नेपाल जेनजी आंदोलन: पूर्व अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमे की सिफारिश
सारांश
Key Takeaways
- जेनजी आंदोलन में 77 लोगों की मृत्यु हुई।
- आयोग ने प्रमुख अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमे की सिफारिश की।
- रिपोर्ट लीक होने से राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
- ओली सरकार के पतन के बाद नए प्रशासन का गठन हुआ।
- राजनीतिक मामलों में जवाबदेही की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।
काठमांडू, २५ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। नेपाल में पिछले वर्ष के जेनजी आंदोलन में हुई घटनाओं की जांच के लिए बने उच्च-स्तरीय जांच आयोग ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक और उस समय के पुलिस प्रमुख चंद्र कुबेर खापुंग के खिलाफ आपराधिक जांच और मुकदमा चलाने की सिफारिश की है।
गौरीबहादुर कार्की की अध्यक्षता वाले आयोग ने ८ सितंबर को प्रदर्शनकारियों की मृत्यु के मामले में ओली और लेखक के लापरवाह और गैर-जिम्मेदार व्यवहार की ओर इशारा किया और उनके खिलाफ मुलुकी आपराधिक संहिता अधिनियम, २०७४ (२०१७) के तहत कार्रवाई की सिफारिश की।
आयोग ने पूर्व पुलिस प्रमुख को भी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग का आदेश देने के लिए जिम्मेदार ठहराया।
यदि आयोग की सिफारिशों के आधार पर मुकदमा चलता है, तो इन तीनों को तीन से दस साल तक की सजा और अधिकतम ३० हजार नेपाली रुपए का जुर्माना हो सकता है। आयोग की रिपोर्ट आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन इसकी एक लीक कॉपी व्यापक रूप से फैल चुकी है। आयोग के समक्ष अपने बयान में ओली ने कहा कि सुरक्षा एजेंसियों को जान-माल के नुकसान को कम करने और प्रदर्शन में अवांछित तत्वों की घुसपैठ रोकने के निर्देश दिए गए थे।
एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, ओली सरकार को गिराने वाले जेनजी आंदोलन के दौरान कुल ७७ लोगों की हत्या हुई और ८५ अरब नेपाली रुपए से अधिक की संपत्ति नष्ट हुई।
ओली के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के पतन के बाद, सुशीला कार्की के नेतृत्व में एक गैर-राजनीतिक प्रशासन का गठन किया गया, जिसने ५ मार्च को प्रतिनिधि सभा के चुनाव करवाए।
चुनाव के बाद, बालेन शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी संसद में लगभग दो-तिहाई बहुमत के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी जैसी पारंपरिक पार्टियों को भारी हार का सामना करना पड़ा।
नए प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण से ठीक दो दिन पहले यह रिपोर्ट लीक हुई, जिससे आने वाली सरकार पर आंदोलन के दौरान जिम्मेदार पाए गए पूर्व अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बढ़ सकता है।
आयोग ने तत्कालीन गृह सचिव गोकरण मणि दुवाडी, सशस्त्र पुलिस बल के प्रमुख राजु अर्याल, राष्ट्रीय जांच विभाग के पूर्व प्रमुख हुतराज थापा और काठमांडू के पूर्व मुख्य जिला अधिकारी छवि राज रिजाल के खिलाफ भी मुलुकी आपराधिक संहिता अधिनियम, २०७४ (२०१७) के तहत लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी के आरोप में जांच और मुकदमे की सिफारिश की है।
यदि इन पर मुकदमा चलता है, तो उन्हें अधिकतम तीन साल की सजा और ३० हजार नेपाली रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।
आयोग ने नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल और राष्ट्रीय जांच विभाग के कई अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की भी सिफारिश की है।