16 अक्टूबर 2026
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नालंदा ताम्रपत्र प्रतिकृति जकार्ता संस्थान को सौंपी, भारत-इंडोनेशिया की साझा विरासत का उत्सव

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नालंदा ताम्रपत्र प्रतिकृति जकार्ता संस्थान को सौंपी, भारत-इंडोनेशिया की साझा विरासत का उत्सव

सारांश

9वीं सदी की नालंदा ताम्र-पट्टिका की प्रतिकृति जकार्ता के नालंदा इंस्टीट्यूट को सौंपी गई — भारत और श्रीविजय साम्राज्य के सदियों पुराने रिश्तों की याद दिलाता यह कदम 'टैगोर-देवान्तारा सांस्कृतिक कूटनीति वर्ष' के बीच आया है, जो जुलाई 2026 से सितंबर 2027 तक 15 महीने चलेगा।

मुख्य बातें

राजदूत संदीप चक्रवर्ती ने 15 अक्टूबर 2026 को जकार्ता स्थित नालंदा इंस्टीट्यूट को 9वीं सदी की नालंदा ताम्र-पट्टिका की प्रतिकृति सौंपी।
यह ताम्रपत्र भारत और श्रीविजय साम्राज्य के बीच प्राचीन समुद्री एवं सांस्कृतिक संबंधों का प्रमाण है।
संस्थान परिसर में बोधि का पौधा भी लगाया गया — दोनों देशों के स्थायी संबंधों का प्रतीक।
भारत और इंडोनेशिया 'टैगोर-देवान्तारा सांस्कृतिक और शैक्षिक कूटनीति वर्ष' मना रहे हैं, जो जुलाई 2026 से सितंबर 2027 तक चलेगा।
इस 15 महीने के कार्यक्रम में फिल्में, फैशन, साहित्य, शिक्षा और छात्रवृत्ति आदान-प्रदान शामिल हैं।

भारत के राजदूत संदीप चक्रवर्ती ने 15 अक्टूबर 2026 को जकार्ता स्थित नालंदा इंस्टीट्यूट को 9वीं सदी की नालंदा ताम्र-पट्टिका की एक आधिकारिक प्रतिकृति सौंपी। यह ऐतिहासिक ताम्रपत्र भारत और श्रीविजय साम्राज्य के बीच प्राचीन समुद्री कूटनीति एवं सांस्कृतिक संबंधों का जीवंत प्रमाण माना जाता है।

सौंपाई की पृष्ठभूमि

इंडोनेशिया में भारतीय दूतावास ने बताया कि यह अवसर केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि दोनों देशों के गहरे ऐतिहासिक रिश्तों की पुनः पुष्टि था। प्रतिकृति सौंपे जाने के साथ-साथ संस्थान के परिसर में बोधि का एक पौधा भी रोपा गया, जो दोनों देशों के बीच स्थायी द्विपक्षीय संबंधों का प्रतीक है।

दूतावास ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर लिखा, 'इतिहास के पन्ने पलटे गए! राजदूत संदीप चक्रवर्ती ने जकार्ता स्थित नालंदा संस्थान को 9वीं सदी की नालंदा ताम्रपत्र की एक प्रतिकृति सौंपी।'

ताम्रपत्र का ऐतिहासिक महत्व

यह शिलालेख उस दौर का है जब श्रीविजय साम्राज्य दक्षिण-पूर्व एशिया में बौद्ध शिक्षा और व्यापार का प्रमुख केंद्र था तथा नालंदा विश्वविद्यालय के साथ उसके घनिष्ठ संबंध थे। दूतावास के अनुसार यह ताम्रपत्र 'कालातीत प्रमाण' है — एक ऐसा दस्तावेज़ जो सदियों पुराने समुद्री मार्गों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साझा बौद्ध धरोहर को रेखांकित करता है। गौरतलब है कि इस तरह की सांस्कृतिक कूटनीति भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति का हिस्सा रही है।

टैगोर-देवान्तारा सांस्कृतिक वर्ष का संदर्भ

यह आयोजन ऐसे समय में हुआ जब भारत और इंडोनेशिया मिलकर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की इंडोनेशिया यात्रा की शताब्दी मना रहे हैं। दोनों देशों ने इस वर्ष को 'टैगोर-देवान्तारा सांस्कृतिक और शैक्षिक कूटनीति वर्ष' घोषित किया है, जो जुलाई 2026 से सितंबर 2027 तक, यानी 15 महीनों तक चलेगा।

