ईरान संघर्ष में भारत बना अमेरिका का भरोसेमंद साझेदार, समझौते के बाद ट्रंप के तेवर पर टिकी नज़रें
सारांश
मुख्य बातें
ईरान-अमेरिका संघर्ष के दौरान भारत वैश्विक भू-राजनीति में अमेरिका के सबसे विश्वसनीय रणनीतिक साझेदारों में से एक बनकर उभरा। 21 जून 2025 तक के घटनाक्रम पर नज़र डालें तो स्पष्ट होता है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी कूटनीति की प्राथमिकताएँ तेज़ी से बदली हैं और नई दिल्ली की भूमिका पहले से कहीं अधिक अहम हो गई है। अब जब ईरान और अमेरिका के बीच समझौता हो चुका है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रंप अपने पुराने आक्रामक तेवर में लौटेंगे?
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में टैरिफ से शुरू हुई उथल-पुथल
जनवरी 2025 में राष्ट्रपति पद संभालते ही ट्रंप ने दुनियाभर के देशों पर भारी टैरिफ लगाने की चेतावनियाँ देना शुरू कर दिया। 28 फरवरी 2025 से पहले तक वैश्विक व्यापार को लेकर उनका रुख बेहद सख्त था और कई देशों के साथ अमेरिका के आर्थिक संबंधों में तनाव बढ़ता जा रहा था। भारत को 'टैरिफ किंग' कहने वाले ट्रंप ने नई दिल्ली पर भी दबाव बनाने की कोशिश की, लेकिन भारत सरकार ने अमेरिकी शर्तों के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया।
ईरान संघर्ष ने बदल दीं ट्रंप की प्राथमिकताएँ
ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बाद ट्रंप के सार्वजनिक बयानों और नीतिगत प्राथमिकताओं में उल्लेखनीय बदलाव देखा गया। अमेरिकी सरकार का ध्यान व्यापारिक विवादों से हटकर पश्चिम एशिया की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक साझेदारियों पर केंद्रित हो गया। गौरतलब है कि इस अवधि में ट्रंप ने न केवल टैरिफ को लेकर अपेक्षाकृत कम बयान दिए, बल्कि भारत-पाकिस्तान संघर्ष विराम पर भी पहले जैसी सक्रिय टिप्पणियाँ नहीं कीं।
बीते लगभग 100 दिनों के घटनाक्रम में यूरोप के कई देशों ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई पर चिंता जताई, जबकि पश्चिम एशिया के देशों ने क्षेत्रीय स्थिरता पर ज़ोर दिया। ऐसे माहौल में अमेरिका के लिए भारत जैसे बड़े और विश्वसनीय साझेदार का महत्व और भी बढ़ गया।
मोदी की सराहना और भारत की बढ़ती रणनीतिक अहमियत
हाल के महीनों में राष्ट्रपति ट्रंप ने कई अवसरों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक मजबूत और प्रभावशाली नेता बताया। फ्रांस में जी7 बैठक के इतर मोदी से द्विपक्षीय मुलाकात के बाद ट्रंप ने उन्हें 'बेहद मजबूत और महान नेता' कहा। ट्रंप ने यह भी कहा कि मोदी ने भारत को युद्धों से दूर रखा है, जो एक समझदारी भरा कदम है।
भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के प्रमुख रणनीतिक साझेदार के रूप में देखा जाता है। चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में भी नई दिल्ली की भूमिका अहम मानी जाती है। विश्लेषकों के अनुसार, वाशिंगटन अब यह भलीभाँति समझ चुका है कि एशिया-प्रशांत और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति मज़बूत रखने के लिए उसे नई दिल्ली के सहयोग की ज़रूरत है।
चीन के साथ अमेरिका का नरम रुख
ट्रंप का झुकाव केवल भारत की तरफ ही नहीं, बल्कि चीन की तरफ भी देखा गया। ट्रंप के चीन दौरे और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उनकी प्रशंसा इसका ताज़ा उदाहरण है। व्यापारिक टकराव और कड़े बयानों के बावजूद दोनों देश बातचीत की डोर बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि ट्रंप का जितना झुकाव बीजिंग की तरफ है, चीन की ओर से वैसी सक्रियता नहीं दिखती। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका फ़िलहाल एक साथ कई मोर्चों पर टकराव से बचना चाहता है।
भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और आगे की राह
किसी भी वैश्विक दबाव में भारत ने अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा है। ट्रंप के भारी दबाव के बीच न तो भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद किया, न ही अमेरिकी शर्तों पर व्यापार समझौता किया। अब जब ईरान और अमेरिका के बीच समझौता हो चुका है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ट्रंप एक बार फिर टैरिफ और व्यापार दबाव की अपनी पुरानी नीति की तरफ लौटते हैं और भारत के साथ उनका रुख कैसा रहता है।