने आई इस रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 25 वर्षों से यह द्विपक्षीय संबंध इस रणनीतिक सोच पर टिका रहा है कि एक मज़बूत भारत, एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने, सप्लाई चेन में विविधता लाने और एक स्वतंत्र व खुले इंडो पैसिफिक को मज़बूत करने के ज़रिए अमेरिका के व्यापक रणनीतिक लक्ष्यों को पूरा करता है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अब इस सोच को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है।

साझेदारी की परिभाषा पर मूलभूत असहमति

भारत की पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने 'इंडिया नैरेटिव' में लिखा, "भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा मतभेद सिर्फ तेल के मुद्दे तक सीमित नहीं हैं। शायद साझेदारी के मतलब को लेकर भी गहरी असहमति है।" उन्होंने रेखांकित किया कि वॉशिंगटन अक्सर रणनीतिक तालमेल को राजनीतिक सहमति की माँग का आधार बनाता है, जबकि नई दिल्ली में साझेदारी का अर्थ संप्रभु देशों के बीच सहयोग माना जाता है — जिनके बीच रूस, ईरान और चीन से निपटने के तरीकों पर मतभेद बने रह सकते हैं।

राव ने यह भी कहा, "जब ये मतभेद वफादारी की सार्वजनिक परीक्षा बन जाते हैं तो कूटनीति की जगह दिखावा ले लेता है। समझौता करना इसलिए और मुश्किल हो जाता है क्योंकि इसे घुटने टेकने जैसा दिखाया जाता है।"

ट्रंप की मध्यस्थता और पुरानी सोच का पुनरुत्थान

राव ने बताया कि नई दिल्ली ने वॉशिंगटन की उस पुरानी सोच से दूरी बनाने में कई वर्ष लगाए, जिसमें भारत और पाकिस्तान को एक ही क्षेत्रीय समीकरण का हिस्सा माना जाता था। उनके अनुसार, ट्रंप के भारत पाकिस्तान के बीच बार बार मध्यस्थता के दावों से उस पुरानी सोच पर फिर से बहस छिड़ गई है।

राव ने स्पष्ट किया, "यह आपत्ति सिर्फ सम्मान की बात नहीं है। भारत के वैश्विक आर्थिक, तकनीकी और समुद्री हित हैं, जिन्हें सिर्फ पड़ोसी देश के साथ झगड़े के संकीर्ण नज़रिए से नहीं समझा जा सकता।" उन्होंने कहा कि सोचने की पुरानी आदतें दशकों की कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद बनी रह सकती हैं, खासकर जब वे किसी राष्ट्रपति के राजनीतिक जुनून को पूरा करती हों।

जयशंकर का स्पष्ट संदेश

रिपोर्ट में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की हाल ही में न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी को दिए गए संबोधन का उल्लेख है। जयशंकर ने कहा कि भारत अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी को और ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सुरक्षा से जुड़ी भारत की सबसे अहम चिंताओं में से किसी एक को नज़रअंदाज़ किया गया, तो इसका दोनों देशों के संबंधों पर सीधा असर पड़ सकता है। उन्होंने पड़ोसी देश से होने वाले आतंकवाद को दशकों से चली आ रही एक सोची समझी नीति बताया।

रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा

रिपोर्ट के अनुसार, भारत की प्रतिक्रिया आहत राष्ट्रवाद से प्रेरित नहीं होनी चाहिए। रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि बाहरी दबाव की कितनी जोर शोर से निंदा की जाती है, बल्कि इस बात से होती है कि देश उसका कितनी प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है।

राव ने लिखा, "इसके लिए अलग अलग तरह की डिफेंस सप्लाई, बेहतर एनर्जी सिक्योरिटी, टेक्नोलॉजी की क्षमता, मैन्युफैक्चरिंग की ताकत और संस्थागत मज़बूती की ज़रूरत है। इन आधारों के बिना स्वायत्तता सिर्फ बातें होंगी।"