इंडोनेशिया के पहले शिक्षा मंत्री देवान्तारा के शैक्षिक दर्शन पर टैगोर के विचारों की गहरी छाप थी — यही सांझा बौद्धिक विरासत इस कूटनीतिक पहल की नींव है।

कार्यक्रमों का दायरा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान इस वर्ष की घोषणा की गई थी। 15 महीनों के इस आयोजन के तहत दोनों देशों के बीच उत्सव, फिल्में, फैशन, वस्त्र, साहित्य, शिक्षा और छात्रवृत्ति से जुड़े आदान-प्रदान कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। भारतीय दूतावास ने जुलाई 2026 में इसकी औपचारिक घोषणा की थी।

आगे की दिशा

नालंदा ताम्रपत्र प्रतिकृति की सौंपाई और बोधि वृक्षारोपण इस 15-महीने के सांस्कृतिक कैलेंडर की शुरुआती कड़ियाँ हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रतीकात्मक कदम दोनों देशों के बीच पर्यटन, शिक्षा-आदान-प्रदान और सॉफ्ट पावर को मज़बूत करने में सहायक भूमिका निभाते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो रणनीतिक साझेदारियों को सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ता है। टैगोर-देवान्तारा वर्ष का ढाँचा इस कूटनीति को एक विशेष बौद्धिक गहराई देता है — दो दार्शनिकों की साझा विरासत को 21वीं सदी के द्विपक्षीय संबंधों की नींव बनाने की कोशिश। हालाँकि असली परख यह होगी कि ये प्रतीकात्मक कदम व्यापार, शिक्षा-विनिमय और जन-से-जन संपर्क में ठोस परिणामों में बदलते हैं या नहीं।
RashtraPress
16 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नालंदा ताम्रपत्र क्या है और इसका ऐतिहासिक महत्व क्यों है?
नालंदा ताम्र-पट्टिका 9वीं सदी का एक शिलालेख है जो भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई श्रीविजय साम्राज्य के बीच समुद्री कूटनीति, सांस्कृतिक संबंधों और साझा बौद्ध विरासत का प्रमाण है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि नालंदा विश्वविद्यालय और श्रीविजय साम्राज्य के बीच सदियों पुराने शैक्षिक और व्यापारिक रिश्ते थे।
जकार्ता के नालंदा इंस्टीट्यूट को यह प्रतिकृति किसने और कब सौंपी?
इंडोनेशिया में भारत के राजदूत संदीप चक्रवर्ती ने 15 अक्टूबर 2026 को जकार्ता स्थित नालंदा इंस्टीट्यूट को यह प्रतिकृति सौंपी। इस अवसर पर संस्थान के परिसर में एक बोधि का पौधा भी रोपा गया।
टैगोर-देवान्तारा सांस्कृतिक और शैक्षिक कूटनीति वर्ष क्या है?
यह भारत और इंडोनेशिया का एक संयुक्त सांस्कृतिक आयोजन है जो जुलाई 2026 से सितंबर 2027 तक 15 महीने चलेगा। इसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान की गई थी और इसमें फिल्में, फैशन, साहित्य, शिक्षा और छात्रवृत्ति आदान-प्रदान शामिल हैं।
टैगोर और देवान्तारा का संबंध क्यों महत्वपूर्ण है?
इंडोनेशिया के पहले शिक्षा मंत्री देवान्तारा के शैक्षिक दर्शन पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के विचारों का गहरा प्रभाव था। यही साझा बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत इस कूटनीतिक पहल की बुनियाद है और दोनों देशों के संबंधों को एक नई पहचान देती है।
इस आयोजन का भारत-इंडोनेशिया संबंधों पर क्या असर होगा?
ताम्रपत्र प्रतिकृति की सौंपाई और 15 महीने के सांस्कृतिक कार्यक्रम भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति को सॉफ्ट पावर के ज़रिये मज़बूत करने की कोशिश है। विशेषज्ञों के अनुसार ये पहल पर्यटन, शिक्षा-विनिमय और जन-से-जन संपर्क को बढ़ावा देने में सहायक हो सकती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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