जयशंकर का अमेरिका पर निशाना: आतंकवाद पर भारत की चिंताओं को नज़रअंदाज़ करना द्विपक्षीय संबंधों के लिए बाधा
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 29 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद को लेकर भारत की चिंताओं के प्रति अमेरिका की असंवेदनशीलता दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक गंभीर बाधा है। उन्होंने कहा कि व्यापार के अलावा, यह मुद्दा भारत-अमेरिका रिश्तों को और प्रगाढ़ बनाने में सबसे बड़ी रुकावटों में से एक है।
जयशंकर का सीधा संदेश
जयशंकर ने 'एक पड़ोसी देश' का उल्लेख करते हुए कहा कि वह देश कई दशकों से जानबूझकर आतंकवाद को अपनी नीति के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। हालाँकि उन्होंने सीधे पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा स्पष्ट था।
उन्होंने कहा, 'शायद बहुत कम देश ऐसे होंगे जिन्होंने उस तरह के आतंकवाद का सामना किया हो, जैसा हमने एक पड़ोसी देश से किया है। यह कई दशकों से जानबूझकर अपनाई गई नीति का हिस्सा रहा है।'
अमेरिका की संवेदनशीलता पर सवाल
जयशंकर ने कहा, 'अगर कोई मुद्दा हमारे लिए इतना ज़्यादा मायने रखता है और उसे लेकर पर्याप्त समझ, संवेदनशीलता या सहानुभूति नहीं है, तो मुझे लगता है कि इससे समस्या पैदा होती है।' उन्होंने आगे जोड़ा, 'अगर मेरी सबसे बड़ी चिंताओं में से किसी एक को मेरा साझेदार पूरी तरह नहीं समझता है, तो जाहिर तौर पर इसका असर रिश्तों पर पड़ता है।'
यह ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के बीच नजदीकियाँ बढ़ती देखी जा रही हैं। आलोचकों का कहना है कि इस क्रम में पाकिस्तान की आतंकवाद से जुड़ी कथित भूमिका को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि 11 सितंबर 2001 के हमलों — जिनमें न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और वॉशिंगटन के निकट पेंटागन को निशाना बनाया गया था — के बाद अमेरिका ने वैश्विक आतंकवाद को समर्थन देने में इस्लामाबाद की भूमिका को पहले स्वीकार किया था। यह मुद्दा तब और उजागर हुआ जब अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में छिपा पाया गया।
अब ट्रंप प्रशासन के तहत पाकिस्तान नीति में जो बदलाव दिख रहा है, वह पिछली अमेरिकी सरकारों की स्थिति से एक महत्वपूर्ण विचलन माना जा रहा है।
भारत-अमेरिका संबंधों पर असर
जयशंकर की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ताएँ भी जारी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जयशंकर का यह सार्वजनिक बयान कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जो नई दिल्ली की उस चिंता को दर्शाता है कि वॉशिंगटन भारत के सुरक्षा हितों को उचित तवज्जो नहीं दे रहा।
आगे चलकर यह देखना होगा कि अमेरिका इस सार्वजनिक आलोचना पर किस तरह प्रतिक्रिया देता है और क्या यह मुद्दा आगामी द्विपक्षीय वार्ताओं में औपचारिक रूप से उठाया जाएगा।