वॉर पावर्स रेजोल्यूशन और ट्रंप: 1 मई 2026 की डेडलाइन, ईरान में सैन्य कार्रवाई का भविष्य अधर में
सारांश
Key Takeaways
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू की गई सैन्य कार्रवाई 1 मई 2026 के बाद कानूनी रूप से जारी रह सकती है या नहीं — यह सवाल अब अमेरिकी संसद और व्हाइट हाउस के बीच एक बड़े संवैधानिक टकराव की शक्ल ले रहा है। वॉर पावर्स रेजोल्यूशन (1973) के तहत तय 60 दिन की समयसीमा 1 मई 2026 को समाप्त हो रही है, और अब तक अमेरिकी कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी नहीं मिली है।
मुख्य घटनाक्रम
अमेरिका ने 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था। हालाँकि, इस कार्रवाई की औपचारिक सूचना अमेरिकी कांग्रेस को 2 मार्च 2026 को दी गई। यही तारीख इस पूरे कानूनी विवाद की धुरी बन गई है, क्योंकि वॉर पावर्स रेजोल्यूशन के अनुसार इसी दिन से 60 दिन की उलटी गिनती शुरू होती है।
इस गणना के अनुसार, 1 मई 2026 वह अंतिम तिथि है जब तक ट्रंप प्रशासन को अमेरिकी संसद — हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट — दोनों सदनों में साधारण बहुमत से औपचारिक अनुमति हासिल करनी होगी। यदि यह मंजूरी नहीं मिलती, तो कानून के मुताबिक सैन्य कार्रवाई समाप्त करनी होगी।
वॉर पावर्स रेजोल्यूशन क्या है
1973 में अमेरिकी कांग्रेस ने यह कानून तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के वीटो को पलटकर पारित किया था। इसका मूल उद्देश्य राष्ट्रपति की युद्ध-संबंधी शक्तियों पर विधायी अंकुश लगाना और कांग्रेस की भूमिका को संवैधानिक रूप से सुनिश्चित करना था। वियतनाम युद्ध की पृष्ठभूमि में बना यह कानून आज भी अमेरिकी लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्ति-संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
कानून के तहत, यदि राष्ट्रपति बिना संसद की पूर्व मंजूरी के सेना तैनात करते हैं, तो उन्हें 48 घंटे के भीतर कांग्रेस को सूचित करना होता है और 60 दिनों के भीतर विधायी स्वीकृति लेनी होती है। इस अवधि में 30 दिन की अतिरिक्त मोहलत सैनिकों की सुरक्षित वापसी के लिए दी जाती है।
निक्सन से ट्रंप तक: कानून को चुनौती की परंपरा
यह ऐसे समय में आया है जब वॉर पावर्स रेजोल्यूशन की अनदेखी कोई नई बात नहीं है। रिचर्ड निक्सन, रोनाल्ड रीगन, बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू. बुश, बराक ओबामा और ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी इस कानून के प्रावधानों की पूरी तरह अनुपालना नहीं की गई। इन राष्ट्रपतियों का तर्क रहा है कि यह कानून राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों — विशेषकर राष्ट्रीय सुरक्षा और त्वरित सैन्य निर्णय के संदर्भ में — में अनुचित हस्तक्षेप करता है।
गौरतलब है कि यह कानून आज तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्वेच्छा से पूर्णतः नहीं माना है, जिससे इसकी व्यावहारिक प्रवर्तनीयता हमेशा विवादास्पद रही है।
कांग्रेस में बहुमत की चुनौती
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप की अपनी पार्टी — रिपब्लिकन पार्टी — के कम से कम 10 सांसद इस सैन्य कार्रवाई के विरोध में हैं। इससे दोनों सदनों में साधारण बहुमत जुटाना ट्रंप प्रशासन के लिए कठिन हो सकता है। यह यह भी N वीं बार है जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति को अपनी ही पार्टी के भीतर युद्ध-नीति पर असहमति का सामना करना पड़ रहा है।
आगे क्या हो सकता है
यदि 1 मई 2026 तक कांग्रेस से मंजूरी नहीं मिलती, तो ट्रंप प्रशासन कथित तौर पर किसी वैकल्पिक कानूनी व्याख्या या राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क के आधार पर सैन्य अभियान जारी रखने की कोशिश कर सकता है। इससे कार्यपालिका और विधायिका के बीच एक नए संवैधानिक संकट की संभावना बन सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर व्हाइट हाउस ने कानून की अनदेखी की, तो यह मामला अमेरिकी अदालतों तक पहुँच सकता है — हालाँकि अतीत में न्यायपालिका ने ऐसे मामलों में हस्तक्षेप से परहेज किया है।
अब देखना यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन संसदीय समर्थन जुटाने में सफल होता है, या फिर एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति पद की परंपरागत रणनीति — कानून को चुनौती देना — को दोहराया जाएगा।