आगे का रास्ता: सहयोग ज़रूरी, दबाव नहीं

राव ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ अमेरिका से पीछे हटना नहीं है। उन्होंने कहा, "एशिया में अनुकूल संतुलन बनाए रखने के लिए भारत को अमेरिकी टेक्नोलॉजी, निवेश और सहयोग की ज़रूरत है। वहीं, अमेरिका को ऐसे भारत की ज़रूरत है जो चीन के दबदबे का मुकाबला कर सके।" उन्होंने चेतावनी दी कि जब भी किसी असहमति को रिश्तों पर जनमत संग्रह बना दिया जाता है, तो किसी को भी फायदा नहीं होता। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच यह रणनीतिक संवाद और अधिक महत्त्वपूर्ण होता जाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह केवल एक कूटनीतिक मुद्रा है। ट्रंप की मध्यस्थता की बातें और वॉशिंगटन की 'वफादारी परीक्षा' वाली प्रवृत्ति भारत की उस सावधानीपूर्ण स्थिति को चुनौती देती है जो उसने चीन, रूस और पश्चिम के बीच संतुलन साधकर बनाई है। मुख्यधारा की कवरेज जो बात छोड़ती है वह यह है कि इस बहस का असली दांव कूटनीतिक भाषा नहीं, बल्कि भारत की वास्तविक क्षमता निर्माण की गति है।
RashtraPress
9 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत अमेरिका साझेदारी में अभी मुख्य मतभेद क्या हैं?
रिपोर्ट के अनुसार, मतभेद तेल खरीद जैसे एकल मुद्दों से कहीं आगे हैं — दोनों देश 'साझेदारी' की परिभाषा पर ही असहमत हैं। वॉशिंगटन रणनीतिक तालमेल को राजनीतिक सहमति की माँग से जोड़ता है, जबकि नई दिल्ली इसे संप्रभु देशों के बीच सहयोग मानती है जिनके बीच रूस, ईरान और चीन पर मतभेद बने रह सकते हैं।
निरुपमा राव ने रणनीतिक स्वायत्तता के बारे में क्या कहा?
पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने कहा कि रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा बाहरी दबाव की निंदा करने से नहीं, बल्कि उसका प्रभावी ढंग से सामना करने की क्षमता से होती है। उनके अनुसार इसके लिए डिफेंस सप्लाई में विविधता, एनर्जी सिक्योरिटी, तकनीकी क्षमता और संस्थागत मज़बूती — सभी ज़रूरी हैं।
विदेश मंत्री जयशंकर ने न्यूयॉर्क में क्या कहा?
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एशिया सोसाइटी को संबोधित करते हुए कहा कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी को और मज़बूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने साथ ही चेतावनी दी कि सुरक्षा से जुड़ी भारत की अहम चिंताओं को नज़रअंदाज़ करने से द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है, और उन्होंने पड़ोसी देश से होने वाले आतंकवाद को एक सोची समझी नीति बताया।
ट्रंप की मध्यस्थता की बातें भारत अमेरिका संबंधों को कैसे प्रभावित कर रही हैं?
राव के अनुसार, ट्रंप के भारत पाकिस्तान के बीच बार बार मध्यस्थता के दावों ने उस पुरानी सोच को फिर से जीवित कर दिया है जिसमें दोनों देशों को एक ही क्षेत्रीय समीकरण का हिस्सा माना जाता था। भारत ने इस सोच से दूरी बनाने में दशकों की कूटनीतिक मेहनत लगाई थी, और यह पुनरुत्थान नई दिल्ली के लिए गहरी चिंता का विषय है।
क्या भारत अमेरिका से दूर हो रहा है?
नहीं — रिपोर्ट और राव दोनों स्पष्ट करते हैं कि इसका अर्थ अमेरिका से पीछे हटना नहीं है। राव ने कहा कि एशिया में संतुलन बनाए रखने के लिए भारत को अमेरिकी तकनीक, निवेश और सहयोग की ज़रूरत है, और अमेरिका को भी एक सशक्त भारत चाहिए जो चीन के प्रभुत्व का मुकाबला कर सके।
राष्ट्र प्रेस
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